चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
प्रतिमें प्राप्त हैं पर वे अधूरे हैं)- १२२ १५१; १८ १८४ २८२ २८६ २९८ ९७ १९९ १ २; ३ ३ ११ ३१ ३३०-३४२ (इनमेंसे दो कड़वक बम्बई प्रतिमें प्राप्त हैं पर अन्य कड़वकोंके अभावमें उनका स्थान निश्चित नहीं किया जा सकता) १४५ ३१२ १६३ १७८ १८८ (इनमेंसे चार कड़वक पंजाब प्रतिमें प्राप्त हैं पर वे अधूरे हैं। उनका स्थान निर्धारित नहीं किया जा सकता) ४१ और ४५०-४७३ । लिपि हिन्दीके विद्वानोंकी कुछ ऐसी धारणा बन गयी है कि मुसलमान कवियों द्वारा रचे गये सभी हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंकी आदि प्रति नागरी लिपिमें लिखी गयी थी। इस कथनके समर्थनमें वे इन काव्योंकी विभिन्न प्रतियोंमें पायी जानेवाली कतिपय ऐसी विकृतियोंकी सूची प्रस्तुत किया करते हैं जो उनकी दृष्टिमें नागरी लिपिसे फारसी लिपिमें परिवर्तनसे ही आ सकती हैं। इन लोगों द्वारा उपस्थितकी जानेवाली पाठ विकृतियोंके विवेचन का यह स्थान नहीं है। यहाँ यह कहना ही पर्याप्त होगा कि यदि उन्हें ध्यानपूर्वक देखा जाय तो यह समझते देर न लगेगी कि वे विकृतियों नागरी लिपिसे फारसी लिपिमें परिवर्तन करने से नहीं आयी हैं, वरन् तत्कालीन अरबी-फारसी लिपि-शैलीकी प्रवृत्तियोंसे अपरिचित लिपिकारों द्वारा लिपिबद्ध होनेके कारण आयी हैं। यह सामान्य सूझ-बूझकी बात है कि नागरी लिपिको मुसलमानी शासनकालमें कभी प्रश्रय प्राप्त नहीं हुआ। परिणामतः सभी पढांत वर्ग पूर्णतया अभिजात कायस्थ परिवारोंका नागरी लिपिके साथ नामका भी सम्बन्ध न था। उनके घरोंमें रामायण ही नहीं दुर्गा-पाठ और भगवद्गीताका भी पाठ उर्दू-फारसीमें लिखी पोथियोंसे होता था और वे शुद्ध उच्चारणके साथ उनका पाठ किया करते थे। इङ्गलैण्ड और फ्रांस के पुस्तकालयोंमें न केवल सूरसागर आदि धार्मिक ग्रन्थों की ही वरन् हिन्दू कवियोंद्वारा रचित अनेक शृंगार काव्यों यथा केशवदासकी रसिक प्रिया बिहारी सतसई आदिकी भी फारसी लिपिमें लिखी काफी प्राचीन प्रतियाँ सुरक्षित हैं। उन्हें देखते हुए यह कल्पना करना कि प्रेमाख्यानक काव्योंके रचयिता मुसलमानों ने अपने काव्यकी आदि प्रति नागरी अक्षरोंमें लिखी होगी नितान्त हास्यास्पद है। ये कवि न केवल स्वयं मुसलमान थे वरन् उनके गुरु भी मुसलमान थे और उनके शिष्य भी मुसलमान ही थे। सूफी मतका हिन्दुओंमें प्रचार हुआ हो इसका कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं है। अतः उनके ग्रन्थ अरबी-फारसीके अतिरिक्त किसी अन्य लिपिमें कदापि नहीं लिखे गये होंगे। ये काव्य मूलतः अरबी-फारसी लिपिमें ही लिखे गये थे, यह उनकी उपलब्ध प्रतियोंसे भी सिद्ध होता है। वे अधिकांशतः अरबी-फारसी लिपिमें लिखी मिलती हैं और इन लिपियोंमें लिखी प्रतियाँ ही अधिक प्रमाणित हैं। यही नहीं नागरी लिपिमें प्राप्त प्रतियोंके पूर्वज भी अरबी-फारसी प्रतियाँ ही रही हैं यह भी उनके परीक्षणसे स्पष्ट प्रकट
२८ होता है। एक भी ऐसी नागरी प्रति उपलब्ध नहीं है जो सतहवीं शतीके पूर्वकी हो और किसी ग्रन्थकी प्राचीनतम प्रति कही जा सके। चन्दायतके सम्बन्धमें तो हमें यह कहनेमें तनिक भी संकोच नहीं है कि वह मूलतः नस्त' लिपिमें लिखा गया रहा होगा। उसकी सोलहवीं शती वाली प्रतियाँ इसी लिपिमें हैं। उसकी एक मात्र हिन्दी प्रतिके मूलमें कोई अरबी फारसी लिपिकी प्रति थी यह तो उसके प्रथम वाक्य—गुजरा चन्दायन गुफ्तार मौलाना दाऊद डालमई से ही सिद्ध है। सर्वोपरि हमारे सम्मुख नस्त' लिपि लिखित जो प्रतियाँ हैं उनमेंसे किसी भी प्रतिमें ऐसी विकृति नहीं मिलती जिससे उसकी किसी पूर्वज प्रतिके नागरी लिपिमें लिखे जानेकी दुरूह कल्पना भी की जा सके। पाठोद्धार और पाठ-निर्धारण किसी भी भाषाको अरबी-फारसी लिपिमें लिखना उतना कठिन नहीं है जितना कि बिना अभ्यासके उस लिपिमें लिखी भाषाका पढ़ना। इस लिपिमें व्यंजन मुख्यतः नुक्ते (विन्दुओ) पर आश्रित हैं। अतः जबतक कोई वस्तु सावधानीसे न लिखी गयी हो उसे ठीकसे और शुद्ध पढना यदि सर्वथा असम्भव नहीं तो दुरूह अवश्य है। इसी प्रकार स्वर व्यक्त करनेके लिए इस लिपिमें केवल तीन अक्षर अलिफ ये और वाव हैं। अलिफका अ और आ दोनो पढा जा सकता है। कहीं-कहीं आको शुद्ध पढ़नेके निमित्त तशदीदका चिह्न दे दिया करते हैं। येके दो रूप हैं जो छोटी ये और बड़ी य कहकर पुकारे जाते हैं। साधारणतः छोटी ये इ और ईके लिए और बड़ी य ए और ऐके लिए काम आता है। अन्तर व्यक्त करनेके लिए जेर और जबरके चिह्न लगा देते हैं। इसी प्रकार वावका प्रयोग उ, ऊ, और ओके लिए होता है। उ युक्त व्यंजनमें वावका प्रयोग न कर ऊपर केवल पेशका चिह्न लगा देते हैं। किन्तु यह सब सिद्धान्तकी ही बातें हैं। व्यवहारमे लिखते समय जेर, जबर, पेश प्रायः लोग नहीं लगाते। अभ्यासके आधारपर ही अन्दाजसे पाठ स्वरूप समझ लिया जाता है। चन्दायतकी जो प्रतियाँ हमें उपलब्ध हैं वे सभी नस्ख (अरबी लेखन शैली का एक रूप) में हैं। इस लिपिके लेखक लिपिसौन्दर्यपर विशेष बल दिया करते थे। इस कारण वे नुक्तेको अपने स्थानपर न रखकर सौन्दर्यकी दृष्टिसे आगे-पीछे ऊपर नीचे जहाँ चाहे वहाँ रख दिया करते थे। जिसका लोप भी कोई दोष नहीं माना जाता था। इस प्रकार नुक्तेके अभाव अथवा मनमानीके कारण पाठोद्धारमें जो कठिनाई हो सकती है वह तो है ही इसमें अनेक अक्षर ऐसे जिनके उच्चारण बहु हैं। त और टके उच्चारणके लिए आज दो अक्षर ते और टे हैं। पर उस समय इसका काम केवल एक अक्षरसे ही लेते थे। इसी प्रकार क और ग भी एक ही अक्षर काफ़से लिखा जाता था। इस प्रकार कुछ अन्य अक्षर भी हैं। मात्रा-बोधक चिह्नोंका प्रयोग इन प्रतियोंमें नहींके बराबर है। ये के दोनों रूपोंका प्रयोग बिना किसी भेदके इ और ए के लिए किया गया है।
