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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

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तक हमारे देखने में नहीं आया। बहेडा (जिला दरभंगा) निवासी ब्रजकिशोर वर्मा ने हमें सूचित किया है कि यह कथा मिथिलामें लोरिकानि अथवा महरायके नामसे प्रसिद्ध है। इस कथाके सात खण्ड हैं और एक-एक खण्ड आठ-आठ घण्टेमें गाये जाते हैं। इसके एक खण्डका नाम चनैन-खण्ड है। चन्दायमकी कथा इसी खण्डसे सम्बन्ध रखती है। अतः उन्होंने हमें केवल इसी खण्डका सारांश लिख भेजा है। वह इस प्रकार है— अगौरा नामक गाँवके राजाका नाम सहदेव था। उनके हलवाहेका नाम बूचे राउत और हलवाहेकी पत्नीका नाम कुवैन था। उन दोनोंके लोरिक और साँवर नामक दो बेटे थे। लोरिक बड़ा और साँवर छोटा था। ये दोनों छिल्हउके अखाड़ेमें कुश्ती खेला करते थे। लोरिक अत्यन्त बलवान और विशालकाय था। उसकी तलवार अस्सी मनकी थी। उसके तीन साथी थे—राउत धोबी, बप्पा चमार और शाह गुलाम। गौरा नामक एक दूसरे गाँवका राजा उसरा पँवार था जो अत्यन्त अत्याचारी और चरित्रहीन था। उसके राज्यकी प्रत्येक नवविवाहिताको, विवाहके पश्चात् पहली रात उस पँवार राजाके साथ बितानी पड़ती थी। उसी गाँवमें साठ गायोंकी स्वामिनी पद्मा मौहरि रहती थी। उसके मँजरि नामकी एक अत्यन्त रूपवती बेटी थी। उसरा पँवारकी आँखें उसपर लगी हुई थीं। वह इस प्रतीक्षामें था कि उसका विवाह हो और वह उसकी अंकशायिनी बने। अन्त- तोगत्वा मँजरिका विवाह लोरिकके साथ निश्चित हुआ और लोरिक अपने वीर पिता और योद्धा साथियोंके साथ मार्गमें अनेक युद्ध जीतता हुआ गौरा आया। धूम- धामके साथ उसका विवाह मँजरिके साथ सम्पन्न हुआ। तदनन्तर पँवारने लोरिकको मारकर मँजरिको छीन लेनेके अनेक प्रयत्न किये पर वह सफल न हो सका और लोरिकके हाथों मारा गया। लोरिक विपुल धनराशि प्राप्त कर अपनी पत्नी मँजरिके साथ अगौरा लौट आया। अगौराके राजा सहदेवके चनैन नामक एक रूपवती पुत्री थी। उसका विवाह शिवचर नामक राजकुमारसे हुआ था। वह बहुत बली था। एक दिन जब वह खड़ा होकर मूत्र त्याग कर रहा था उसी समय इन्द्र आकाश मार्गसे जा रहे थे। मूत्रके कुछ छींटे उनपर जा पड़े। फलतः इन्द्रने क्रुद्ध होकर शिवचरको नपुंसक हो जानेका शाप दे दिया और वह काम-शक्तिसे रहित हो गया।^१ अपनी इस अवस्थासे दुःखी होकर शिवचरने घर त्याग दिया और देवरा नदीके तटपर कुटी बनाकर रहने लगा। वहीं रहकर वह अपनी साठ गायोंको चराया करता। चनैन जब यौवनावस्थाको प्राप्त हुई और शिवचरका अपनी ओर आकृष्ट होत न पाया तो वह स्वयं एक दिन सोलहों शृंगार कर उसकी कुटीपर पहुँची।

१ चनैनकी दृष्टिसे नपुंसकताके इस कारणकी बात आजमगढ़के हुपनाम भिक्षुने भी हमसे कही थी। इससे जान पड़ता है कि भोजपुरी क्षेत्रके भी कुछ भागमें सम्भवतः यह कथा प्रचलित है।

किन्तु वह अपने पतिको अपनी ओर आकृष्ट करनेमें सफल न हो सकी। विवश होकर उसने इस प्रकारकी उपेक्षाका कारण पूछा। अपनी पत्नीके प्रश्नोंको सुनकर वह रोने लगा और रोते-रोते उसने अपनी काम-शक्तिहीनताकी बात कह सुनायी। तब चनैनने पूछा—ऐसी अवस्थामे मेरे उद्दाम यौवनका क्या होगा ? शिवधरने तत्काल किसी परपुरुषके संग जीवन व्यतीत करनेकी अनुमति दे दी। जब चनैन शिवधरके पाससे लौट रही थी तो रास्तेमें, गाँवके समीप ही, बण्ठा चमार मिल गया। वह उसके सौन्दर्यपर मुग्ध हो गया और उससे प्रणय निवेदन करने लगा। चनैनने उसे ठुकरा दिया तो वह बलात्कार करनेकी धमकी देने लगा। चनैनने इधर उधर देखा पर गाँव निकट होनेपर भी कोई आता-जाता दिखाई नहीं पड़ा जिसे वह अपनी सहायताके लिए पुकारती। इस संकटसे बचनेका उपाय वह सोच ही रही थी कि उसका ध्यान निकट ही खड़े एक अत्यन्त ऊँचे इमलीके वृक्षकी ओर गया। उसपर इमलीयोंके पके हुए गुच्छे लटक रहे थे। चनैनने कुछ सोचा और फिर मुस्कराकर बण्ठासे बोली—मुझे फुनगी (पेड़के सबसे ऊपरी भाग) पर लगी पकी इमलीयाँ खिलाओ। इतना सुनना था कि बण्ठा निशंक हो गया और बिना कुछ सोचे-समझे तत्काल अपनी पगड़ी और जूते उतार, मगन होता हुआ पेड़के सिरेपर चढ़ गया और इमली तोड़कर गिराने लगा। चनैनको अवसर मिला। उसने बण्ठाके जूते और पगड़ीको उठाकर दूर फेक दिया और स्वयं भाग निकली। जब तक बण्ठा पेड़से नीचे उतरकर अपनी पगड़ी और जूतेको सँभाले, तब तक चनैन महलमें जा पहुँची। निराश बण्ठा क्षुब्ध हो उठा और अगीरामें जाकर उत्पात मचाने लगा। लोरिकने उसे समझानेकी बहुत कोशिश की पर बण्ठा अपनी हरकतोंसे बाज नहीं आया। तब लोरिकने क्रुद्ध होकर उसे युद्धके लिये ललकारा। युद्धमें बण्ठा मारा गया। बण्ठाके मारे जानेकी खुशीमें चनैनने भोजका आयोजन किया और बण्ठाके विजेता लोरिकको विशेष रूपसे आमन्त्रित किया। जिस समय लोरिक भोजन कर रहा था ऊपरसे कुछ तिनके आकर उसकी पत्तलपर गिरे। लोरिकन आँख उठाकर ऊपर देखा। रूपसी चनैन अपने सत्तखण्डे महलके झरोखेपर खड़ी मुस्करा रही थी। उसे देखते ही लोरिक उसपर मुग्ध हो गया। दोनोंमें परस्पर कुछ सम्बत हुआ। तदनन्तर दोनों एक दूसरेसे छुप-छिपकर मिलने लगे। और एक दिन अंधेरी रातमें दोनों अपना गाँव छोड़कर भाग निकले और हरदीथान पहुँचे। हरदीधाम मौनगरके मौजनि राजाके राज्यम पड़ता था। वह राज्य अत्यन्त प्रतापी था। टिठरा नामक एक नाई उसका सेवक था। एक दिन अकस्मात् टिठरा नाईने चनैनको देख लिया। चनैनका रूप देखते ही वह मूच्छित हो गया। होश आनेपर वह मोपनि राजाके पास पहुँचा और बोला—एक आदमी लोरिक चनन्को चुराकर लाया है। आपकी सातो रानियाँ उस सुन्दर नाहुओंकी बावन भी नहीं हैं। यह सुनकर मंपनि राजाने चनैनको प्राप्त करनेके लिए षड्यन्त्र रचा।

