चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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तक हमारे देखने में नहीं आया। बहेडा (जिला दरभंगा) निवासी ब्रजकिशोर वर्मा ने हमें सूचित किया है कि यह कथा मिथिलामें लोरिकानि अथवा महरायके नामसे प्रसिद्ध है। इस कथाके सात खण्ड हैं और एक-एक खण्ड आठ-आठ घण्टेमें गाये जाते हैं। इसके एक खण्डका नाम चनैन-खण्ड है। चन्दायमकी कथा इसी खण्डसे सम्बन्ध रखती है। अतः उन्होंने हमें केवल इसी खण्डका सारांश लिख भेजा है। वह इस प्रकार है— अगौरा नामक गाँवके राजाका नाम सहदेव था। उनके हलवाहेका नाम बूचे राउत और हलवाहेकी पत्नीका नाम कुवैन था। उन दोनोंके लोरिक और साँवर नामक दो बेटे थे। लोरिक बड़ा और साँवर छोटा था। ये दोनों छिल्हउके अखाड़ेमें कुश्ती खेला करते थे। लोरिक अत्यन्त बलवान और विशालकाय था। उसकी तलवार अस्सी मनकी थी। उसके तीन साथी थे—राउत धोबी, बप्पा चमार और शाह गुलाम। गौरा नामक एक दूसरे गाँवका राजा उसरा पँवार था जो अत्यन्त अत्याचारी और चरित्रहीन था। उसके राज्यकी प्रत्येक नवविवाहिताको, विवाहके पश्चात् पहली रात उस पँवार राजाके साथ बितानी पड़ती थी। उसी गाँवमें साठ गायोंकी स्वामिनी पद्मा मौहरि रहती थी। उसके मँजरि नामकी एक अत्यन्त रूपवती बेटी थी। उसरा पँवारकी आँखें उसपर लगी हुई थीं। वह इस प्रतीक्षामें था कि उसका विवाह हो और वह उसकी अंकशायिनी बने। अन्त- तोगत्वा मँजरिका विवाह लोरिकके साथ निश्चित हुआ और लोरिक अपने वीर पिता और योद्धा साथियोंके साथ मार्गमें अनेक युद्ध जीतता हुआ गौरा आया। धूम- धामके साथ उसका विवाह मँजरिके साथ सम्पन्न हुआ। तदनन्तर पँवारने लोरिकको मारकर मँजरिको छीन लेनेके अनेक प्रयत्न किये पर वह सफल न हो सका और लोरिकके हाथों मारा गया। लोरिक विपुल धनराशि प्राप्त कर अपनी पत्नी मँजरिके साथ अगौरा लौट आया। अगौराके राजा सहदेवके चनैन नामक एक रूपवती पुत्री थी। उसका विवाह शिवचर नामक राजकुमारसे हुआ था। वह बहुत बली था। एक दिन जब वह खड़ा होकर मूत्र त्याग कर रहा था उसी समय इन्द्र आकाश मार्गसे जा रहे थे। मूत्रके कुछ छींटे उनपर जा पड़े। फलतः इन्द्रने क्रुद्ध होकर शिवचरको नपुंसक हो जानेका शाप दे दिया और वह काम-शक्तिसे रहित हो गया।^१ अपनी इस अवस्थासे दुःखी होकर शिवचरने घर त्याग दिया और देवरा नदीके तटपर कुटी बनाकर रहने लगा। वहीं रहकर वह अपनी साठ गायोंको चराया करता। चनैन जब यौवनावस्थाको प्राप्त हुई और शिवचरका अपनी ओर आकृष्ट होत न पाया तो वह स्वयं एक दिन सोलहों शृंगार कर उसकी कुटीपर पहुँची।
१ चनैनकी दृष्टिसे नपुंसकताके इस कारणकी बात आजमगढ़के हुपनाम भिक्षुने भी हमसे कही थी। इससे जान पड़ता है कि भोजपुरी क्षेत्रके भी कुछ भागमें सम्भवतः यह कथा प्रचलित है।