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लिपि स्वरूपकी इन कठिनाइयोंके साथ-साथ सबसे बड़ी कठिनाइ जो हमारे सम्मुख रही है, वह थी चन्द्रायान की पृष्ठभूमिका अभाव । हमारे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं थी, जिससे पाठके अनुमानके लिए कोई सहाय मिल सके । एक ही शब्द पुरूस, बिरिस, बरस कुछ भी पढ़ा जा सकता है । यह तो प्रसंग से ही निश्चय किया जा सकता है कि वास्तविक पाठ क्या है । जब प्रसंग ही ज्ञात न हो तो किया क्या जाय ! प्रसंग ज्ञात होनेपर भी कभी कभी यह कठिनाई बनी रहती है । शब्दके पठित दो या अधिक रूपोंमेंसे कोई भी सार्थक हो सकता है । यथा—नत गावईं जहाँ और नित गावईं जहाँ । ऐसे स्थलोंपर दोमेंसे कौन-सा पाठ ठीक है निश्चित करना सहज नहीं होता । चन्द्रायानके पाठोद्धार करनेमें ऐसी ही तथा अन्य अनेक प्रकारकी कठिनाइयाँ हमारे सामने रही हैं । एक-एक शब्दको समझने और उसका रूप निर्धारण करनेमें घण्टों माथापच्ची करनी पड़ी है । कभी कभी तो एक पंक्तिक पढ़नेमें दो-दो तीन तीन दिन लग गये हैं । हमारी कठिनाइयोंका अनुमान वे ही लोग कर सकते हैं जिन्होंने बिना किसी नागरी प्रतिकी सहायताके इस प्रकारका पाठ-सम्पादन किया होगा । अपने सारे श्रमके बावजूद हम दृढता पूर्वक नहीं कह सकते कि हम ग्रन्थका पाठोद्धार करनेमें पूर्ण सफल हुए हैं । कितने ही ऐसे शब्द हैं जिनके शुद्ध पढ़ पानेके सम्बन्धमें स्वयं हमें सन्देह है । उनमेंसे कुछ तो विकृत पाठ हो सकते हैं; जिनका निराकरण तो कुछ और प्रतियोंके प्रकाशमें आनेपर ही सम्भव है । कुछ ऐसे भी हो सकते हैं, जिन्हें हमने पढ़ा तो ठीक हो पर अर्थ ज्ञानके अभावमें हम उन्हें सन्दिग्ध समझते हों । ऐसे शब्दोंकी भी कमी न होगी जिन्हें हम शुद्ध पढ़ ही न सके हों । इस प्रकारके अप-पाठके मूलमें बिन्दुओंका अभाव ही मुख्य होगा । उन्हें मूल शब्दकी कल्पनाके सहारे सुधारा सकता है ।
प्रति-परम्परा, पाठ-सम्बन्ध और संशुद्ध पाठ
प्राचीन ग्रन्थोंके सम्पादनकी आधुनिक प्रणालीके अनुसार विभिन्न प्रतियोंमें जो विभिन्न पाठ मिलते हैं उनमेंसे कौन-सा पाठ गुरु अथवा मूलके निकट है इसे जाननेके निमित्त प्रति-परम्परा और पाठ-सम्बन्धका शोध किया जाता है और तदनन्तर संशुद्ध पाठ (क्रिटिकल टेक्स्ट) प्रस्तुत किया जाता है । प्रस्तुत काव्यका इस प्रकारका कोई संशुद्ध पाठ (क्रिटिकल टेक्स्ट) उपस्थित करनेका प्रयास हमने नहीं किया है । यह बात नहीं कि हम उसके महत्त्वसे परिचित न हों और उसकी आवश्यकता न समझते हों । इस दिशामें हमारी कठिनाई यह है कि काव्यके उपलब्ध ३९२ कड़वकोंमें- से २९२ कड़वक ऐसे हैं जो किसी एक ही प्रतिमें मुख्यतः रीजेण्ड्स प्रतिमें प्राप्त हैं । उनके प्रति-पाठके अभावमें किसी प्रकारके संशुद्ध पाठ उपस्थित करनेका प्रश्न ही नहीं उठता । शेष ? कड़वकोंमेंसे निम्नलिखित ८८ कड़वक ऐसे हैं जो रीजेण्ड्स प्रतिके अतिरिक्त अन्य किसी एक प्रतिमें हैं —
३ बम्बई प्रति—८५ ८६ ११० १२१ १२४, १२५, १३१ १६२, १६६, १७०, १८२, १९५, २६ २६२, २६ २७१, २९६ ३१६, ३२६ ३४३ ३४६ ३६७, ३९९ ४०३ ४ ७ ४ ६ ४१६ ४१७ ४१८ ४२४ ४२५ ४२७ ४२८, ४३ ४३१ ४४१ ४४६ ४४७ ४४८ ४५२ । कुल ४ मनेर शरीफ प्रति—१८१, २१ १९१ २१४, २९७ २९७ १ ४, ३ ५, ३ ७ १ ८ १ ६, ३११ ३१२ ३१३ ३१४, ३१५ ३१६, ३२३ ३२४, ३२५, ३२६, ३३९ ३४८ ३५१ ३५२ ४५१, १५४, १५५ १५६ १५७ १५८ ३६ । कुल ३२ पंजाब प्रति—२१ ८८ ९१ ९४ १५८ २ ५ २ ६, १६७, २६९ २७ । कुल ९ काशी प्रति—१ ६, १४७ २ २ २४, १४९ । कुल ५ होपर पृष्ठ—४४४ । कुल १ इन कड़वकों के सम्बन्ध में भी हमारे सम्मुख कोई वैज्ञानिक माप-दण्ड (क्रिटिकल ऐपरेटस) नहीं है जिससे हम संयुक्त-पाठका निश्चय करें। केवल एक ही बात निश्चित है कि उनके पाठ रीजेण्ड्स प्रतिके पाठसे भिन्न हैं। रीजेण्ड्स और दूसरी प्रतिके पाठों मेंसे कौन सा हम स्वीकार करें यह हमारे विवेकका प्रश्न रहता है। अतः हमें अधिक उचित जान पड़ा कि जब २९२ कड़वकोंके पाठ किसी एक प्रतिके हैं और अधिकांशतः रीजेण्ड्स प्रतिके ही हैं तो इन कड़वकोंके लिए भी रीजेण्ड्स प्रति के ही पाठ स्वीकार किये जायें और दूसरी प्रतियोंके पाठ विकल्प रूपमें दे दिए जाँय; मूल अथवा शुद्ध पाठका निर्णय पाठक पर छोड़ दिया जाय। केवल १२ कड़वक ऐसे हैं, जिनके पाठ तीन प्रतियोंमें अर्थात् रीजेण्ड्स और बम्बई प्रतियोंके अतिरिक्त किसी एक अन्य प्रतिमें हैं। ये कड़वक इस प्रकार हैं:— रीजेण्ड्स बम्बई और पंजाब प्रतियाँ—१५९ १९ । कुल १ रीजेण्ड्स बम्बई और मनेरशरीफ प्रतियाँ—११६ ३२२ ३२८ ३२९ ३४० ३४१ ३५ १५ ३५१ । कुल ९ रीजेण्ड्स बम्बई और काशी प्रतियाँ—४ ७ । कुल १ इन कड़वकोंके परीक्षणसे ज्ञात होता है कि (१) रीजेण्ड्स और पंजाब प्रतियोंमें (२) बम्बई और मनेरशरीफ प्रतियोंमें और (३) बम्बई और काशी प्रतियोंमें परस्पर पाठ साम्यकी बहुलता है। ऐसा जान पड़ता है कि रीजेण्ड्स और पंजाब प्रतियाँ एक प्रति परम्पराकी दो शाखाएं हैं और बम्बई, मनेर शरीफ और काशी प्रतियाँ दूसरी परम्पराकी तीन शाखाएं हैं। इन दोनों परम्पराओंका सम्बन्ध इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है:—
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मूलग्रन्थ
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+----------+----------+
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X X
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+----+----+----+ +----+----+
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कासी बम्बई भनेर शरीफ रीजेन्ट्स पंजाब
पर इस प्रकारकी प्रति-परम्परा और पाठ-सम्बन्धको व्यक्त करनेवाली यह सामग्री अत्यल्प है। उनके आधारपर केवल १२ कड़बकोंका ही कोई संयुक्त पाठ उपस्थित किया जा सकता है। यह अल्प असंबद्ध सामग्रीके बीच बेमेल जान पड़ेगा। अतः इनके लिए भी रीजेन्ट्सवाले पाठ मूल रूपमें और शेष पाठ विकल्प रूपमें दिये गये हैं। कहीं कहीं जहाँ रीजेन्ट्स प्रतिका पाठ स्पष्ट रूपसे विकृत लगा, वहाँ विवेकके सहारे दूसरी प्रतिका पाठ मूलमें ग्रहण कर लिया गया है। पर ऐसे स्थल कम ही हैं।
भाषा
रामचन्द्र शुक्लने जायसी-ग्रन्थावलीकी भूमिकामें लिखा है :—'ध्यान देनेकी बात है कि ये सब प्रेम-कहानियाँ पूरबी हिन्दी अर्थात् अवधी भाषामें एक नियत क्रमके साथ केवल चौपाई-दोहेमें लिखी गयी हैं।' १ अभीतक जितने भी हिन्दी-सूफी-काव्योंके अध्ययन प्रस्तुत किये गये हैं प्रायः उन सबमें यह तथ्य ज्योंका त्यों स्वीकार कर लिया गया है। फलस्वरूप चन्दायनकी भाषाके सम्बन्धमें भी यही समझा जाता है कि उसकी भाषा अवधी होगी। श्याममनोहर पाण्डेयने मध्य-युगीन प्रेमाख्यानमें अत्यन्त विश्वासके साथ लिखा है—'डालमऊ क्षेत्रमें अवधी बोली जाती थी। अतः जनतामें अपने सन्देश प्रसारित करनेके लिए मुल्ला दाऊदने अवधीका ही चयन करना उपयुक्त समझा होगा। सूफी कवि जिस क्षेत्रमें रहे हैं, वहाँकी भाषामें काव्य लिखते रहे हैं। पंजाबके सूफी कवियोंने पंजाबी में 'ससिवुन्नो' 'हीर राँझा' आदि कथाओंको सूफियाने ढंगसे पंजाबीमें लिखा। इसी प्रकार दौलत काजी, अलाउल आदि कवियोंने जो बंगालके रहनेवाले थे बँगलामें लिखा। अतः डालमऊका कवि अवधी क्षेत्रमें रहकर अवधीमें लिखता है तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये। पर हमें आश्चर्य यह देखकर होता है कि हमारे विद्वान इस बातकी तो तर्कपूर्ण कल्पना कर सकते हैं कि दाऊद डालमऊके थे और डालमऊ अवधमें है, अवध की भाषा अवधी कहलायेगी अतः दाऊदकी भाषा अवधी ही होगी पर इस वास्तविक