४ ६ उसके सात सौ पहलवान गेरुवा नामक अखाड़ेमे कुश्ती लड़ा करते थे। गजभीमक उनका नायक था। वह अजेय समझा जाता था। राजाने लोरिकको बुलवाया और एक पत्र देकर उसे गजभीमकके पास भेजा। लोरिक पत्र ले जानेको तैयार हो गया। चनैनने राजाकी दुष्टतासे उसकी सवारीके लिये कटरा नामक प्रख्यात घोड़ेको चुना और उसपर सवार होकर लोरिक गजभीमकके पास चला। राजाने उस पत्रमें गजभीमकको आदेश दिया था कि पत्र देखते ही लोरिकको मार डालना। पर लोरिकको मारनेकी कौन कहे गजभीमक स्वयं लोरिकके हाथ अपने सात सौ पहलवानोंके साथ मारा गया! उस दिनसे मोचनि राजा लोरिकसे भयभीत रहने लगा और किसी प्रकार उसे मार डालनेकी फिक्रमें रहने लगा। इस बार उसने पत्र देकर लोरिकको हरेवा करेवाके पास भेजा। हरेवा-करेवा दो भाई थे और दोनों ही अत्यन्त अत्याचारी थे। उनके भयसे सारी प्रजा त्रस्त थी। लोरिक पत्र लेकर पहुँचा और मनविसुनीके मैदानमें उसकी हरेवा करेवासे लड़ाई शुरू हुई। युद्धमें पहले हरेवाका भागिनेय कोठा राघव का राजकुमार कुँवर अंगार मारा गया। पीछे लोरिकने हरेवा करेवाको भी अपने खड्गसे यमपुर पहुँचा दिया। वहॉँसे लौटकर लोरिकने राजा मोचनिको भी मार डाला। अब सोनहीघाटमें महल बनाकर लोरिक और चनैन सुखपूर्वक रहने लगे। चनैन राज-काज चलाने लगी। उधर लोरिकके वियोगमें उसकी पत्नी माँजरि सूखकर काँटा हो गयी। उसने गायोंको राजा कोल्हू मल्लवा छीन लेगया। उसके साथ लड़ते हुए लोरिकका भाई साँवर भी मारा गया और साँवरकी पत्नी भस्ममय देखकर सती होगयी। इस सब दुःखोंसे दुःखी होकर लोरिकके माता-पिता अन्धे हो गये। जब माँजरिने देखा कि उसका पति लौटकर नहीं आ रहा है तो उसने अपने पालतू कौवे—चाझिलके पैरमें पत्र बाँधकर लोरिकके पास भेजा। लोरिक पत्र पाकर घर लौटनेके लिये व्याकुल हो उठा और चनैनके लाख प्रतिरोध करनेपर भी उसे और अपने बेटे इन्द्रजीतको लेकर गौड़की ओर चल पड़ा। गौड़के निकट पहुँचकर लोरिक और चनैन दोनोंने अपना वेश बदल लिया और गौड़में अपना परिचय सलोनीके राजा-रानीके रूपमें दिया। चनैनके कहनेपर लोरिकके मनमें अपनी पत्नी माँजरिके प्रति संदेह जागा कि वह निश्चय ही अपना रूप सौन्दर्यमें बेचकर जीवन-यापन करती रही होगी। अतः अपने इस सन्देहकी पुष्टिके निमित्त उसने गाँव भरके दूधको खरीदनेकी योजना बना दी। फलतः गाँवकी सभी स्त्रियाँ उसके पास दूध बेचने आयीं। उनके साथ माँजरि भी आयी। चनैनने सब स्त्रियोंको तो दूधके मूल्यमें चावल दिये और माँजरिके दूध-पात्रको हीरे-मोतियोंसे भर दिये। चनैनने सोचा था कि हीरा-मोतियोंके प्रलोभनमें माँजरि पुनः आयेगी और उस राजा (लोरिक) की उपस्वामिनी बनना स्वीकार कर लेगी। किन्तु उसकी

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बाधाके विपरीत माँजरिने अपने श्लीलता अपहरणके इस षड्यन्त्रको ताड़ लिया और तत्काल इसकी सूचना अपने सास ससुरको दे दिया । सूचना पाते ही माँजरिके साथ उसकी कुमारी बहन हुरकी, रजक धोबी कूबे और सुभेन सभी सहसोके राज्य (लोरिक) के पड़ाव पर जा पहुँचे और उसे युद्धके लिए ललकारने लगे । ललकार सुनकर जैसे ही लोरिक बाहर आया, रजकने लपक कर उसका हाथ नेत्रहीन कूबेको पकड़ा दिया । हाथका स्पर्श होते ही कूबेको ज्ञात हो गया कि यह उसके बेटे लोरिकका हाथ है । अपनी इस धारणाको पुष्ट करनेके लिए उसने उसे अपने आलिङ्गनमें कसकर आबद्ध कर लिया । कूबेके वज्र आलिङ्गनको सहन करनेकी क्षमता लोरिकके सिवा किसीमें न थी । उसके आलिङ्गन पाशमें आबद्ध होकर भी जब लोरिक हँसता ही रहा तो कूबेको निश्चय हो गया कि वह लोरिक ही है । और वह स्नेहके साथ उसका पीठ सहलाने लगा । स्नेहातिरेकमें सुभेन और कूबे दोनोंके नेत्रोंकी खोई हुई ज्योति लौट आयी । इस बीच माँजरिकी बहन हुरकीने चनेनको जा पकड़ा और वह उसका प्राण लेने जा ही रही थी कि इन्द्रजीत रोता हुआ माँजरिकी ओर भागा । माँजरिने आकर चनेनको छुड़ाया । बोली—अपने प्रतिशोधके लिये किसी अबोध बालकके माँका प्राण नहीं लिया जा सकता । तत्पश्चात सब लोग घर आये और सुख पूर्वक रहने लगे । लोरिकने अपने भाईका प्रतिशोध लेनेका निश्चय किया और राजा कोल्ह मख्ड़ारको मार डाला । यही नहीं जितने भी अत्याचारी राजा थे, उन सबको यमलोक पहुँचा दिया । जब उससे लड़ने वाला कोई नहीं बचा तब उसने अपनी आराध्या भगवतीकी आज्ञा प्राप्त कर काशी करवट ले लिया । सुप्रसिद्ध पुरातत्वविद अलेकजेण्डर कनिंघम ने अपने १८७८-८१ के उत्तरी और दक्षिणी भागकी यात्राका जो विवरण प्रस्तुत किया है उसमें उन्होंने लोरिक बरदाकी कथा दी है जो उपर्युक्त कथा से थोड़ा भिन्न है।¹ उन्होंने लिखा है कि उन्हें तिरहुत की यात्रामें हरवा-बरवा का नाम बहुत सुनाई पड़ा । उन्हें उनके सम्बन्धमें जो जानकारी प्राप्त हुई उसके अनुसार हरवा-बरवा भाई-भाई और जातिके दुसाध थे । वे नेउरपुरमें राज करते थे । वे बड़े ही लड़ाकू थे और उन्होंने बहुतसे राजाओंको लूट कर मार डाला था । उन्हीं दिनों लोरिक और सेउर ( अथवा सिरुक ) नामक दो पड़ोसी राजा थे जो गौरामें रहते थे । लोरिक अपनी पत्नी माँजरको त्याग कर चनाइनके साथ हरदी भाग गया । वहाँके राजा मख्बारने, जो जातिका अहीर था, उसका विरोध किया । दोनोंमें लड़ाई हुई । लोरिकने मख्बारको पराजित कर दिया । तदन्तर दोनों परस्पर मित्र बन गये ।

१ आर्कियोलोजिकल सर्वे रिपोर्ट खण्ड १६ १८८१ पृ. २७-२८ ।

५. मैना-संदेश, गोवर वापसी व उपसंहार (कड़वक ४०१-५२२)

