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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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कितना रोया-कलप किया होगा । इसका ज्ञान होते ही वह तत्काल अपनी सुन्दरी प्रेयसी चानैनको लेकर अपेन घर चल पड़ा । घर पहुँच कर अपने घरके पास ही उसके लिए दूसरा घर बनवाया । यह कथा भागलपुर गजेटियरमें भी प्रायः इन्हीं शब्दोंमें अंकित है ।१ यत्र- तत्र थोड़ा विस्तार और कुछ नयी सूचनाएँ हैं । उक्त गजेटियरमें यह कथा हण्टर द्वारा संगृहीत स्टैटिकल एकाउण्टसे उद्धत की गयी है ।२ गजेटियरके अनुसार लोरिककी पत्नी मंजरने अपने पतिको एक दिन चानैनके साथ प्रेम-क्रीड़ा करते देख लिया । तब घर आकर उसने ज्योतिष ग्रन्थोंको देखा और उसे ज्ञात हुआ कि उसका पति उसी रातको भाग जानेकी योजना बना रहा है । इस ग्रन्थमें चानैनके पिताका नाम सहदीप माहार बताया गया है । गजेटियरमें दूसरी नयी बात यह है कि जब चानैन लोरिकको उस पेड़के नीचे नहीं पाती जहाँ उसने मिलनेका वादा किया था, तो उसपर डाक रंगसे पाँच चिह्न बनाकर पीछे हटकर दुर्गाका स्मरण करती है । तीसरी नयी सूचना गजेटियरमें यह है कि जब हरवीका राजा पराजित हो गया तो लोरिकसे बोला कि यदि तुम मेरे प्रतिद्वन्द्वी हेरवाके राजाका सिर काटकर ला दो मैं तुम्हें अपना आधा राज्य दे दूँगा । लोरिकने इसे स्वीकार कर लिया है और उसे पूरा कर दिखाया । अन्तिम नयी ज्ञातव्य बात गजेटियरमें यह है कि बुढ़ियाको रोते देखकर लोरिकने अपनी प्रेयसीको उसका कारण जाननेके लिए भेजा और स्वय भी उसके पीछे पीछे छिपकर गया और उन दोनोंकी बात सुनने लगा । बुढ़ियाने बताया—मेरा बेटा परदेस गया है । तीन दिनसे नित्य भोजन बनाकर उसकी प्रतीक्षा करती हूँ कि वह आता होगा किन्तु वह अबतक नहीं आया । निराश होकर तीन दिनके एकत्र भोजन को देखकर रो रही हूँ । चानैनने यह सोचकर कि लोरिकको यह बात मालूम होगी तो हो सकता है उसे भी अपने माँ और पत्नीकी याद आ जाये और वह उनके पास जानेको आतुर हो उठे । अतः वह बुढ़ियासे बोली—यदि लोरिक उसके रोनेका कारण पूछे तो वह अपने रोनेका यह कारण कोई दुर्व्यवहार बताये । लोरिकने छिपकर सभी बातें सुन ली थीं । अतः जब चानैन बाहर आकर बातें बनाने लगी तो उसने उसपर विश्वास न किया और बोला—अगर तीन दिनके लिए जरूरी कामसे आनेपर माँ अपने बेटेके लिए इस तरह रो सकती है तो मेरी माँ और पत्नी मेरे लिए, जो अपन आप वनवास लेकर यहाँ आ बैठा है, कितना रोती होंगी । और तत्काल अपनी प्रेयसीके साथ घर लौट आया ।

मैथिल रूप लोरिक-चाँदकी कथाका जो रूप मिथिलामें प्रचलित है वह प्रकाशित रूपमें अभी


१—पृष्ठ ४८-५ । २—इस पुस्तकका पृष्ठ निर्देश गजेटियरमें नहीं दिया गया है ।