१. चतुर्थ संस्करण, सं. २०१७ पृ. ४। २. मध्ययुगीन प्रेमाख्यानक काव्य परम्परा, पृ. १७०
३२ सम्मुख नहीं देख सकते कि चन्दायनकी रचना न तो अवधी वातावरणमें हुई थी और न उसका आरम्भिक प्रचार अवधी क्षेत्रके बीच था। अब्दुलकादिर बदायूनीने स्पष्ट शब्दोंमें कहा कि चन्दायन दिल्ली सल्तनतके प्रधान मन्त्री जौनाशाहके सम्मानमें रचा गया था और दिल्लीमें मखदूम शेख तकीउद्दीन रब्बानी जन-समाजके बीच उसका पाठ किया करते थे। यह कथन इस बातकी ओर संकेत करता है कि चन्दायनकी भाषा वह ग्राह्य है जिसे दिल्लीके प्रधान मन्त्री जौनाशाहसे लेकर दिल्लीकी सामान्य जनतातक पढ़ और समझ सकती थी। अब्दुलकादिर बदायूनीने इस भाषाके सम्बन्धमें हमें अपनी कल्पनाका कोई अवसर नहीं दिया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दोंमें बता दिया है कि इस मसनवी (चन्दायन) की भाषा हिन्दवी है। यह हिन्दवी निश्चय ही वही हिन्दवी होगी, जिसका प्रयोग चिश्ती सन्त शेख फरीदुद्दीन गंजशकर और ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया अपने मुरीदों- से बातचीत करते समय किया करते थे। उसी हिन्दवी को जो दिल्लीके सूफी सम्प्रदाय के सन्तों द्वारा व्यवहृत होती थी और राजसभासे लेकर जन साधारणमें समझी जाती अथवा कह सकती थी दाऊद ने अपने काव्य चन्दायनके लिए अपनाया होगा और उसीमें उसकी रचना की होगी। अतः चन्दायनकी भाषाको अवधके सीमित प्रदेशमें ही बोली और समझी जानेवाली भाषा अवधीका नाम नहीं दिया जा सकता। चन्दायनमें प्रयुक्त भाषा निस्सन्देह ऐसी भाषाका स्वरूप है जिसका देशमें काफी विस्तार और विकास रहा होगा। किन्तु खेद है कि हमारे सम्मुख तत्कालीन जनजीवनके व्यवहारमें आनेवाली भाषाका कोई स्पष्ट स्वरूप नहीं है जिसके आधारपर अधिक विस्तार और विचारके साथ इस कथनकी समीक्षा की जा सके। बारहवीं शताब्दीमें काशीमें रचा गया उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण नामक एक व्याकरण ग्रन्थ प्रकाशमें आया है जिसमें एक प्रादेशिक भाषाके स्वरूपको संस्कृतके माध्यमसे समझानेकी चेष्टा की गयी है। इस भाषाकी पहचान सुनीतिकुमार चाटुर्ज्याने आरम्भिक पूर्वी हिन्दी अर्थात् कोसली (अवधी) के रूपमें की है। यदि चन्दायनकी भाषा वस्तुतः अवधी है, जैसी कि विद्वानोंकी साधारणतया धारणा है, तो उसके शब्दोंकी उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणके शब्द-रूपोंके साथ नैकट्य और साम्य होना चाहिये। इस प्रकारकी तुलनात्मक परीक्षाके लिए दोनों ग्रन्थोंके क्रिया रूपोंको देखना उचित होगा। वर्तमानकालिक क्रियाओंमें सामान्य वर्तमानके निम्नलिखित कर्तृवाच्य रूप उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणमें मिलते हैं। एकवचन बहुवचन प्रथम पुरुष करउ करहु मध्यम पुरुष करसि करहु उत्तम पुरुष कर, करइ करवि
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चन्दायनमें प्रथम और मध्यम पुरुषकी वर्तमानकालिक क्रियाओंका प्रयोग कम है। उत्तम पुरुषके रूप जो हैं, वे उपर्युक्त रूपोंसे सर्वथा भिन्न हैं। यथा—आवाहौं, चढ़ावहौं, बहिराहौं, लायौं, कहाहौं, करहौं, सुहावइ, आवइ, भावइ आदि। उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणके वर्तमानकालिक क्रियाके कर्मवाच्य रूप हैं—पड़िय, जेविअ, होइअ, पाइअ आदि। चन्दायनमें इसका रूप खेतस, चेतस आदि है। उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण की वर्तमानकालिक विधि-क्रियाएँ उकारान्त हैं। यथा—करु, करहु। चन्दायनम इस प्रकारकी वर्तमानकालिक विधि-क्रियाओंका सर्वथा अभाव है। भूतकालिक क्रियाएँ उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणमें अत्यल्प हैं। जो हैं, उनके आधार पर सुनीतिकुमार चाटुर्ज्याने अकर्मक क्रियाओंके निम्नलिखित रूप स्थिर किये हैं :— \quad\quad एकवचन \quad\quad\quad\quad\quad\quad बहुवचन \quad\quad गा \quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad गये \quad\quad भा, भई \quad\quad\quad\quad\quad\quad भये, भई \quad\quad बाढ़ा \quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad बाढ़े \quad\quad आ \quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad\quad आये चन्दायनमें अकर्मक भूतकालिक क्रियाओंके अनन्त रूप मिलते हैं। यथा— परसि भा, आवा, बुलावा, पड़ावा, कहा, चढ़ा छाझौ, बाज्या, लग्गो, सीन्हो भई, प्रकटी, बानी, बखानी, पठाई, दीन्ह, कीन्ह, लीन्ह, भये, बैठे, बीठे, सुनाये, उठाये, गये भयो। उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणमें भूतकालिक सकर्मक क्रियाओंके रूप हैं— कियेसि, दहेसि, पावेसि। चन्दायनमें इसके रूप हैं विवावा भरावा, हँकरावा। यथा— केक दधि दूध परघ विवावा सीप सिधोरा माँग भरावा पाहनराय बोर हँकरावा उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणकी भविष्यत्कालिक अकर्मक क्रियाओंक रूप हैं— करिहौं, करिहसि, करिह, करिहति। चन्दायनम हमें निम्नलिखित ढंगके प्रयोग मिलते हैं:—
१. गोवर नगर वर्णन व लोरिक-चन्दा प्रथम दर्शन (कड़वक १-१००)
१८ जे लगि पड़े सो अमरंपरी जायी (जायेगा) परनइँ माँउ मँगर तिहूँ खायी (खायेंगे) जो जन जान कहहु संवारी (कहना) भविष्यत् कालकी सर्वनाम क्रियाका रूप उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणमें एइव अथवा 'अवइ' मिलता है। यथा—पइब, करब, करव घरब। चन्दायनेमें इन रूपका प्रयोग हुआ है। यथा— जो तुम पर बहु बनिक चलाउब भैंसा बह मैं गोहन आउब कउव बार हम हारब पुम मैं पठउब भविष्यत् कालकी विधि क्रियाका रूप उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणमें करेसु, पढेसु है। चन्दायनेम इस क्रियाका रूप है— पार्ये राग कें सिरजन माँ कैंप आपि सुनायहु होव देव उठान वीर बूझा मिस घर धायहु सिरजब भक हिय समायहु पाटम देस हूँ झोर न जायसि । उपर्युक्त उदाहरणोंसे स्पष्ट है कि चन्दायनेकी भाषा उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणकी भाषासे सर्वथा भिन्न है। यदि उक्ति-व्यक्ति-प्रकरणकी भाषा अवधी है तो चन्दायने की भाषा अवधी नहीं है। चन्दायनेकी भाषाके प्रसङ्गमे श्याम मनोहर पाण्डेयने एक अन्य काव्य रोडा कृत राउल वेलकी चर्चा की है। यह खंडित काव्य एक शिलाफलकपर अंकित और प्रिंस आव वेल्स म्यूजियम बम्बईमें सुरक्षित है। इसका एक पाठ माताप्रसाद गुप्तने हिन्दी अनुशीलनमे प्रकाशित किया है और उसे ग्यारहवीं शताब्दीकी रचना बताया है और उसकी भाषाको दक्षिण कोसली कहा है।