उसके सात सौ पहलवान गेरुआ नामक अखाड़ेमें कुश्ती लड़ा करते थे। गजभीमल्ल उनका नायक था। वह अजेय समझा जाता था। राजाने लोरिकको बुलवाया और एक पत्र देकर उसे गजभीमल्लके पास भेजा। लोरिक पत्र ले जानेको तैयार हो गया। चनैनने राजाकी घुड़सालसे उसकी सवारीके लिये कंदरा नामक प्रख्यात घोड़ेको चुना और उसपर सवार होकर लोरिक गजभीमल्लके पास पहुंचा। राजाने उस पत्रमें गजभीमल्लको आदेश दिया था कि पत्र देखते ही लोरिकको मार डालना। पर लोरिकको मारनेको कौन कहे गजभीमल्ल स्वयं लोरिकके हाथसे अपने सात सौ पहलवानोंके साथ मारा गया। उस दिनसे मोचनिक राजा लोरिकसे भयभीत रहने लगा और किसी प्रकार उसे मार डालनेकी फिक्रमें रहने लगा। इस बार उसने पत्र देकर लोरिकको हरेवा-बरेवाके पास भेजा। हरेवा-बरेवा दो भाई थे और दोनों ही अत्यन्त अत्याचारी थे। उनके भयसे सारी प्रजा त्रस्त थी। लोरिक पत्र लेकर पहुँचा और बनविहुलीके मैदानमें उसकी हरेवा बरेवासे लड़ाई शुरू हुई। युद्धमें पहले हरेवाका भगिनेय कोठा रामपुर का राजकुमार कुँअर अंगार मारा गया। पीछे लोरिकने हरेवा-बरेवाको भी अपने खङ्गसे यमपुर पहुँचा दिया। वहाँसे लौटकर लोरिकने राजा मोचनिको भी मार डाला। अब सोनौथीघाटमें महल बनाकर लोरिक और चनैन सुखपूर्वक रहने लगे। चनैन राज-काज चलाने लगी। उधर लोरिकके वियोगमें उसकी पत्नी माँजरि सूखकर काँटा हो गयी। उसके गायोंको राजा कोलहू गबड़ा छीन लेगया। उससे साथ लड़ते हुए हम्ले लोरिकका भाई साँवर भी मारा गया और साँवरकी पत्नी अकलुम्म बेकर छती होगयी। इन सब दुःखोंसे दुःखी होकर लोरिकके माता-पिता अन्धे हो गये। जब माँजरिने देखा कि उसका पति लौटकर नहीं आ रहा है तो उसने अपने पालतू कौवे—वाञ्छिके पैरों में पत्र बाँधकर लोरिकके पास भेजा। लोरिक पत्र पाकर घर लौटनेके लिये व्याकुल हो उठा और चनैनके सख्त प्रतिरोध करनेपर भी उसे और अपने बेटे इन्द्रजीतको लेकर गौबर्दी ओर चल पड़ा। गाँवके निकट पहुँचकर लोरिक और चनैन दोनोंने अपना वेश बदल लिया और गाँवमें अपना परिचय सहदौलीके राजा-रानीके रूपमें दिया। चनैनके कहनेपर लोरिकके मनमें अपनी पत्नी माँजरिके प्रति सन्देह जागा कि वह निश्चय ही अपना रूप सौन्दर्यमें बेचकर जीवन-यापन करती रही होगी। अतः अपने इस सन्देहकी पुष्टिके निमित्त उसने पाँच रुपये दूधको खरीदनेकी घोषणा करा दी। फलतः गौबर्दी सभी स्त्रियाँ उसके पास दूध बेचने आयीं। उनके साथ माँजरि भी आयी। चनैनने सब स्त्रियोंको तो दूधके मूल्यमें चावल दिये और माँजरिके दूध पात्रको हीरे-मोतियोंसे भर दिये। चनैनने सोचा था कि हीरा मोतियोंके प्रलोभनमें माँजरि पुनः आयेगी और सहौली नरेश (लोरिक)की अनुचारिणी बनना स्वीकार कर लेगी। किन्तु उसकी

४७ आज्ञाके विपरीत माँजरिने अपने अभीष्ट अपहरणके इस षड्यन्त्रको ताड़ लिया और तत्काल इसकी सूचना अपने सास ससुरको दे दिया। सूचना पाते ही माँजरिके साथ उसकी कुंवारी बहन झुरकी, राऊल धोबी, कूबे और सुडेन सभी गसौलीके राजा (लोरिक)के पड़ाव पर आ पहुँचे और उसे युद्धके लिए ललकारने लगे। ललकार सुनकर जैसे ही लोरिक बाहर आया, राऊलने झपट कर उसका हाथ नेत्रहीन कूबेको पकड़ा दिया। हाथका स्पर्श होते ही कूबेको ज्ञात हो गया कि वह उसके बेटे लोरिकका हाथ है। अपनी इस धारणाको पुष्ट करनेके लिए उसने उसे अपने आलिंगनमें कसकर आबद्ध कर लिया। कूबेके वज्र आलिंगनको सहन करनेकी क्षमता लोरिकके सिवा किसीमें न थी। उसके आलिंगन पाशमें आबद्ध होकर भी जब लोरिक हँसता ही रहा तो कूबेको निश्चय हो गया कि यह लोरिक ही है। और वह स्नेहके साथ उसका पीठ सहलाने लगा। स्नेहातिरेकमें सुसैन और कूबे दोनोंके नेत्रोंकी खोई हुई ज्योति लौट आयी। इस बीच माँजरिकी बहन झुरकीने चनैनको जा पकड़ा और वह उसका प्राण लेने जा ही रही थी कि इन्द्रजीत रोता हुआ माँजरिकी ओर भागा। माँजरिने आकर चनैनको छुड़ाया। बोली—अपने प्रतिशोधके लिये किसी अबोध बालकके माँका प्राण नहीं लिया जा सकता। तत्पश्चात सब लोग घर आये और सुख पूर्वक रहने लगे। लोरिकने अपने भाईका प्रतिशोध लेनेका निश्चय किया और राजा मौष्ट मल्लाहको मार डाला। यही नहीं जितने भी अत्याचारी राजा थे, उन सबको यमलोक पहुँचा दिया। जब उससे लड़ने वाला कोई नहीं बचा तब उसने अपनी आराध्या भवानीकी आज्ञा प्राप्त कर काशी करवट ले लिया। सुप्रसिद्ध पुरातत्त्वविद् अलेक्जेण्डर कनिंघम ने अपने १८७ ८-८१ के उत्तरी और दक्षिणी भागकी यात्राका जो विवरण प्रस्तुत किया है उसमें उन्होंने लोरिक चन्दाकी कथा दी है जो उपर्युक्त कथा से थोड़ा भिन्न है।¹ उन्होंने लिखा है कि उन्हें तिरहुत की यात्रामें हरषा-बरषा का नाम बहुत सुनाई पड़ा। उन्हें उनके सम्बन्धमें जो जानकारी प्राप्त हुई उसके अनुसार हरषा-बरषा भाई-भाई और जातिके दुसाध थे। वे नैठारपुरमें राज करते थे। वे बड़े ही लड़ाकू थे और उन्होंने बहुतसे राज्योंको लूट कर मार डाला था। उन्हीं दिनों लोरिक और छेछर (अथवा सिरक) नामक दो पड़ोसी राजा थे जो गौरामें रहते थे। लोरिक अपनी पत्नी माँजरको त्याग कर चनाइनके साथ हरदी भाग गया। वहाँके राजा मल्लारने जो जातिका अहीर था उसका विरोध किया। दोनोंमें लड़ाई हुई। लोरिकने मल्लारको पराजित कर दिया। तदनंतर दोनों परस्पर मित्र बन गये। १. आर्क्योलाजिकल सर्वे रिपोर्ट, खण्ड १९ १८८३ पृ २७-२८।

४८ एक दिन दोनों एक साथ स्नान करने गये। जब राजा मन्जारने अपने कपड़े उतारे तो उनकी पीठपर चोटके बहुतसे निशान दिखाई पड़े। लोरिकने जब पूछा कि ये कैसे निशान हैं तो मन्जारने बताया कि जब कभी हरेशा-बरेशा इस ओर आते हैं तो मुझे चोट पहुँचाते हैं। ये निशान उसीके हैं। यह देखकर लोरिकने तत्काल प्रतिज्ञा की कि जबतक हरेशा-बरेशाको पकड़ न दूँगा तब तक इस गाँवका अन्न-जल ग्रहण न करूँगा। और तत्काल चलनेको प्रवृत्त हो गया। मन्जारने कहा—पैदल तुम कभी उसके पास पहुँच न सकोगे। और उसे एक घोड़ा दिया। उस घोड़ेपर सवार होकर लोरिक दूसरे दिन सूरज निकलते-निकलते नेठरपुर पहुँचा। हरेशा-बरेशा उस समय शिकारको गये थे। लेकिन उन्हें खोजता हुआ वहाँ जा पहुँचा। वहाँ वह उनसे भिड़ गया और उनके सभी साथियोंको मारडाला। तब उन दोनोंने अपनी सहायताके लिए अपने साझे कंगारको बुलाया। लोरिकन उसे भी परास्त कर दिया और हरेशा बरेशाको मार डाला। फिर लौटकर लोरिक हरदौनें चलाइनके साथ सुख पूर्वक रहने लगा। कनिंगहमने अपनी रिपोर्टमें सबसे आश्चर्यजनक बात यह लिखा है कि उन्हें इस बातके अतिरिक्त कि लोरिक व्यक्तिका अहिर था उसके सम्बन्धमें उस क्षेत्रसे और कोई बात ज्ञात न हो सकी। छत्तीसगढ़ी रूप छत्तीसगढ़में लोरिक और चन्दाकी कथा जिस रूपमें प्रचलित है, उसे वरियर एलविनने विलासपुर जिलेके कठघोड़ा तहसीलके धुरी जमींदारी अन्तर्गत सुनेरा ग्रामनिवासी घिचू अहीरसे सुनकर अपनी पुस्तक फोक सांग्स ऑव छत्तीस गढ़में दिया है।१ उनके अनुसार वह कथा इस प्रकार है— बाबनबीर नामक एक अहीर था जो बावन भैंसोंको दूहकर उनका दूध पीता था। एक दिन उसके मित्र राउतने कहा कि गौनेका दिन आ गया है जाकर अपनी स्त्री चन्दैनीको लिवा लाओ। बाबनबीरने उत्तर दिया कि मेरे सिरमें दर्द हो रहा है तुम मेरी कटार और घोड़ा ले लो और जाकर दुल्हनिको लिवा लाओ। राउत जाकर चन्दैनीको लिवा लाया और बाहरसे ही उसने बाबनबीरको आवाज दी। उस समय वह भात खा रहा था। भात खाकर उसने जो डकार ली तो उसकी आवाज बारह कोसतक सुनाई पड़ी। साना खाकर पेट सहलाता हुआ घरसे बाहर निकला और दूध दूहनेकी तैयारी करने लगा। चन्दैनीको यह देखकर आश्चर्य हुआ कि मैं ब्याही हूँ और मेरी ओर उसने तनिक भी ध्यान नहीं दिया। वह स्वयं उसके पास गयी। पहले उसने उसके पैरकी ओर देखा फिर उसके मुँहकी ओर और फिर उसके छाँतियेकी ओर। तत्काल घरमें जाकर पैर धोनेके लिए वह गरम पानी ले आयी। बाबनबीरने पानीमें जैसे ही पैर डाला वह जल १ ४१७१२००

