चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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मूलग्रन्थ
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कासी बम्बई भनेर शरीफ रीजेन्ट्स पंजाब
पर इस प्रकारकी प्रति-परम्परा और पाठ-सम्बन्धको व्यक्त करनेवाली यह सामग्री अत्यल्प है। उनके आधारपर केवल १२ कड़बकोंका ही कोई संयुक्त पाठ उपस्थित किया जा सकता है। यह अल्प असंबद्ध सामग्रीके बीच बेमेल जान पड़ेगा। अतः इनके लिए भी रीजेन्ट्सवाले पाठ मूल रूपमें और शेष पाठ विकल्प रूपमें दिये गये हैं। कहीं कहीं जहाँ रीजेन्ट्स प्रतिका पाठ स्पष्ट रूपसे विकृत लगा, वहाँ विवेकके सहारे दूसरी प्रतिका पाठ मूलमें ग्रहण कर लिया गया है। पर ऐसे स्थल कम ही हैं।
भाषा
रामचन्द्र शुक्लने जायसी-ग्रन्थावलीकी भूमिकामें लिखा है :—'ध्यान देनेकी बात है कि ये सब प्रेम-कहानियाँ पूरबी हिन्दी अर्थात् अवधी भाषामें एक नियत क्रमके साथ केवल चौपाई-दोहेमें लिखी गयी हैं।' १ अभीतक जितने भी हिन्दी-सूफी-काव्योंके अध्ययन प्रस्तुत किये गये हैं प्रायः उन सबमें यह तथ्य ज्योंका त्यों स्वीकार कर लिया गया है। फलस्वरूप चन्दायनकी भाषाके सम्बन्धमें भी यही समझा जाता है कि उसकी भाषा अवधी होगी। श्याममनोहर पाण्डेयने मध्य-युगीन प्रेमाख्यानमें अत्यन्त विश्वासके साथ लिखा है—'डालमऊ क्षेत्रमें अवधी बोली जाती थी। अतः जनतामें अपने सन्देश प्रसारित करनेके लिए मुल्ला दाऊदने अवधीका ही चयन करना उपयुक्त समझा होगा। सूफी कवि जिस क्षेत्रमें रहे हैं, वहाँकी भाषामें काव्य लिखते रहे हैं। पंजाबके सूफी कवियोंने पंजाबी में 'ससिवुन्नो' 'हीर राँझा' आदि कथाओंको सूफियाने ढंगसे पंजाबीमें लिखा। इसी प्रकार दौलत काजी, अलाउल आदि कवियोंने जो बंगालके रहनेवाले थे बँगलामें लिखा। अतः डालमऊका कवि अवधी क्षेत्रमें रहकर अवधीमें लिखता है तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये। पर हमें आश्चर्य यह देखकर होता है कि हमारे विद्वान इस बातकी तो तर्कपूर्ण कल्पना कर सकते हैं कि दाऊद डालमऊके थे और डालमऊ अवधमें है, अवध की भाषा अवधी कहलायेगी अतः दाऊदकी भाषा अवधी ही होगी पर इस वास्तविक
१. चतुर्थ संस्करण, सं. २०१७ पृ. ४। २. मध्ययुगीन प्रेमाख्यानक काव्य परम्परा, पृ. १७०