¹ श्याममनोहर पाण्डेयने इस आधारपर यह मत प्रकट किया है कि 'अब हम सरलतापूर्वक कह सकते हैं कि दक्षिण कोसलीमें जो अवधीका एक रूप है ग्यारहवीं शताब्दीमें काव्य- रचना हो रही थी।' हमें खेदके साथ कहना पडता है कि दोनों ही विद्वानोंके ये मत नितान्त निराधार हैं। राउल वेलको ग्यारहवीं शताब्दीकी रचना माननेका कोई आधार नहीं है। यह तेरहवीं शताब्दीके आसपासकी रचना है। उसकी भाषा दक्षिण कोसली है इसके लिए माताप्रसाद गुप्तने कोई प्रमाण उपस्थित नहीं किये हैं। इस काव्यमें विभिन्न प्रदेशोंकी स्त्रियोंका रूप वर्णन है और जिस प्रदेशकी स्त्रीका जिस रूपमे वर्णन है उसमें १ हिन्दी अनुशीलन वर्ष ११ अंक १-२ १९५ पृ. १२। २ मध्ययुगीन प्रेमाख्यान पृ. २६ ।
उस प्रदेशकी भाषाके कुछ शब्द-रूपों और क्रियाओका प्रयोग कविने किया है। इस प्रकार इस काव्यमं किसी एक भाषाका स्वरूप नहीं है। यदि इसी तथ्यको स्वीकार करें कि काव्यकी भाषा किसी एक प्रदेशकी भाषा है तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि उसकी भाषा दक्षिण कोसली है। यह शिलालेख मध्य प्रदेश—धारसे प्राप्त हुआ है दक्षिण कोसलसे उसका किसी प्रकार कोई सम्बन्ध नहीं है। श्याममनोहर पाण्डेयकी यह धारणा कि दक्षिण कोसली अवधीका एक पूर्व रूप है, भाषा विज्ञान और इतिहास दोनों दृष्टिसे अन्धताका परिचायक और हास्या- स्पद है। प्राचीन इतिहासमें दक्षिण कोसल उस प्रदेशका नाम है जो आजकल छत्तीस- गढ़के नामसे अभिहित किया जाता है। छत्तीसगढ़ी भाषाका अवधीके साथ किसी प्रकारका नैकट्य है, यह कहना कठिन है। चन्दायनेकी भाषाको अवधी सिद्ध करनेके लिए राउल वेलकी भाषाको अवधीके पूर्व रूपका नमूना नहीं माना जा सकता। साथ ही यह तथ्य भी भुलाया नहीं जा सकता कि राउल वेलकी भाषाका चन्दायनेकी भाषाके साथ एक दृढ़का सादृश्य है। राउल वेलकी वर्तमान कालिक क्रियाएँ—भावइ, छड़ीवइ आदि चन्दायनेकी वर्तमानकालिक क्रिया आवइ, भावइ, सुहावइक अत्यन्त निकट हैं। यह इस बातका द्योतक है कि राउल वेल और चन्दायनेकी भाषाका निकट सम्बन्ध है और उनकी भाषा प्रादेशिक न होकर देशके विस्तृत भागमें प्रचलित भाषाका रूप है। चन्दायनेकी भाषाके व्याकरणकी गहराईसे अध्ययन किये जानेकी आवश्यकता है। तभी भाषाके सम्बन्धमें कुछ निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है। पर यह कार्य ग्रन्थके शुद्ध पाठ उपस्थित किये जानेपर ही सम्भव है। सामान्य रूपेण जो कुछ हम देख और समझ सके हैं उसके आधारपर हमारी धारणा है कि दाउदने अपने काव्यके लिए ऐसी भाषाको अपनाया था जो अपभ्रंश साहित्यकी शब्द-परम्परासे विकसित होकर व्यापक रूपसे देशके विस्तृत भू-भागम प्रचलित थी। यदि वह काव्य विस्तृत क्षेत्रमें बोली नहीं तो समझी अवश्य जाती थी। चन्दायनेमं संस्कृत शब्दोंका प्रयोग बहुत ही कम है उसमें प्राकृत आर अपभ्रंशसे देशज रूपमे ढले शब्दोंका ही बाहुल्य है। सुम्मरन विचक्खन आदि शब्दोंका प्रयोग इस काव्यमें अपभ्रंश परम्पराके अवशेषाके रूपमें देखा जा सकता है। चन्दायनेके शब्दोंका हिन्दीके अनेक प्राचीन काव्योंके साथ तुलनात्मक अध्ययनसे ऐसा ज्ञात होता है कि इस काव्यका उनके साथ निकट का सम्बन्ध है। इसका अथ यह नहीं कि कवि अरबी फारसीके प्रभावसे अछूता है। उसने इन भाषाओँ से भी शब्द लिये हैं पर वे ऐसे हैं जो सम्भवतः भारत-भूमिकी बोलचालकी भाषामें पूर्णतः खप गये थे। फिर भी कहीं-कहीं इन शब्दोंका प्रयोग विचित्र अथवा बेमेल प्रतीत होता है। यथा— मैना उत्तर सो पीर सुनावा ४१।१ (ब्राह्मणके लिए पीरका प्रयोग)। विहँसे साहम राज बराबर ४२१।१ (तीतरके लिए साहम [शोभन])।
१९ ईश्वर गोविन्द चन्द्रावत (कड़ाके लिये पारसी मिया गोविन्द) छन्द योजना सूफी कवियोंके हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंके सम्बन्धमें हिन्दीके विद्वानोंका एक मत है कि उनकी रचना दोहे और चौपाइयोंमें हुई है। यही मत वासुदेवशरण अग्रवालने पदमावतके सम्बन्धमें व्यक्त किया है, किन्तु उनका ध्यान इस तथ्यकी ओर भी गया है कि जहाँ पदमावतकी चौपाई-छन्द मात्रा और तुक दोनों दृष्टियोंसे नियमित है, वहीं दोहोंके विषयमें यह बात खरी नहीं उतरती। दोहा एक मात्रिक छन्द है, जिसकी गणना अर्ध-सम जातिके छन्दोंमें की जाती है। इसके पहले और तीसरे चरणोंमें तेरह-तेरह मात्राएँ और दूसरे और चौथे चरणमें ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ होती हैं। पहले और तीसरे पादकी तुक नहीं मिलती। दूसरे और चौथे चरणोंकी तुक मिलती है। किन्तु जायसीके सैकड़ों ऐसे दोहे हैं, जिनके पहले और तीसरे चरणोंमें यह नियम खरा नहीं उतरता। उनमें तेरहकी जगह सोलह मात्राएँ पायी जाती हैं। इसका उन्होंने यह कहकर समाधान कर लिया है कि दोहेके अनेक भेदोंमेंसे यह भी एक मान्य भेद हिन्दी काव्यमें उस समय स्वीकृत था जिसकी परम्परा मुल्ला दाऊदके समयसे जायसीके कालतक अवश्य विद्यमान थी।१ वस्तुतः यह बात नहीं है। हमारे साहित्यकारोंका ध्यान इस तथ्यकी ओर नहीं जा सका है कि सूफी कवियोंने अपनी रचना पद्धति अपभ्रंश काव्योंसे प्राप्त की है और उन्होंने अपने काव्योंका संयोजन कड़वकोंके रूपमें किया है। स्वयंभूने अपने स्वयम्भू छन्दसम्में कड़वककी जो परिभाषा दी है उसके अनुसार प्रत्येक कड़वकके शरीरमें आठ वमक और अन्तमें एक धत्ता होता है जिसे हुवा दुवई अथवा बडनिका कहते हैं। प्रत्येक वमकमें १६-१६ मात्राओंवाले दो पद होते हैं। हेमचन्द्रने अपने छन्दोनुशासनमें इसी तथ्यको तनिक भिन्न ढंगसे कहा है। उनके मतानुसार कड़वकके शरीरमें ४-४ पंक्तियोंके चार रुन्ध अर्थात् पंक्तियाँ होती हैं। सोलह मात्राओं वाले पदोंकी बात केवल सिद्धान्त रूप है; कवियोंने सोलह मात्राओं वाले पदोंके अतिरिक्त पन्द्रह मात्रा वाले पदोंका भी व्यवहार प्रचुर मात्रामें किया है। अतः कड़वकमें प्रयुक्त होने वाले पद साधारणतया तीन रूपमें पाये जाते हैं:— १. पध्दिका—सोलह मात्राओंका पद। इसमें अन्तिम चार मात्राओंका रूप लघु गुरु लघु (जगण) होता है। २. मदनक—सोलह मात्राओंका पद। इसमें चार मात्राएँ गुरु, लघु, लघु (भगण) होती हैं। कहीं-कहीं इसका दो गुरु रूप भी पाये जाते हैं। १. पदमावत, सं०सं०, पृ. २-३९, प्राक्कथन पृ० १२।