गया और चन्दैनीको गालियों देने लगा । तब चन्दैनी ठण्डा पानी ले आयी और बाबनबीरने पैर धोया और उसकी सराहना की । उसके बाद चन्दैनी खाना बनाकर लायी । उसने उसे बड़े प्रेमसे सराह सराहकर खाया । खाना खाकर मूँह सूँघनेके लिए उठा । पर अचानक ही वह बिस्तर बिछाकर सो गया । चन्दैनी घरके काम धन्धेसे छुट्टी पाकर तेल लेकर अपने पतिके पास गयी । उसके हाथको अपने हाथमें लेकर तेल लगाने लगी । बाबन जाग उठा और जागते ही उसने चन्दैनीको एक चाँटा मार दिया । चन्दैनीने सोचा कि नींद मैं अनजाने ही मार दिया होगा । अतः फिर मलने लगी । तब बाबनने उसे लात मार दिया और वह मुँहके बल जा गिरी । सारा तेल दुलक गया । वहीं पड़े-पड़े चन्दैनी सो गयी और उसे पता भी नहीं चला कि कब सबेरा हुआ । सुबह उठकर उसने अपनी ननदसे कहा कि मेरा भाई महन्त बीमार है, उसे देखने जाऊँगी । तुम चुपकेसे मेरी साड़ी उठा लाओ । चन्दैनी अपना कपड़ा लेकर चुपकेसे घरसे भाग निकली । घने जङ्गलमे होकर जब वह जा रही थी तो रास्तेमे उसे लकड़ी काटनेके लिए घूमता हुआ वीर बठवा मिला । चन्दैनीको देखते ही बोल उठा—मौसी कहाँ जा रही हो ? चन्दैनी सोचने लगी कि कभी तो वह इस तरह नहीं पुकारता था । सदा मैं उसकी भाई-बहू ही रही आज यह मौसी क्यों कह रहा है । कुछ दालमें काला अवश्य है । किस तरह इससे मैं अपने आपको बचाऊँ । कुछ सोचकर उसने सिर ऊपर उठाया । जामुनसे लदा पेड़ देखकर बोली—देवर मेरे, तुमसे क्या कहूँ । जामुन खानेकी इच्छा हो रही है । थोड़ेसे तोड़ लाओ । पीछे हम दोनों हँसी-मजाक करेंगे । वीर बठवाने आव न देखा न ताव, पट पेड़पर चढ़ ही तो गया और लगा जामुन तोड़ तोड़कर गिराने । पर चन्दैनी सयानी थी बोली—मैं इतने नीचे लगे जामुन नहीं खाती, इसे तो छोटे-छोटे चरवाहे भी तोड़ ले जाते हैं । तब बठवा और ऊँचे चढ़ गया और अच्छे-अच्छे फल तोड़ने लगा । तब चन्दैनी बोली—मेरे अच्छे देवर, जरा अपने कमरमें बँधी छुरी तो गिरा देना । मै फलोंको काटूँगी । बठवाने अपनी छुरी गिरा दी । चन्दैनीने अपने कपड़ोंको कसकर बाँधा और चाकूसे कटीली डाल काट-काट कर पेड़के चारों ओर चुन दिया और भाग चली । भागते-भागते वह गेहूँके खेतोंको पारकर गयी, तब वीर बठवाने नीचे देखा । पेड़के नीचे काँटे लगे देखकर चकित हुआ और इधर-उधर नजर दौड़ायी तो चन्दैनी दूरपर भागती हुई दिखाई पड़ी । बोला—अच्छा चन्दैनी आज तो तुम धोखा देकर निकल गयी । किसी दिन जब नदीपर मिलोगी तब तुम्हारी इज्जत लुटूँगा । खाम पकड़कर तुम्हें बेइज्जत करूँगा । वह नीचे उतरने लगा । जबतक वह एक डालीसे दूसरी डालीपर उतरे तबतक वह दो कोस पहुँच गयी । जबतक पेड़से उतर पाये, वह अपन गाँवके निकट पहुँच गयी । बठवाने उसका पीछा किया । जबतक वह पास आने वह अपने घरके पास पहुँच

४१ गयी। उसने उसका चाकूको तालाबमें फेंक दिया। बीर बढ़था चाकू लेने तालाबमें कूदा और कीचड़में फँस गया। जबतक वह वहाँसे निकल पाये, चन्दैनी अपने घरमें घुस गयी। बीर बढ़था गुस्सेमें भरा गलीमें चक्कर लगाने लगा। कोई भी लड़की उसके डरसे पानी भरने नहीं निकलती। अहीरके लड़के मारे डरके गाय चराने नहीं जाते। गायें तबेलेमें पड़ी-पड़ी मरने लगीं भैंसे छनमें से खींचकर घास चबाने लगीं। लोग घरमें पड़े-पड़े भूखसे अलबले होने लगे। जिनके घरमें कुआँ था, वे तो कुछ खा पका लेते थे। जिनके पास नहीं था वे जानवरोंकी तरह प्याससे छटपटाने लगे। यह देखकर चन्दैनीकी माँ बोली—मुझे तो तीनों लोकमें अकेला वीर लोरिक ही एक आदमी ऐसा दिखाई देता है जो बीर बढ़थाको मार सकता है। और कोई दूसरा नहीं तो दिखाई देता। यह कहकर लाठी टेकती हुई बुढ़िया लोरिकके घरकी ओर चल पड़ी। वह छोटी-छोटी गलियों फिर छोटे-बड़े बाजारोंको पार करती हुई वहाँ पहुँची जहाँ लोरिक सोया हुआ था। जाकर बोली— तुमसे मैं क्या कहूँ नाक कटना है तो जातका चमार, नीच पर है वह मोटा। उसने मेरी लड़कीपर हाथ लगाया है। उसकी इज्जत बचानेमें सब लोग असमर्थ हैं। यह सुनते ही लोरिक खाटसे उठ पड़ा और अपनी लाठी कठ उठाकर चलने लगा। तभी घरके भीतर छिपी मँजरियाने उसे देख लिया। उसकी पत्नीने आकर रोका। बोली—मत जाओ ईश्वरके लिए मत जाओ। वह चमार महाधूर्त है उसे तुम हरा न सकोगे। हट जा मनजरिया—लोरिक बोला—है तो चमार ही। भला वह मुझे कैसे हरायेगा ? अगर मैं उसे भून न डालूँ तो मैं अपनी मूँछ कटा डालूँगा। मनजरिया बोली—उसे हरानेका एक ही उपाय है। उसे ऐसी जगह लिवा जाओ जहाँकी जमीन बहुत कड़ी हो। वहाँ पाँच हाथके अन्तरपर दो गड्ढे कमरकी गहराई तक खोदो। एक गड्ढेमें उस चमारकी बीबी तुम्हें गाड़े और दूसरेमें मैं उस बढ़थाकी गाड़ूँ। जो उसमेंसे पहले निकलकर दूसरेको पीटे, वही विजयी माना जाय। अच्छा तो जल्दीसे तैयार हो जा मनजरिया।—लोरिकने कहा। मनजरिया सज धजकर सिरपर मथिलाइयोंकी थाल रखकर चल पड़ी। आगे-आगे लोरिक चला उसके पीछे बुढ़िया और सबसे पीछे मनजरिया। गलीमें मकानके सामने बढ़था टहल रहा था। देखते ही लोरिक चिल्लाया—रास्तेसे हट बढ़था नहीं तो लाठीसे तेरा सिर तोड़ दूँगा तेरी बसौली बाहर निकल पड़ेगी। हट जाओ लोरिक नहीं तो ऐसी मार मारूँगा कि तेरी बसौली तेरे पेटमें समा जायेगी। तब लोरिक बोला—हो सकता है कि मैं तुमको न मार सकूँ लेकिन तुम

