चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
पृष्ठ 435, कुल 520 में से
संदर्भ में पढ़ें४२ एक दिन रातको चानैन एक पेड़के नीचे सो रही थी कि उसे एक साँप ने डँस लिया और वह मर गयी। लोरिक उसके वियोगमें इतना दुखी हुआ कि चिता बनाकर चानैनके शवके साथ स्वयं जा बैठा और आग लगा दी। किन्तु तभी अदृश्य शक्तिने आकर उसकी अग्नि बुझा दी। लोरिकने पुनः आग लगायी और फिर उसी अदृश्य शक्तिने उसे बुझा दिया। यह क्रम कुछ देर तक चलता रहा। आकाशमें देवता यह देखकर बहुत चिंतित हुए कि एक पति अपने दिवंगत पत्नीकी चिता पर जल मरनेका प्रयत्न कर रहा है। अतः उसे इस कार्यसे विरत करनेके लिए उन्होंने दुर्गाको पृथ्वी पर भेजा। दुर्गा बुढ़ियाका रूप धारण कर लोरिकके पास आयीं और उसे समझाने लगीं कि वह चितापर न जले। किन्तु लोरिक अपने निश्चयसे टससे मस न हुआ। अन्ततोगत्वा हार मानकर दुर्गाने उसकी पत्नीको जीवित करनेका वचन दिया और जिस साँपने चानैनको डँसा था उसे बुलवाया। साँपने आकर घावसे अपना सारा जहर चूस लिया और चानैन पुनः जीवित हो गयी। दोनों प्रेमी वहाँसे आगे बढ़े और रोहिनी पहुँचे जहाँ महापतिवा नामक सुनार राज्य करता था। उस राजाके कर्मचारियोंने वहाँ उन्हें घेर कर महलमें चलकर जुआ खेलनेका आग्रह किया। राजा महाधूर्त था। उसने अपने बनाये हुए पासेसे जुआ खेलकर लोरिकका सब कुछ यहाँ तक कि उसकी सुन्दरी पत्नी चानैनको भी, जिसपर कि उसकी आँख गड़ी हुई थी, जीत लिया। किन्तु चानैनने कहा—जब तक मुझे खेलमें न हरा लो मैं आत्मसमर्पण न करूँगी। निदान फिर खेल आरम्भ हुआ। इस बार चानैनने बनावटी पासेको उठाकर फेंक दिया और अपने पासेसे खेलने लगी। राजाने जो कुछ जीता था उसने वह सब धीरे-धीरे जीत लिया। रोहिनीसे वे दोनों हरदी पहुँचे। लोरिक वहाँके राजाके पास गया। किन्तु उसने समुचित अभिवादन नहीं किया। इससे राजा बहुत रुष्ट हुआ और बोला—हमारी गायें चराना स्वीकार करो तभी तुम हमारे राज्यमें रह सकते हो। लोरिकने भी क्षुब्ध होकर उत्तर दिया—मैं तुम्हारी गायें तभी चराऊँगा जब तुम्हारी बेटी स्वयं दूध दुहाने आया करे। फलतः दोनोंमें युद्ध छिड़ गया और सात दिन सात रात निरन्तर युद्ध होता रहा। राजाकी बहुत बड़ी सेना मारी गयी। चानैनने दुर्गाकी मनौती मानी कि जीत होनेपर मैं अपने प्रथम जात पुत्रकी भेंट चढ़ाऊँगी। फलतः दुर्गाने आकर लोरिककी सहायता की और उसकी विजय हुई और हरदीके पराजित राजाने लोरिकको अपना सहगामी राजा घोषित किया। इस प्रकार लोरिक बारह बरस तक हरदीमें राज करता रहा। हरदीमें राज करते हुए एक दिन रातमें लोरिकने एक बुढ़ियाको बुरी तरह रोते सुना। उसका पुत्र किसी कामसे बाहर तीन दिनके लिए शहर गया हुआ था। यह रोना सुनकर उसे ध्यान आया कि इन बारह बरसोंमें उसकी माँ और पत्नीने