१७ ३ पारणक-पन्द्रह मात्राओंका पद । इसमे तीन मात्राएँ लघु होती हैं। कहीं कहीं लघु गुरु रूप भी मिलता है। आठ यमकों वाली बात भी केवल सिद्धान्त रूप है। उपलब्ध अपभ्रंश काव्यों के कड़बकोंमे ६ से लेकर २० २५ यमक तक पाये जाते हैं। ये इस बातके द्योतक हैं कि कवियोंने आठ यमकों वाला नियम कभी भी कठोरताके साथ पालन नहीं किया। घत्ताके द्विपदी, चतुष्पदी अथवा षट्पदी होनेका विधान है पर अधिकांश घत्ता चतुष्पदी ही पाये जाते हैं। घत्ताक प्रत्येक पद सात मात्राओं से लेकर सत्रह मात्राओंके हुआ करते थे। पदोंकी व्यवस्थाके अनुसार घत्ताके तीन रूप कहे गये हैं-(१) समसम (२) अर्धसम और (३) अन्तरसम। समसम घत्तामें चारों पदोंकी मात्राएँ समान होती हैं और मात्राओंकी संख्याके अनुसार सर्वसम घत्ताके नौ रूप कहे गये हैं। अर्धसम घत्तामें प्रथम दो पदोंकी मात्राएँ एक समान और अन्तिम दो पदोंकी मात्राएँ पहले दो पदोंसे भिन्न किन्तु परस्पर समान होती हैं। मात्राओंकी संख्या-गणनाके अनुसार अर्धसम घत्ताके ११ रूप बताये गये हैं। अन्तरसम घत्तामे प्रथम और तृतीय पदोंकी और द्वितीय और चतुर्थ पदोंकी मात्राएँ समान होती थीं और वह प्रघादबद्ध होता था। अन्तरसम घत्ताके भी मात्रा-भेदसे ११ रूप होते थे। इस प्रकार घत्ताके रूपमें १२१ छन्द रूपोंके प्रयोगका विधान अपभ्रंशके पिंगल शास्त्रोंमे पाया जाता है। इन तथ्याको यदि ध्यानमें रखकर चन्दायनेके छन्दोंकी परखकी जाय तो स्पष्ट ज्ञात होगा कि दाऊदने कड़बकका रूप अपनाया है और उसके शरीरमें पाँच यमक रखे हैं और अन्तमें एक घत्ता दिया है। उसके सभी यमक सोलह मात्राओं वाले नहीं हैं कुछ पन्द्रह मात्राओं वाले भी हैं। चन्दायनेमे प्राप्त दोनों प्रकारके यमकोंके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं :- सोलह मात्राएँ (बदनक) १-कंक पार अस दूँह न आवइ । चाँद सौर मँह भरम दिखावइ ॥-१।३ × × × ओइ बान देखि पाँ कगहि । पाप केत चरनहिं कर नागहिं ॥-२३।४ २-सुन्दर सोंज अरे के हीरा। चहुँ दिशि बैठि विचारथ बीरा ॥-१५।१ पन्द्रह मात्राएँ (पारणक) करै कंक बिसरेकी अर्ना । और कंक पातर कर गुर्ना ॥-२।४ इसी प्रकार दाऊदने घत्ताके भी अनेक रूपोंका प्रयोग अपने काव्यमें किया है। उनके कुछ रूप इस प्रकार हैं :-
१८ १—११ ११ मात्राएँ— सेतु कसीस रोचन भार बांठ चर झांकें । सोवे बेचि घड़ाइ मोंविह मांग भरारें ॥ १३६ (२) ११, १२ मात्राएँ— जे बस लाय समान सरबस बरन के ठेवे । और पाँखि जे मारें हाथन ताँकें को कैवे ॥ १५४ (३) १२ ११ मात्राएँ— सिद्ध पुरुष गुन आगर देखि कुमाने झांकें । कहत सुजत अस आवैं, ह्वैवि फल देजी झांकें ॥ २ (४) १३, ११ मात्राएँ— बरष बरष बोर नौहह, गिलत न भावइ काउ । अन घन पाट पटोर भल, कौतुक भूका राउ ॥ ३१ (५) १६ ११ मात्राएँ— फाँड फिरोबी शाल सुरहुरी दैदै लोग बिसाह । हीर पटोर औ अरु कापड किन पावै सब व्याह ॥ २८ (६) १६ १२ मात्राएँ— गीत बाइ सुर कबित कहामी कथा कहहु गानबहार । मोर मन रँग रँगस सुख राख मूँखसि गर्व गिरहार ॥ ७२ (७) १७ ११ मात्राएँ— तिन संजोग बाजिर सर कोन्हों चौहठ मा परछाइ । राजा हियें व्यय सब बारे, तिक-तिक जरै बुझाइ ॥ ८५ इन व्यवस्थित मात्राओंवाले धत्ताके अतिरिक्त कुछ धत्ता ऐसे भी हैं जिनके चारों चरणोंकी मात्राओंमें भिन्नता है । यथा— ११ १३ १२ ११ मात्राएँ— सहस कराँ सुरजर्क रहे चाँदरा कित छाइ । घोरह कहाँ चाँद कै नई अमावस आइ ॥ १४० इस प्रकार मात्रा भेदसे युक्त धत्ताके अनेक रूप चन्दायणमें देखे जा सकते हैं जिनमें चरणोंकी मात्राओंमें परस्पर कोई साम्य नहीं है; पर उनका उल्लेख यहाँ जान बूझकर नहीं किया जा रहा है । उनपर ग्रन्थकी एक आध अन्य प्रतियोंके प्राप्त होने और उनके तुलनात्मक अध्ययन के पश्चात् ही विचार करना उचित होगा । जो सामग्री उपलब्ध है उससे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि चन्दायणमें
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१२, ११ मात्रावाले पद्योका जिसे दोहा भी कहा जा सकता है बहुत ही कम प्रयोग हुआ है। उसमें १२, ११ और १६ ११ मात्रावाले पद्य प्रमुख हैं और अधिक मात्रामे मिलते हैं। रचना-व्यवस्था मुसलमान कवियों द्वारा रचित हिन्दी प्रेम-गाथा काव्योंके सम्बन्धमें रामचन्द्र शुक्लने इस बातकी ओर ध्यान आकृष्ट किया है कि इनकी रचना बिल्कुल भारतीय चरितकाव्योंकी सर्ग-बद्ध शैलीपर न होकर फारसी मसनवियोंके ढंगपर हुई है, जिनमें कथा सर्गों या अध्यायोंमें विस्तारके हिसाबसे विभक्त नहीं होती, बराबर चली जाती है, केवल स्थान-स्थानपर घटनाओं या प्रसंगोंका उल्लेख शीर्षक रूपमें रहता है। मसनवीके लिए साहित्यिक नियम तो केवल इतना ही समझा जाता है कि सारा काव्य एक ही मसनवी छन्दमें हो पर परम्परा के अनुसार उसमें कथारम्भके पहले ईश्वर स्तुति पैगम्बरकी वन्दना और उस समयके राजा (शाहेवक्त) की प्रशंसा होनी चाहिए। ये बातें पद्मावत, इन्द्रावत, मिरगावती इत्यादि सबमें पायी जाती है। तुर्की मसनवियोंके सम्बन्धमें गिब्बका कथन है कि मसनवीका आरम्भ अल्लाहकी वन्दनासे होता है। तदनन्तर उसमें रसूलकी वन्दना होती है और उनके मेराजका उल्लेख रहता है। पश्चात् समसामयिक शासक अथवा किसी अन्य महान व्यक्तिकी स्तुति की जाती है। और फिर पुस्तकके लिखनेके कारणपर भी प्रकाश डाला जाता है। लगभग यही बातें पारसी मसनवियोंमें भी पायी जाती हैं। निजामीने अपने लैला मजनूँमें हम्द शीर्षकसे ईश्वरका गुणगान किया है और फिर नातके अन्तर्गत रसूलकी प्रशंसा है और उनके मेराजका उल्लेख है। तदनन्तर कविने पुस्तक लिखनेके कारणपर प्रकाश डाला है और अपने पीरकी चर्चाकी है। अन्तमें अपने पुत्रको नसीहत दी है। खुसरो-शीरींमें भी निजामीने क्रमशः ईश्वरकी प्रशंसा रसूलकी नात शाहेवक्तको दुआ और पुस्तक लिखनेका कारण दिया है। इसी प्रकार अमीर खुसरोने भी खुदाकी तारीफ रसूलकी नात मेराजके बयान शेख निजामुद्दीनके गुणगान शाहेवक्त—अलाउद्दीन खिलजीकी प्रशंसा कर तथा पुस्तक लिखनेका कारण बताकर अपनी पुस्तक मजनूँ-लैलाका आरम्भ किया है। खुसरोके शीरीं फरहादमें भी यही बातें पायी जाती है। जामीने यूसुफ जुलेखा और फैजीने नल-दमनका भी आरम्भ इसी प्रकार किया है। फिरदौसीके शाहनामेंमें भी ये सभी बातें उपलब्ध हैं। मुसलमान कवियों द्वारा रचित हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंका भी प्रारम्भ उपर्युक्त मसनवियोंके समान ही हुआ है। दाउदने चन्दायनमें ईश्वर और पैगम्बर की वन्दनाकर चार यारोंका उल्लेख किया है, फिर शाहेवक्त—फीरोजशाह तुगलककी प्रशंसाकर अपने गुरुकी वन्दनाकी है और अपने आश्रयदाताका वर्णनकर ग्रन्थ रचनाक