  • मुझको नहीं मार सकते। अच्छा हो व था

४११

क। लोरिकने अपनी बात नवाबी। बठवाने तत्काल अपनी चमारिनको बुलवा भेजा। मेरी धूमो, इस रावतको जमीनमें इस तरह कसकर गाड़ दो कि वह कभी निकल न सके। मैं उसे ऐसा गाड़ूँगी कि वह कभी निकल ही न सके और तुम आकर उसे मार कर वीर कहाओ—चमारिन बोली और हाथ भरका एक खोंता ले आयी। गड्ढा खोदकर वह लोरिकको गाड़ने लगी। तब मनजरियाने चारों ओर अशर्फियाँ बिखेर दीं। लालची, चमारिन अपना काम छोड़कर उन्हें बटोरने लगी। इस बीच लोरिकने भीतर ही भीतर अपना पैर ढीला कर लिया। उधर मनजरियाने बठवाको खूब कसकर गाड़ा। फिर वहाँसे हटकर बोली—शत्रुको अब मारो। बठवाने गड्ढेसे बाहर आनेकी बहुत कोशिश की लेकिन एक तिल भी हट न सका। उधर लोरिक इतनी जोरसे उछला कि जमीनसे पाँच हाथ ऊपर चला गया। नीचे आकर उसने अपने लट्ठसे बठवाकी खूब मरम्मत की। इतना मारा कि उसकी लाठी टूट गयी। उसने दूसरी लाठी उठायी। तब बठवा हाथ जोड़कर कहने लगा—बस करो रावत, लंगड़ा लूला जैसा भी जीने भर दो। मैं तुम्हारा गौरागढ़ छोड़ दूँगा। तुम्हारी चम्पमें सेवा करूँगा। यह सुनकर मनजरियाने लोरिकको मारनेसे रोका और धूमोसे बोली—ले जा अपने पतिको अरण्डके पत्तोंसे सेंक कर। लोरिक और मनजरिया दोनों घर लौट आये। छिपे-छिपे चन्देनीने उन दोनों को आते देखा। वह मन ही मन कहने लगी—अरे नाथ मेरे देवता, तुम्हारी तरह का आदमी त्रिलोकमें नहीं है। वह दिन कब आयेगा जब मैं एक प्रेमिकाकी तरह तुम्हारे साथ भाग चलूँगी। और तब चन्देनी अपने भाई महन्तीसे बोली—लोरिकके आने जानेके रास्ते- में मेरे लिए एक झूला डाल दो। भाइने झूला डाल दिया। लोरिकने उस रास्तेमें आना ही बन्द कर दिया। दिन गिनते गिनते चन्देनीकी उँगलियाँ घिस गयी उसकी राह देखते-देखते आँखें थक गयी पर लारीक सिवा कुछ दिखाई न दिया। तब वह देवी देवताओंको मनाने लगी। एक दिन लोरिक अपने अखाड़ेसे उसी रास्ते अपने घर लौटा। उसे आते देख चन्देनी अपने झूलेपर बैठ गयी। बोली—कुछ झूल न झूल लोगे रावत ! ना ना—लोरिक बोला—अरे लोग सब देख रहे होंगे और हमीं बदनाम हो जाऊँगा। मेरी झूल न झूलोगे तो तुम्हें अपनी मा-बहनकी कसम। कसम सुनकर लोरिकको गुस्सा आ गया। उसने इतनी जोरसे झूला लगाया कि चन्देनी काफी दूर आसमानमें फेंका गयी और उल्काकी तरह नीचे गिरने लगी। उसने दस हाथ ऊँचे

आभूषण बिखर गये। इस तरह उसे अर्धशून्य गिरते देख लोरिकने सोचा कि उसके टुकड़े टुकड़े हो जायेंगे; उनको कौन बटोरता फिरेगा। उसने उसे अपनी लाठीपर ही रोक लिया और फिर धीरेसे भूमिपर रख दिया। चन्दैनी खड़ी होकर गालियाँ देने लगी। लोरिक बोला—तुमने कहा और मैंने उतार दिया। यह कहकर वह अपने घर चला गया। चन्दैनी भी उदास होकर घर चली गयी। शामको अपनी मौसीसे बहानाकर वह कण्डा लेकर पड़ौसीके घरसे आग लेने निकली। रास्तेमें लोरिक मिला। वह खिसक उठी। बोली—मुझसे नाराज क्यों हो। मैंने तो मजाक किया था। मेरा घर देखा है न देवर ! क्या बताऊँ मौसी आज तो मौका निकल गया। कल तुम्हारे घर जरूर आऊँगा। म न मत आना देवर। मेरे घर पहरेदार बहुत हैं। पहले तो सड़कपर पहरा देनेवाला हाथी है। उसके बाद बाघ है तब मूंछकी गाय और तब उसके बाद भालू। अपनी जान जोखिममें डालकर मत आना। पानीमें छिपनेपर भी बच न पाओगे। लोरिक घर आकर मन्जरियासे बोला—कस्वीके भात पका है। गौरागढ़की गलीमें एक सभा है वहाँ जाना है। जल्दीसे उसने गाना गावा अच्छे-से अच्छे कपड़ा पहना और गहरिबाके घर जाकर एक चितकबरा बकरा लिया फिर कुछ ईख और हलवाईके घरसे मिठाई लेकर चन्दैनीके घरकी ओर चल पड़ा। हाथी देखते ही उसने उसके सामने ईख डाल दी बाघको उसने बकरा दे दिया गायको भात और भालूको मिठाई। इस तरह सारी बाधाएँ पारकर वह चन्दैनीके कमरेमें जा पहुँचा। चन्दैनी देखनेमें सारा शरीर ढंककर सो रही थी; पर भीतर ही भीतर जाग रही थी मुँह नहीं खोलती थी। भीतर ही से बोली—कौन हो तुम, अपने भाई महरुदीको बुलाती हूँ। वह तेरा सिर काट डालेगा। क्यूं चन्दैनी तुमने बुलाया तो मैं आया। अब धमकी देती है। यह कहकर लोरिकने धीरजको लात मार दिया और स्वयं धरनपर चढ़ गया। चन्दैनी बोली—देवर, मैं तो मजाककर रही थी। तुम नाराज हो गये। और वह अन्धायसे लोरिकको ढूंढने लगी। धरनपर बैठा-बैठा लोरिक बोला—मैं धरनपर बैठा हूँ। तुम अपनी कहानी कहो। चन्दैनीने अपने आँसू पोंछ डाले और कहानी कहने लगी। पर एक जनममें मैने एक हिरनीकी कोखमें जन्म लिया था। हिरनकी तरह एक ब्राह्मण मुझे अपने घरमें पालती-पोसती थी। एक दिन एक राजा उस राह से गया उसने मुझपर बाण चला दे दिया। उसके हाथ से मैं मर गयी। तब मैंने गायके रूपमें जन्म लिया और चरवाहेकी गायोंमें फिरती थी। इस बार फिर एक राजाने बाण लिया