सम्बन्धमें कहा है। कुतुबनकी मिरगावतके जो अंश उपलब्ध हैं, उनसे ज्ञात होता है कि उसका भी प्रारम्भ ईश्वरकी वन्दनासे हुआ है। मंझनने भी मधु-मालतीमें हम्द, नात, रसूलके चार यारों शाहेवक्तकी स्तुति करते हुए काव्यका रचना-काल तथा अपना संक्षिप्त परिचय दिया है। मलिक मुहम्मद जायसी आदि परवर्ती कवियोंने भी इसी परम्पराको ग्रहण किया है। अरबी-फारसीके मसनवियों और हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंकी ये समानताएँ रामचन्द्र शुक्लके कथनको पुष्ट करती हुई यह कहनेको विवश करती हैं कि मुसल- मान कवियोंने अपने काव्योंमें इस परम्पराको अरबी-फारसी मसनवियोंको देखकर ही अपनाया होगा। पर साथ ही इस बातकी भी उपेक्षा नहीं की जा सकती कि ये बातें केवल अरबी-फारसी मसनवियोंकी परम्परामें सीमित नहीं हैं। भारतीय काव्य-परम्परा भी इन बातोंसे भली प्रकार परिचित रहा है। अरबी-फारसी मसनवियों और हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंकी लगभग वे सभी बातें जैन अपभ्रंश-काव्यमें पायी जाती हैं। प्रायः सभी जैन अपभ्रंश काव्योंका आरम्भ 'जिन'की वन्दनासे होता है। किसी- किसीम जिन-वन्दनाके बाद सरस्वतीकी भी वन्दना पायी जाती है। तदनन्तर उनमें समकालिक शासकका उल्लेख, कविका आत्म-परिचय और आश्रयदाताकी चर्चा है और रचनाका कारण बताया गया है। उदाहरण स्वरूप पुष्पदन्त कृत महापुराण, स्वयंभू कृत पउमचरित और श्रीधर कृत पासनाहचरिउ देखा जा सकता है। हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंके सम्बन्धमें फारसी मसनवियोंकी जिस दूसरी विशेषताकी ओर लोगोंका ध्यान गया है, वह है उनमें पायी जानेवाली प्रस्तोरी सूक्तियों। निजामी, अमीर खुसरो, जामी, फैजी सभीने अपनी मसनवियोंमें प्रसङ्ग के अनुकूल शीर्षक दिये हैं। ठीक उसी ढंगके शीर्षक चन्दायमकी सभी फारसी प्रतियोंमें प्रत्येक कड़वकके ऊपर दिये गये हैं और अन्य काव्योंकी प्रतियोंमें भी पाये जाते हैं। अतः इसमें भी इन कवियोंका फारसी मसनवियोंका अनुकरण परिलक्षित होता है। पर इसी ढंगके शीर्षक अपभ्रंश काव्योंमें भी पाये जाते हैं। संस्कृत साहित्य शास्त्रके अनुसार किसी महाकाव्यमें कमसे कम आठ सर्ग होने चाहिए जो न तो बहुत छोटे हों और न बहुत बड़े। इस प्रकारका सर्गबन्ध हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंमें न होनेसे यह मान लिया गया है कि ये फारसी मसनवियोंके अनुकरणपर रचे गये हैं, जहाँ सर्ग जैसा कोई विभाजन नहीं मिलता। किन्तु इस धारणामें भी कोई विशेष बल नहीं है। यह बात न भूलनी चाहिए कि अपभ्रंशमें सर्गहीन काव्योंकी कमी नहीं है। हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंका रूप उन काव्योंसे किसी भी रूपमें भिन्न नहीं है। हिन्दी प्रेमाख्यानक काव्योंके कथा-वस्तु सचमुच भारतीय हैं और वे भारतीय कथानक रूढ़ियोंपर ही आधारित हैं। उनमें कहीं भी अरबी या फारसी प्रभाव नहीं मिलता। ऐसी स्थितिमें यह समझना कठिन है कि इन कवियोंने अपने काव्यके बाह्य रूपके लिए भारतीय काव्योंसे इतर कहींसे प्रेरणा प्राप्तकी।
४१ कथा-वस्तु चन्दायनमें कथाका आरम्भ १८वें कड़वकसे होता है। उसकी कथा इस प्रकार है — १—गोबर महरका स्थान था। (यह सूचना देकर कविने गोबरके अमराइयों, सरोवर, मन्दिर, खोंट बुंग, नगर निवासिया, सैनिकों, बाजार-हाट, बाजीगरों, राज दरबार और महल आदिका वर्णन किया है।) (१८ ३१) २—राव महर के चौरासी रानियाँ थीं। उनमें फूलरानी पट्टमहादेवि (प्रधान रानी) थीं। (३२) ३—सहदेव (राव महर)के घर चाँदने जन्म लिया। धूमधामसे उसकी छठी मनायी गयी। बारहवें महीने महरकी बेटीकी प्रशंसा क्षार-समुद्र भाभार, गुजरात, तिरहुत, अवध और बदायूँ तक फैल गयी और राजाके पास चाँदसे विवाह करनेके संदेश आने लगे। जब चाँद चार बरसकी हुई तो बींत (अथवा जेठ) ने नाइ-ब्राह्मण डुलाकर अपने बेटे बावनसे चाँदका विवाह कर देनका सन्देश सहदेवके पास भेजा। उन्होंने जाकर सहदेवको यह सम्बन्ध स्वीकार करनेको समझाया और सहदेवने विवाह करना स्वीकार कर लिया। बारात आयी बावनके साथ चाँदका विवाह हो गया और दान दहेज देकर लोग चले गये। (३३ ४४) ४—विवाहको हुए बारह बर्ष बीत गये। चाँद पूर्ण यौबना हो गयी पर उसका पति छोटा होने कारण कभी उसकी शैय्यापर सोने नहीं आया। इससे वह शोकाकुल रहने लगी। उसकी काम व्यथाके विलापको उसकी ननदने सुना और जाकर अपनी माँसे कहा। यह सुनकर महरि (चाँदकी सास) दौड़ी हुई उसके पास आयी और उसे समझाने लगी। चाँदने सासकी बातोका उत्तर दिया। सासने क्रुद्ध होकर तत्काल मैके भेज देनेकी बात कही। अब चाँदको उस घरमे रहना दूभर लगने लगा। उसने ब्राह्मण बुलाकर अपने पिताके पास कहलाया कि भाईको पालकी कहारके साथ भेजकर मुझे शीघ्र बुला लें। ब्राह्मणने आकर चाँदकी बात महरसे कही और महरने तत्काल आदमीको भेजकर उसे बुला लिया। (४५-५१) ५—चाँद मैके लौट आयी। लोगोंने उसे महण धुलाकर उसका शृङ्गार किया। सखी-सहेलियाँ उसे देखने आयीं। वे हँसती हुई चाँदको बाहर लिवा ले गयीं और चौरहरपर ले जाकर उससे पति-सहवासके सुख-भोगकी बातें पूछने लगीं। चाँदने उन्हें अपनी काम-व्यथा कह सुनायी। (यह सम्भवतः बारहमासाके रूपमें व्यक्त किया गया है, पर वह केवल संक्षिप्त रूपमें ही प्राप्त है।) (५२-६६) ६—कहींसे गोबरमे एक बाजिर (मजहबी साधू) आया और वह गाता और भीख माँगता नगरमे घूमनेमे लगा। एक दिन चाँद अपने चौरहरपर खड़ी होकर झरोखे से झाँक रही थी कि उस बाजिरने अपना सिर ऊपर उठाया और चाँदको झरोखेपर देखते ही वह मूर्च्छित हो गया। लोग उसके चारों ओर जमा हो गये और उसके मुँहपर
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पानी छिड़कने लगे। उन्होंने उससे इस प्रकार मूर्च्छित हो जानेका कारण पूछा। उसने उत्तरमें घुमा फिराकर चाँदके सौन्दर्य वर्णन और उसके प्रति अपनी आसक्तिकी बात बतायी। फिर राय महरके भयसे वह गोबर नगर छोड़कर चला गया। (६६-७०) ७—बाजिंद एक मास तक इधर उधर घूमता रहा फिर वह एक नगरमें पहुँचा। (हमारे पास उपलब्ध सामग्रीमें इस नगरका नाम नहीं है पर बीकानेर प्रतिमें कदाचित् उसका नाम राजापुर बताया गया है।) एक दिन रातको जब बाजिंद चाँदके विरहका गीत गा रहा था तब राजा रूपचन्दने उसे सुना और उसे बुलवाया। (७१-७९) ८—बाजिन्दने आकर राजा रूपचन्दसे कहा—'उज्जैन मेरा स्थान है, जहाँका राजा विक्रमादित्य बड़ा धर्मनिष्ठ है। मैं चारों भुवन घूमता हुआ गोबरक सुन्दर नगरमें पहुँचा। वहाँ मैंने चाँद नामक एक स्त्री देखी जो मेरे मनमें पत्थरकी लकीर बनकर समा गयी है। उसकी टीस मेरे मनमें दिन-दिन सवाई होती जा रही है। यह सुनकर रूपचन्दके मनमें चाँदके रूप-गन्ध विस्तारके साथ जाननेकी जिज्ञासा जागी और उसने बाजिन्दका सम्मान कर उससे चाँदका रूप विस्तारके साथ कहनेका अनुरोध किया। तब बाजिंदने चाँदकी मांग केश ललाट, भौंह नैन नासिका बाज़ू दाँत जिह्वा कान सिंग ग्रीवा भुजा कुच पेट पीठ, बाहु, पग और गति आकार, वस्त्र और आभूषन सबका विस्तारके साथ वर्णन किया। (७१-९५) —चाँदके रूप-वर्णनको सुनकर रूपचन्दने बँगको सेना तैयार करनेका आदेश दिया और सेनाने कूच किया। (कविने यहाँ रूपचन्दकी सेनाके हाथी घोड़ी आदिका कथन किया है।) मार्गमें अपशकुन हुए पर उसने उनकी तनिक भी परवाह न की और गोवर नगरको जाकर घेर लिया। (९६-१०३) ९ —रूपचन्दकी सेनाके आनेसे गोबर नगरम आतंक फैल गया। तब महर सहदेवने राजा रूपचन्दके पास दूत भेजा कि वे पता लगायें कि उसने किस कारण घेरा डाला है और उसका आदेश क्या है। दूत आकर रूपचन्दके पास उपस्थित हुए। राजाने दूतोंकी बात सुनकर कहा कि चाँदका मेरे साथ तत्काल विवाह कर दो। दूतोंने रूपचन्दको समझानेकी चेष्टा की पर वह न माना और दूतोंपर क्रुद्ध हुआ और चले जानेको कहा। दूतोंने लौटकर रूपचन्दकी माँग कह सुनायी। तब महर सहदेवने अपने साथियोंसे परामर्श किया। कुछ लोगोंने तो कहा कि चाँदको दे दीजिए। कुछको चाँदकी माँगकी बात सुनकर क्रोध आ गया। अन्ततोगत्वा रूपचन्दसे लोहा लेनेका निश्चय हुआ और युद्धकी तैयारी होने लगी। (यहाँ कविने महरके अस्त्र, अश्वारोही धनुर्धर, रथ हाथी आदिका कथन किया है)। (१०३-११६) १० —दूसरे दिन रूपचन्द दुर्गकी ओर बढ़ा और महर भी युद्धके लिए बाहर निकलकर आया। युद्ध आरम्भ हुआ। महरके प्रमुख योद्धा मारे गये। यह देखकर भटने महरसे कहा कि आपके पास ऐसे वीर नहीं हैं जो रूपचन्दके सैनिकोंको परास्त कर सकें। आप तत्काल लोरिकका बुलावा भेजिये। (११७-१२१)
१२-तब महरने भाटसे कहा कि तुम्हीं दौड़कर लोरकके पास जाओ और उसे बुला लाओ। भाट तत्काल घोड़ेपर सवार होकर लोरकके पास पहुँचा और महरका सन्देश कह सुनाया। सुनते ही लोरक युद्धमें जानेके लिए तैयार हो गया। यह देखकर उसकी पत्नी मैना उसके सामने आकर खड़ी हो गयी और युद्धमें जानेसे उसे रोकने लगी। लोरकने कहा- मुझे युद्धमें जानेके लिए तिलक लगाकर आशीर्वाद दो कि मैं बाँठा (रूपचन्दका एक वीर) को मारकर घर आऊँ। मैं लौटकर तुम्हें सोनेके गहने बनवा दूँगा और मोतियोंसे तेरी माँग भराऊँगा। तब पत्नीने विदा दी और लोरक अखपीक पर गया। अखपीसे युद्ध-कौशलकी दीक्षा लेकर वह महरके पास पहुँचा। महरने उसे पानक तीन बीड़े दिये और कहा कि तुम जीतकर आओगे तो तुम्हें सुसज्जित घोड़ा भेंट करूँगा। (१२१ १२७) १३- लोरक अपनी सेना लेकर युद्ध क्षेत्रकी ओर चला। उसकी सेना देखकर रूपचन्द भयभीत हो गया और दूत भेजकर कहलाया कि एक-एक वीर आपसमें लड़े तो अच्छा हो। महरने उसकी बात मान ली तदनुसार दोनों ओरके वीर एक-एक कर सामने आकर लड़ने लगे। अन्तमें रूपचन्दकी ओरसे बाँठा आगे आया और महरने उसका सामना करनेके लिए लोरकको भेजा। युद्धमें बाँठा हार गया। फिर लोरक और रूपचन्दमें युद्ध हुआ और वह हारकर भाग खड़ा हुआ। लोरकने उसका पीछा किया और उसे भगा दिया। (१२८ १४१) १४- युद्ध जीतकर महर गोबर पहुँचा और लोरक वीरको बुलाकर उसे पान का बीड़ा दिया और हाथीपर बैठाकर उसका जुलूस निकाला। रानियाँ धौरहरपर खड़ी होकर उसे देखने लगीं। ब्राह्मणोंने लोरकको आशीर्वाद दिया गोवरमें आनन्द मनाया जाने लगा। (१४४) १५- चाँद भी अपनी दासी बिरस्पतको लेकर धौरहरके ऊपर गयी और उससे लोरकको दिखानेको कहा। बिरस्पतने उसे दिखाया। लोरकको देखते ही चाँद विकल होकर मूर्छित हो गयी। बिरस्पतने उसके मुखपर पानी छिड़का और बोली कि अपनेको सम्हालो। जो तुम्हारे मनमें है उसे कहो मैं उसे रात बीतते ही पूरा करूँगी। (१४५ १४८) १६- दूसरे दिन प्रातःकाल जब बिरस्पत आयी तो चाँदने कहा- जिसे मैंने कल देखा उसे या तो मेरे घर बुलाओ या मुझे उसके निकट ले चलो। बिरस्पतने कहा कि मैं लोरकको अपने घर बुलानेका उपाय तुम्हें बताती हूँ। तुम अपने पितासे गोवर के नागरिकोंको ब्योनारपर बुलानेके लिए कहो। यह सुनते ही चाँद महरके पास गयी और बोली कि मैने मनौती मानी थी कि जब मेरे पिता रण जीतकर आयेंगे तब सब लोगोंको निमंत्रित कर भोजन कराऊँगी। चाँदकी बात सुनते ही महरने भाट बुलाकर सारे गोवरमें ब्योनारका निमंत्रण भेज दिया और नाई दसों दिशामें जाकर निमंत्रण दे आय। महरने बहेलियोंको शिकार करने और बारियोंको पत्ते लानेके लिए भेजा।
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(कविने यहाँ शिकारियों द्वारा लाये पशु-पक्षियों तथा भोजन-सामग्री तरकारी, पकवान, चावल, रोटी आदिका विस्तारपूर्वक वर्णन किया है।) (१४९-१६०) १७—नागरिक लोग महरके घर आये और ज्योनारपर बैठे। तब चाँद शृंगार कर भौंहरपर आकर खड़ी हुई। उसे देखकर लोरक खाना भूल गया। उसके लिए भोजन विषवत हो गया। पर लोटते ही वह चारपाईपर पड़ गया। यह देखकर उसकी माँ लोरिकिन विलाप करने लगी। कुटुम्बी जन आदि एकत्र हुए, पण्डित, वैद्य सयाने बुलाये गये। सभीने कहा कि उसे कोई रोग नहीं है। वह काम-विद्ध है। (१६१-१६५) १८—बिरहपत बाजार गयी तो उसके कानोंमें लोरिकिनका करुण विलाप पड़ा। वह उसके घर पहुँची और रोनेका कारण पूछा। लोरिकिनने लोरककी दुरवस्था कह सुनायी। सुनकर बिरहपतने पूछा कि तुम्हारा रोगी कहाँ है, मैं उनके रोगकी औषधि जानती हूँ। लोरिकिन उसे लोरकके पास ले गयी। बिरहपतने उनके अंग-अंगको देखा फिर बोली—मैं महरके भण्डारकी भण्डारी और चाँदकी धाय हूँ। मैं बुलानेपर आयी हूँ; आँख खोलकर अपनी बात कहो। चाँदका नाम सुनते ही लोरक चैतन्य हो गया और बोला कि लज्जाके कारण अपनी व्यथा नहीं कह सकता। यह सुनकर लोरिकिन अलग जा खड़ी हुई और तब लोरकने अपने मनकी व्यथा बिरहपतसे कह सुनायी। बिरहपतने इस बातको भूल जाने को कहा। लोरक उसके पाँव पकड़कर चाँदसे मिलन करा देनेका अनुरोध करने लगा। बिरहपत द्रवित हो उठी और बोली कि तुम शरीरमें भस्म लगाकर जोगी बन कर मन्दिरमें चलकर बैठो। वहाँ दर्शनके लिए चाँद आवेगी तुम सचेष्ठान देखते रहना। यह कहकर बिरहपत बाहर निकली। निकलते ही लोरिकिनने उसके पैर पकड़ लिये। बिरहपत ने कहा कि तुम्हारा रोगी अच्छा हो गया है। नहा-धोकर पूजा करो और लोरकको नहला-धुलाकर उसपर कुछ धन न्योछावर कर उसे शहर भेज दो। यह कहकर वह चाँदके