और मैं मर गयी । दूसरे जन्ममें कुतियाके गर्भमें जन्म लिया और मैं गली-गली भूँकती फिरती थी । फिर राजाने शाप दिया और मैं मर गयी। और अन्तम मैने राजा गोयन्थीके घर जन्म लिया और बीर बावनसे विवाही गयी किन्तु अपने सभी जन्मोंमें मैं कभी सुखी न रह सकी। यह सुनते ही लोरिक झरनपरसे उतर आया। चन्दैनीने इत्र फुलेलसे उसका स्वागत किया और मिठाई खिलायी। दूसरे दिन सुबह हल्ला हुआ—लोरिक कहाँ है, लोरिक कहाँ है आवाज सुनते ही वह जागा और खाटपरसे उठकर भागा। जल्दीमें उसने चन्दैनीकी साड़ी पहन ली। आँगनमें बुढ़िया धोबिन गुहारती हुई मिली। बोली—नन्दके लाल तुम कहाँ थे ! तुम्हारे गाल काजल और सेंदुरसे लाल क्यों हैं ? लोरिकने बहाना किया मै अपनी गाये ढूँढ रहा था। गेरूसे खेल रहा था वहीं मुँह पर लग गया होगा ! धोबिन बोली—अरे लबाड़िये, चुप रह। तेरी धोती कहाँ है ! चन्दैनीकी साड़ी क्यों पहने है ? लोरिकने अपने शरीर की ओर देखा और फिर गिड़गिड़ाने लगा—किसीसे मत कहना, तुझे दो सूप गेहूँ दूँगा। यह साड़ी, चन्दैनीके घर दे आओ। बुढ़िया साड़ी लेकर चन्दैनीके घर गयी। वहाँसे लोरिकके कपड़े ले आयी। लोरिक उन्हें नदी पर धोकर घर पहुँचा। उस समय मनजरिया घर बुहार रही थी। उसने देखते ही कहा—मैने कहा न था कि सभामें मत जाओ। ऐसी सभा तो पहले कभी नहीं होती थी। तुम्हारी आँखें उदास-सी क्यों हैं ! और वह बड़बड़ाती हुई घड़ा लेकर तालमकी ओर चली। तालब पर चन्दैनी अपने कपडे धो रही थी। उसे देखते ही चन्दैनीने पूछा— किसे कोस रही हो बहन। मनजरियान अपने पतिके आँखोंके उदासीकी चर्चा की। तब चन्दैनीने लोरिक के अपने घर आनेकी बात कह दी। बोली—वे घरके परनापर चढ गये और मुझे एक पल सोने नहीं दिया। और हँस पडी। मनजरियाको सन्देह हो गया। मर जा तू चन्देन—कोसती हुई मनजरिया घर आयी। लोरिकको बड़े प्रेमसे नहलाया फिर खाना खिलाया। खाना खाकर लोरिक सोया। शाम हुई तो उसे चन्दैनीकी याद आयी। गाँवकी गायोंको दुहनेके बहाने अपने कपड़े छिपाकर घरसे निकला। रास्तेमें बुढिया धोबिन मिली। बोली—इस रास्ते रोज-रोज मत आया करा नही तो बदनाम हो जाओगे। उसकी खिड़कीसे रस्सी बाँध लो उसीके सहारे बिना किसी के जाने आया-जाया करो। धोबिनके कहनेके अनुसार लोरिकने रस्सी तैयार की। मंजरीयाने रस्सी देख ली और जान गयी कि वह किस कामके लिए बनायी गयी है। उसने उसे कोठारम छिपा दिया। लोरिकने मजरियाकी खुशामद की और उसे मनाकर फिर रस्सी ले ली।

४१४ रस्सी फेंककर लोरिक चन्दैनीकी खिड़कीके पास पहुँचा और रस्सी ऊपर फेंकी। चन्दैनीने उसे लौटा दिया। लोरिकने दुबारा रस्सी फेंकी। चन्दैनीने फिर लौटा दिया। जब चन्दैनीने इस तरह तीन बार रस्सी लौटा दिया तो लोरिक ने चिल्लाकर कहा— यदि इस बार रस्सी नहीं पकड़ोगी तो मैं अपना सिर काट लूँगा। चन्दैनी डर गयी और उसने कमन्द फेंक आने दिया। लोरिक कूदलेते ऊपर उसके कमरेमें आ गया। दोनों प्रणय प्रलाप करने लगे। अन्तमें दोनोंने नगर छोड़कर भाग चलनेका निश्चय किया। उस रात भी लोरिक देर तक सोता रह गया और लोक- ढूँढ़ होनेपर जल्दी-जल्दी उठकर भागा। जल्दीमें सिर चन्दैनीकी साड़ी पहन ली और धोबिनने उसे देख लिया और लोकापवादसे बचाया। चन्दैनी घर छोड़कर भागनेका मुहूर्त पूछने ब्राह्मणके घर गयी। ब्राह्मणने मंगलवारका दिन उपयुक्त बताया। तदनुसार चन्दैनी मंगलवारको भागनेके लिए निर्धारित स्थानपर गयी पर लोरिक नहीं आया। वह सोचती हुई कि अब मैं उससे कभी न बोलूँगी घर आयी। वहाँ उसने लोरिकको अपने खाटपर सोता पाया। चन्दैनी से उसने कहा—मैंने गाँजा अधिक पी लिया था। इससे समयपर ध्यान न रहा। अब धोखा न होगा। दूसरी रात भी लोरिक न आया। इस प्रकार नित्य चन्दैनी भागनेकी तैयारी करती पर लोरिक न आता। अतः एक दिन रातमें चन्दैनी गलेमें घंटी बाँधकर लोरिकके घर पहुँची और घरके बाहर छप्परपर फैली बेलको खींचा। उसके गलेकी घंटी बज उठी। ऐसा लगा जैसे किसी गायने बेल खींची हो और उसके गलेमें घंटी बजी हो। मँझरियाने आवाज सुनी। वह भीतरसे ही चिल्लाई। चन्दैनी थक गयी और फिर कसकर घंटी बजाने लगी। सोचा था मँझरिया गायके भगानेके लिए लोरिकको जगायेगी पर वह खुद ही निकल आयी। चन्दैनीको देखकर उसे पीटने लगी और दूर तक खदेड़ आयी। थोड़ी देर बाद फिर चन्दैनी देवी-देवताओंको मनाती आयी। देखा लोरिक मँझरियाकी जाँघपर सिर रखकर सोया हुआ है। उसे धीरेसे जगाया। लोरिकने कहा—हाँ आज भाग चलेंगे। और धीरेसे एक कम्बल और लाठी उठाकर चलने लगा। अब चन्दैनीकी बारी थी। बोली—मैं तुम्हारे साथ नहीं चालूंगी। तुम किसी के हाथ बेच दोगे किसी नातेमें मुझे दबोच दोगे, या किसी चरवाहेको दे दोगे। जानती हूँ मैं खूबसूरत हूँ, तुम किसीके हाथ बेच दोगे। किसी दूर देशमें बेच दोगे। मैं तुम्हारे साथ तभी चलूँगी, जब तुम अपने सब कपड़े लेकर मेरे साथ सदाके लिए निकल पड़ो। पश्चात् लोरिक अपने सब कपड़े लेकर चलनेको तैयार हो गया और बोला—हम लोग गढ़ हरदी चलेंगे। चन्दैनी बोली—मैं तुम्हारे साथ तबतक नहीं चल सकती जबतक तुम्हारा पौरुष न देख लूँ।

४१५ तब लोरिकने अपनी तलवारसे पेड़की एक डाल काट गिराया। इसपर चन्दैनी ने ताना दिया—बस यही तुम्हारी बहादुरी है। यह सुनकर लोरिक क्रुद्ध हो गया। पासमें ही बाप दादोंका लगाया सेमरका पेड़ था। वह इतना मोटा था कि उसके चारों ओर बारह बैलोंकी रस्सी भी पूरी नहीं पड़ती थी। उसने अपनी तलवार तेज की और पेड़पर एक हाथ मारा। पेड़ जहाँका तहाँ लगा रहा। चन्दैनी हँस पड़ी। लोरिकने डाँटा—चुप रहो। करीब जाकर तो देखो तो तुम्हारे पागल प्रेमीने क्या किया है ! चन्दैनीके छूते ही पेड़ जमीनपर गिर पड़ा। चन्दैनी चलनेको तैयार हो गयी। तब लोरिक बोला—मैं चोरोंकी तरह नहीं चलूँगा। तुम्हारे बापसे कहकर चलूँगा। वह चन्दैनीके घर जाकर जोरसे चिल्लाया—राब्ध गवारि सोते हो या जागते ? मैं चार दिनके लिए बाहर जा रहा हूँ। मजरियाको तुम्हारे ऊपर छोड़े जाता हूँ। ऐसा कहकर चल पड़ा। भीतरसे आवाज आयी—मेरी बीबीको भी लेते आओ, बहुत दिनोंसे उसने अपने माँ-बापको नहीं देखा है। लोरिक बोला—नहीं, नहीं। बुढ़ापेमें वह चलते-चलते मर जायेगी। हाँ, मैं तुम्हारी बछिया साथ लिये जा रहा हूँ। और कहकर वह चल पड़ा। आगे-आगे लोरिक पीछे-पीछे चन्दैनी चली। चलते-चलते वे गेरू नदीके किनारे पहुँचे। नदीमें जोरोंकी बाढ़ थी। लोरिक पहाड़से सेमरका पेड़ काट लाया और बाँधकर बेड़ा बनाया। दोनों उसपर सवार होकर नदी पार करने लगे। नदीमें लोरिकको दो चूहे बहते दिखाइ पड़े। उसने उन दोनोंको उठाकर कन्धोपर रख दिया। रास्तेमें चन्दैनीने चुहियाको उठाकर मिखवाडमें किनारे नहाती हुई स्त्रियोंपर फेंक दिया। यह देखकर चूहेको गुस्सा आया और उसने बेड़ेकी रस्सी काट दी। लोरिक और चन्दा बहने लगे। बहते बहते वे किसी तरह किनारे आ लगे। वे दोनों केवटको खोजने लगे जो उन्हें नावपर बैठाकर पार कर दे। एक केवट मिला मगर वह चन्दैनीके रूपपर मोहित हो गया। उछलकर लोरिक और चन्दैनी उसकी नावपर चढ़ गये। नावपर चढ़कर लोरिकने केवटका कान काट लिया। नदी पार करनेके बाद चन्दैनीने केवटको अपनी साड़ी दी और कहा इसे अपनी बीबीको पहनाना। पहनकर वह भी मेरी ही तरह सुन्दर लगने लगेगी। चन्दैनी अपने प्रेमीके साथ भाग गयी इसकी खबर जब बावनबीरको लगी तो वह लोरिकको पकड़ने निकला। दूरसे लोरिकने उसे नदीके किनारे-किनारे आते देखा। उसने चन्दैनीसे छिप जानेको कहा और स्वयं मन्दिरकी ओर चल पड़ा। बावन बीरने तीर चलाया पर उसका निशाना चूक गया। उसने बारह नीमके पेड़ काटकर मन्दिरपर गिराये। मगर लोरिक बचकर मन्दिरसे निकलकर आगे चल पड़ा। बावनबीर नदी पारकर आया और मंदिरको तोड़ डाला। मगर उसे शत्रु न मिला। वह तो निकल चुका था।

४१६ अब चन्दैनीके मनमें भाव उठने लगा—यदि हम भोगरैने नदी पर न ही होती तो दोनोंमें लड़ाई होती। मैं एकको पराजित होकर बाढ़में बह जाते देखती और जो विजयी होता उसकी गोदमें सोती। जब लोरिकको चन्दैनीके मनकी बात ज्ञात हुई तो वह बहुत गुस्सा हुआ और उसने चन्दैनीको एक चांटा मार दिया। चन्दैनी लगी उसे गालियों और शाप देने—तुझे काला नाग डस ले। आगे जाकर वे लोग एक जगह रुक गये। चन्दैनीने खाना बनानेके लिए आग जलायी। लोरिक उसके पास ही लेट गया। इतनेमें चूल्हेसे एक चिनगारी उठी और नाग बनकर उसने लोरिकको डस लिया। जब वह खाना पका चुकी तो लोरिकको जगाने लगी। लेकिन वह तो मर चुका था। लगी वह जोर-जोरसे रोने। उसी रास्ते महादेव-पार्वती जा रहे थे। चन्दैनीका रोना महादेवसे न देखा गया। उन्होंने अपनी अँगूठी पानीमें धोकर लोरिकके मुँहमें डाल दी और वह जीवित हो उठा। वे लोग आगे बढ़े और चलते-चलते कोरियागढ़ पहुँचे। वहाँ वे एक तालाबके किनारे खाना पकाने लगे। धुँवाँ निकलते देख धनिआ नामक एक बदमाश वहाँ आया और बोला—मेरा कर दे तो हम खाना पकाने दूँगा। चन्दैनीको देखकर वह मोहित हो गया था; कहने लगा—मैं पैसे नहीं लूँगा तुम दोनोंमें से एकको लूँगा। लोरिकने कहा—अच्छा चन्दैनीको ले जाओ। जब धनिआ चन्दैनीको पकड़ने बढ़ा तो लोरिकने उसे पकड़ लिया और उसके सिरको तीन पौंतोंमें मूंड दिया और लगा बेलके फलोंसे उसे मारने। मार खाते-खाते जब धनिआ पागल हो गया तब उसकी तीनों जटोंमें लोरिकने एक-एक फल थाम दिया और भाग जानेको कहा। नगरके लोगोंने जब धनिआको आते देखा तो उन्होंने अपने-अपने दरवाजे बन्द कर लिये। रास्तेमें एक बुढ़िया अपने दरवाजेपर खड़ी रह गयी। उसके दरवाजेपर जाकर धनिआ बोला—अब मैं पागल धनिआ नहीं रहा। मैं साधू हो गया हूँ। तीर्थ करने गया था। उसने अपनी जटा और उसमें बँधे बेलके फलोंको दिखाया। बुढ़ियाने उसके फल निकाल फेंके। वहाँ बैठकर धनिआ चन्दैनीका सौन्दर्यका वर्णन करने लगा। बोला—उसके आगे तो हमारे यहाँकी रानी दासी सी लगती हैं। उसके पैर इतने कोमल और ऐसे लाल हैं, जैसे रानीकी जीभ हो। आगकी तरह उसका सौन्दर्य दमकता रहता है। जाकर राजासे कहो कि वह लोरिकको मार कर उस पद्मिनीको अपनी रानी बनावे। बुढ़ियाने राजासे जाकर कहा। राजाने उन दोनों पहलवानोंको बुलानेकी आज्ञा दी जो नित्य पाँच सेर गेहूँ और एक बकरा खाते थे। जब वे आये तो बोला कि उस आदमीको मारकर चन्दैनीको मेरे पास लाओ। दोनों पहलवान लोरिककी ओर चले। उन्हें आते देख चन्दैनी डरी। पर लोरिकने कहा—डरो मत। ये तो मेरे लिए खिलौने समान हैं। पास आते ही उन्हें उसने कोछल और गल्फे मार भगाया।

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४१८ मंजरियाने सम्ना बनजाराके लोरिकके पास सन्देश भेजा—उसके मकानमें आग लग गयी। उसके सब कबूतर जल मरे। उसके सब बाद्य यन्त्र नष्ट-भ्रष्ट हो गये। मेरा शरीर भी झुलस गया है। तुम दूसरेकी बीवीके साथ भाग गये हो। दूसरे बीवीको तो तुम उपहार देते हो और यहाँ तुम्हारी बीवी दूसरोंके अनाज साफ़ करती फिरती है। उसे शाम भोजनपर भी काम नहीं मिलता। शहरमें उसकी माँ मोथा इकट्ठीका काम करती है। सारी गायें छिन गयीं हैं भाई सब लड़ते झगड़ते मर गये। यह सब तुम जाकर, नायक, उनसे कहना। न कहोगे तो तुम्हें बारह गौ की हत्या। नायकने विश्वास दिलाया कि भैंससे गाड़ी उतारनेके पहले हम तुम्हारा सन्देश कहेंगे। नायकने हरदीगढ पहुँचकर लोरिकके निवास स्थानका पता लगाया। चन्दैनी ने जब यह सुना तो डरी और चुपकेसे नायकको अपने पास बुलाया और उसे गाली देते हुए बोली—मंजरियाका तुम सन्देश लाये हो। और उसकी नाकपर ऐसा घूँसा मारा कि उसकी नाक टूट गयी। फिर अपने शरीरपर दही पोतकर बैठ गयी। नौ शत बिल्लियाँ आकर उसका शरीर चाटने लगीं और फिर परस्पर लड़ने भी लगीं। जिससे उसके सारे शरीरमें खरोंच लग गये और रक्त निकल आया। दोपहरको जब लोरिक लौटकर आया तो चन्दैनीने उससे शिकायत की कि एक नायकने आकर मुझपर बलात्कार करनेकी चेष्टा की थी। लोरिक सुनते ही गुस्सेसे आग बबूला हो गया और लाठी लेकर वह नायकको ढूँढ़ने निकला। नायक अपने डेरेपर नहीं मिला। वहाँ उसकी बीबी थी। उसने लोरिक को गुस्सेमें देखकर बताया—मंजरियाने सन्देश भेजा था। वही कहने नायक तुम्हारे घर गया था। वहाँ तुम्हारी बीबीने उसकी नाक तोड़ दी। यह सुनकर लोरिक बहुत दुखी हुआ। नायकके घावको उसने सेंका और उसके नाक बिठलानेमें उसकी सहायताकी और फिर उससे कहा कि जल्दीसे जल्दी मुझे अपने देश ले चलो। इस प्रकार लोरिक नायकके साथ गौरागढ लौटकर आया। नगरमें पहुँचकर उसने अपनी पत्नीको घर-घर दही बेचते देखा। मंजरियाने उसे न पहचानकर कहा—गहक, मेरी दही ले लो। यह देख वह इतना दुखी हुआ कि कुछ कह न सका और लटकर चला गया। जाते समय वह अपने डेरेसे बाहर अपना डंडा छोड़ गया। लोरिककी छोटी बहन जब उस रास्तेसे निकली तो उसने उस डण्डेको देखा। देखते ही चिल्ला उठी—यह तो मेरे भइयाका डण्डा है। इसीसे वह गौओंको हाँक करते थे। फिर नायकसे पूछा—तुम्हें यह डंडा कहाँ मिला। जब मंजरियाने सुना तो वह भी दौड़ी आयी और उस डण्डेसे लिपट गयी। इतनेमें चन्दैनी डेरेसे बाहर आयी। मंजरियाने उसे देखते ही पहचान लिया और डंडा छोड़कर उसके बाल पकड़ लिए और उसे जमीनपर पटक दिया और गभी