पास लौट गयी। (१६६-१७३) १९—बिरहपतके कथनानुसार लोरक जोगी बनकर मन्दिरमें जा बैठा। वह एक वर्षतक मन्दिरकी सेवा और चाँदके प्रेमकी कामना करता रहा। कार्तिकमें जब दीवाली का पर्व आया तब चाँद अपनी सखियोंको लेकर दीवाली खेलने जाने लगी। रास्तेमें उसका हार टूट गया और मोती बिखर गये। तब बिरहपतने चाँदसे कहा कि तुम मन्दिरमें चलकर आराम करो। ये सखियाँ हार हीरोकर लायेंगी। यह सुनकर चाँद मन्दिरके भीतर चली गयी। धाय (बिरहपत)ने मन्दिरके भीतर झाँककर कहा कि इस मन्दिरमें एक महात्मा आये हुए हैं, उनके देखते ही सारे पाप भाग जाते हैं। चाँदने उस महात्माके पास जाकर शीश नवाया। जोगी चाँदको देखते ही मूर्छित हो गया। चाँद मन्दिरसे बाहर निकल आयी और बिरहपतके पूछनेपर जोगीकी स्थिति कह सुनायी। इतनेमें सहेलियोंने हार पिरोकर दिया और चाँदने उसे गलेमें पहन लिया। तब बिरहपत बोली कि शाम हो रही है अभी घर चलो घरपर महरि बाट देख रही होंगी। (१७४-१८१)
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२ —चाँदको देखकर मूच्छित होनेके पश्चात् होशमें आनेपर लोरक विलाप और अपनी स्थितिपर खेद प्रकट करने लगा। तब मन्दिरके देवताने बताया कि अप्सराओं का एक समूह आया था। उन्हींमेंसे एकको देखकर तुम मूच्छित हो गये। (१८२ १८४) २१—उधर चाँदने बिरहपतको बुलाकर अपनी व्याकुलता दूर करनेको कहा। तब बिरहपतने मन्दिरमें बैठे जोगीकी ओर संकेत किया। चाँदने उसे मजाक समझा। बोली—जिस दिनसे लोरकको देखा है, वह मेरे मन बस गया है। मैं उसकी हूँ और वही मेरा पति है। तब बिरहपतने बताया कि वही लोरक तो तेरा भिखारी है और तेरे दर्शनके निमित्त ही तो वह योगी बना बैठा है और तुझे देखते ही मूच्छित हो गया था। तब चाँद बिरहपतसे बोली—तूने नहीं बताया कि मन्दिरम लोरक है। नहीं तो उसके योग्य मैं भक्ति-मुक्ति करती। उसके फूल भरे बचन सुनती। खैर, तुम जाकर कहो कि अब वह अपना मरम और कन्था उतार दे। बिरहपत पान-मिठाइ लेकर मन्दिरमें गयी और लोरकसे जोगीका वेश त्यागकर घर जानेको कहा। लोरक बागी वेश त्यागकर अपने घर गया और बिरहपतने आकर यह सूचना चाँदको दी। (१८४-१९१) २२—घर आकर लोरक चाँदके विरहमें स्थिर न रह सका और बार-बार मन्दिर की ओर जाता और चाँदके लिए रोता रहता। सारे दिन वह बन नगरम घूमता रहता और रातको गोवरमें आता—कदाचित् एक क्षणके लिए चाँद दिखाइ दे जाय। उधर चाँद भी लोरकके वियोगमें छटपटाती रहती। उसकी समझमें ही नहीं आता कि लोरक से किस प्रकार मिलाप हो। अन्तमें उसने एक दिन बिरहपतको लोरकके पास भेजा। बिरहस्त लोरकको साथ लाकर चाँदके चौखरका मार्ग दिखा गयी। (१९२ १९८) २३—लोरकने बाजार जाकर पाट खरीदा और उसका तीस हाथ लम्बा एक बरहा (मोटा रस्सा) तैयार किया। उसमें बीच-बीचमें गाँठें लगायी और ऊपर एक अँकुरा बाँधा। उसे देखकर मैनाने पूछा कि यह बरहा क्या होगा तो लोरकने कहा कि एक भैंस बिगडैल हो गयी है उसे बाँधूँगा ! (१९९) २४—भादोंकी घोर अँधेरी रातमें लोरक बरहा लेकर चला। मगर अँधेरेमें उसे कुछ पता ही नहीं चलता था कि चाँदका आवास किधर है। इतनेमें बिजली कौंधी और लोरकने उसे पहचान कर बरहेको जोरौसे ऊपर फेंका। बरहा जब ऊपर पहुँचा तो उसकी आवाजसे चाँद जागी और अँकुरीको बीरममैसे लगा देखा। उसने नीचे झाक कर देखा तो लोरकको खडा पाया। उल्हास उसने अँकुरी निकालकर बरहेका नीचे गिरा दिया। लोरक बार-बार बरहा ऊपर फेंकता और हर बार चाँद हँसकर उसे नीचे गिरा देती। जब उसने अनुभव किया कि लोरक परेशान हो गया है और अब यदि कुछ करती हूँ तो वह नाराज होकर चला जायगा और फिर कभी न आयेगा तो वह अपने कियेपर पछताने लगी। जब फिर बरहा ऊपर आया तो दौड़कर उसने उसे पकड लिया और उसे खींचकर खम्भेत्तक लायी। जब लोरकको रस्सीके सहारे ऊपर आते देखा तो वह चुपचाप चारपाईपर जाकर लेट गयी। लोरकने ऊपर आकर चाँदका
४६ शयनागार देखा । (यहाँ कविने चीसगड़ीकी चित्रकारी, सुगन्ध, शय्या आदिका वर्णन किया है ।) (२ १०) २५—लोरकने चाँदाको जगाया । और तब चाँद और लोरकमें ठण्ड-उत्तपकी बात हुई । पहले तो चाँदने लोरकको धिक्कारा फिर उठकर अपना प्रेम प्रकट किया और अन्तमें दोनों हँसी मजाक और केलि-क्रीडामें रत हो गये । (२ ८-२१५) २६—सुबह हुई तो चाँद भयभीत हुई और इसके पूर्व कि दासियाँ आवें, उसने लोरकको शय्याके नीचे छिपा दिया । जब दासियाँ मुँह धोनेके लिए पानी लेकर आयीं तो उन्हें चाँदकी अस्त-व्यस्त अवस्था देखकर समझते देर न लगी कि 'सँवर फूलपर बैठा था' । चाँदने बात बनानेकी चेष्टा की कि रातको बिल्ली कमरेमें घुस आयी थी और मेरे ऊपर कूद पड़ी । उसके नख लग गये । वह तो भाग गयी, लेकिन रातभर मुझे नींद नहीं आयी । विरहस्तने जाकर महरिको सूचना दी कि चाँद रातमें बिल्लीके कूदनेके कारण डर गयी है । चलकर कोई उपाय कीजिए । सुनते ही माता पिता सब लोग जमा हो गये । चाँद और लोरक दोनों मन ही मन भयभीत होने लगे । किसी किसी तरह शाम हुई और चाँदने लोरकको बाहर निकाला और प्रतिज्ञाकी कि मैं तुम्हारी विवाहिता सदृश हूँ और तुम मेरे विवाहित पति हो । यह कहकर लोरकको विदा किया और उसे रास्ता दिखाने नीचे आयी । लोरक महलसे निकलकर तेजीसे चला । इतनेमें द्वारपाल लाँघा और पदचाप सुनकर बाहर आया । चाँदने उससे कहा कि मैं फूल छूनेके लिए बाग देखनेको फेरी लगाने आयी हूँ । (२१६-२३१) २७—चाँद अपने नौहरमें पहुँचकर विचार करने लगी कि वह दिन कब आवेगा जब लोरकसे फिर भेंट होगी । राशि गणना करनेपर उसे ज्ञात हुआ कि अब उससे उस दिन मिलना होगा जिस दिन वह उसे गङ्गा पारकर हरदी ले जायेगा । (२३६) २८—लोरक जब घर पहुँचा तो मैनाने पूछा कि तुमने रात कहाँ बितायी किस स्त्रीके साथ भोग विलास किया । लोरकने हँसकर बात टाल दी और कहा कि राजा पाश दलनेमें सारी रात बीत गयी । (२३४) २९—महर और महरिको ज्ञात हो गया कि रातमें महलमें कोई पुरुष आया था । फिर यह बात दास-दासियों नाई-बारीके मुखसे गाँवभरमें घर घर फैल गयी । मैना के कानमें भी उसकी भनक पड़ी । सुनते ही वह अत्यन्त व्यथित हो उठी । मैना की यह अवस्था देखकर पण्डितने उससे उसका कारण जानना चाहा और उसकी बात सुनकर उसे समझानेकी चेष्टाकी । लोरकको भी कुछ आभास मिला कि बात मैनापर प्रकट हो गयी है । तब वह उससे प्रेम भरी बातें करने लगा । मैना क्रुद्ध हो उठी; दोनोंमें कहा सुनी हुई । पण्डितने बीचमें पड़कर मामला शान्त किया । ( १५ २४०) ३ —पण्डितने चाँदसे कहा कि असाढ की दूजको मयावीका पर्व आ रहा है । उस दिन लोग खाण्डार करके सोमनाथ की पूजा करें तो तुम्हारी मनोकामना पूरी