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धोबीके पाटेकी तरह पीटने। नायक जब उसे बचाने आया तो लोरिक बोला—'उन दोनोंको लड़ लेने दो। एक मेरी पत्नी है दूसरी मेरी प्रेयसी। मंजरिया जब जी भर चन्देनीको मार चुकी तो लोरिकने उससे घरका हाल चाल पूछा। तब उसने बताया कि सारा घर बरबाद हो गया। रहनेको घर नहीं है! सारी गायें बिखर गयीं। तुम्हारे भाई मर गये। मैं घर-घर दही बेचती और अनाज फांकती हूँ। यह सुनकर लोरिकने अपनी बहनसे अपने पतिको बुला लानेको कहा। भाईके शोकमें उसने अपने बाल मुंडा डाले। कहा—श्राद्ध होनेपर साधु होकर घूमूँगा और अपनी गायोंको ढूँढकर लाऊँगा। फिर लोरिक अपनी गायोंको ढूँढने निकला और उन्हें ढूँढकर ले आया। लोरिकको आते देख मंजरिया उसके स्वागतको बढ़ी और पैर धोनेके लिए पानी लेकर चली। म्मार भूखसे गया पानी ले आयी! लोरिकने जब यह देखा तो उसका मन बहुत दुखी हुआ और वह उसे छोड़कर चला गया। फिर कभी लौटकर नहीं आया। हीरालाल काव्योपाध्यायने अपने छत्तीसगढ़ी बोलीका व्याकरण में इस कथाका एक दूसरा रूप दिया है। उसका अंग्रेजी अनुवाद जे० ए० ग्रियर्सन ने प्रकाशित किया है।¹ यह रूप उपर्युक्त रूपकी अपेक्षा छोटा और कुछ भिन्न है। उनके अनुसार कथा इस प्रकार है— बाबनबीर नामक एक अत्यन्त चतुर और बलवान पुरुष था जो छः माह्रतक बेखबर सोता रहता और कुछ खाता-पीता न था। उसे चाहे कितना मारो पीटो वह जागता ही न था। लोगोंका कहना तो यह भी है कि उसके पैरोमें एक छाला था, जिसमें नौ सौ बिच्छू रहते थे पर कभी उसे उनका पता ही न चला। उसकी पत्नीका नाम चन्दा था। वह अत्यन्त रूपवती थी और एक ऊँचे महलमें रहती थी जिसके चारों ओर कठोर पहरा लगा रहता था। एक दिन जब बाबन प्रगाढ निद्रामें सो रहा था चन्दाने अपने गाँवके लोरी नामक बरेठ (धोबी) को देखा और वह उसपर मोहित हो गयी। फलतः वे दोनों एक दूसरेसे बाहर इधर उधर मिलने लगे। एक दिन चन्दाने लोरीको अपने महलमें बुलाया। उसका महल बहुत ऊँचेपर था और नीचे सतर्क पहरेदार पहरा दिया करते थे। लोरी महलमें जानेका निश्चय कर महलके निकट गया। उसे वहाँ पहले मनुष्य पहरा देते हुए मिले। उन्हें उसने रुपये देकर भिन्न किया। उसके बादमें गायें पहरा देती मिलीं। उन्हें उसने तृण चारा खिलाया। तीसरे ड्योढ़ीपर बन्दर पहरा दे रहे थे। उन्हें लोरीने मिठाई और चना दिया। उसके बाद वह उस ड्योढ़ीपर आया जहाँ साँप पहरा दे रहे थे। उन्हें उसने दूध पिलाया। इस प्रकार वह चन्दाके महलके नीचे जा पहुँचा। १. जर्नल आफ द एशियाटिक सोसाइटी आफ बंगाल भाग ५ (१८९ ) खण्ड १ पृ १४८ १५३ ।

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ऊपर बरामदेसे चम्पाने रस्सीका पल्ला नीचे गिराया ताकि लोरि उसके सहारे ऊपर आ जाय। लेकिन जब लोरि रस्सी पकड़ने जाता, चम्पा रस्सी खींच लेती। इस प्रकार कुछ देरतक चम्पा हँस-हँसकर मनोविनोद करती रही। जब उसने देखा कि लोरि परेशान हो गया तो उसने रस्सी खींचना बन्द कर दिया और वह उसके सहारे ऊपर चढ़कर बरामदेमें पहुँचा। उसे देखते ही चम्पा कमरेमें छिप गयी। लोरि बड़ी देरतक उसे ढूँढता रहा। अन्तमें जब उसने चम्पाको ढूँढ़ लिया तो दोनों रातभर सहवास करते रहे। सुबहको जब लोरि जागा तो जल्दीमें उसने पपलीरी वस्त्र कण्ठाभरण पछोर (दुपट्टा) उठाकर सिरपर लपेट लिया और रस्सीके सहारे नीचे उतर आया और फिर विभिन्न ज्योतियोंके पहरेदारोंको भेंट देता हुआ अपने घर लौट आया। इतनेमें बरेठिन (धोबिन) जो चम्पाके कपड़े धोती थी, लोरिके घर गयी। वहाँ उसने चम्पाके वस्त्र पछोरको देखकर पहचान लिया और दोनोंके प्रेमकी बात जान गयी। वहाँसे वह चम्पाका वस्त्रपछोर ले आयी और चम्पाको देकर लोरिकी पगड़ी ले गयी। उस दिनसे वह उन दोनोंके बीच दूतीका काम करने लगी। इस तरह दोनोंका प्रणय सम्बन्ध बहुत दिनोंतक चलता रहा। अन्तमें दोनोंने अपना देश छोड़कर दूसरी जगह भाग जानेका निश्चय किया। और एक दिन दोनों घरसे निकल पड़े। गाँवके बाहर पदहान (गोठारू) था। यहाँ चम्पाका मामा रहता था। उसने लोरि और चम्पाको तीन दिनतक बड़े आरामसे रखा और उन्हें घर लौट जानेको समझाता रहा। पर वे न माने और वहाँसे चल पड़े। चलकर एक जंगलमें पहुँचे। उस जंगलमें एक महल था जिसमें खाने-पीनेका बहुत सा सामान और बहुतसे नौकर- चाकर थे। वे दोनों उस महलमें घुस गये और भीतरसे चारो ओरके दरवाजे बन्द कर लिये। वहाँ वे सुखपूर्वक रहने लगे। उधर जब बावनबीर आया तो चम्पाको न पाकर हैरान रह गया। पीछे जब उसे अपने धागेसे पता चला कि वह लोरिके संग भाग गयी है तो वह उसे ढूँढ़ने निकला और उस जंगलमें पहुँचा, जहाँ वे दोनों प्रेमी रह रहे थे। जब उसे मालूम कि वे दोनों उस महलके भीतर हैं तो उसने दरवाजेको तोड़ने-खुलवानेकी बहुत कोशिशकी पर सफल न हो सका, अन्ततोगत्वा निराश होकर लौट आया। एस० सी० दुबेने 'फील्ड सॉंग्स आफ छत्तीसगढ़' में इस कथाको एक अन्य रूपमें प्रस्तुत किया है।¹ इसके अनुसार चन्दैनी लोरिककी ओर उसकी वंशीकी ध्वनि सुनकर आकृष्ट होती है। वह लोरिकको बताती है कि महादेवके शापसे उसका पति निकम्मा हो गया है। वह लोरिकसे तृण छानेका अनुरोध करती है। तब वह उससे पान माँगता है। तृण छानाते समय जब तृण उसकी ओर आता है, १. पृष्ठ ४१-८।

उस समय लोरिक चन्देनीको भयभीत कर उससे अपनेको उसका पति स्वीकार करा लेता है। कथाके इस रूपमें कहा गया है कि जब दोनों प्रेमी अपना गाँव छोड़ कर जाने लगते हैं तो अपशकुन होते हैं और एक मालिन उन दोनोंके इस रहस्यको जान लेती है। मार्गमें लोरिक एक बाघको मारता है। बाबनबीर जब उससे लड़ने आता है तो वह उससे एक हाथसे ही लड़ता है और दूसरेसे चन्देनीकी रक्षा करता रहता है। संथाली रूप चन्देनीकी कथा संथाल परगनेमें भी प्रचलित है; किन्तु वहाँ नायिकाके नामको छोड़कर अन्य पात्रोंके नाम बहुत कुछ बदल गये हैं और मूल कथामें भी काफी परि- वर्तन है। सेसिल हेनरी बाम्प्सने 'फोक लास ऑफ द संथाल परगनाज'में इस कथाको सहदे ग्वाला शीर्षकसे इस प्रकार दिया है¹— सहदे ग्वालाका विवाह राजकुमारी चन्देनीसे हुआ था। विवाहके समय जब सूरज डूबने लगा तो सहदे ग्वालाने सूरजको रुक जानेका आदेश दिया। फलस्वरूप उस दिन सूरजका डूबना एक घण्टेके लिए रुक गया। दूसरे दिन सहदे अपनी पत्नीको लेकर अपने घर रवाना हुआ। घर पहुँचनेमें उसे तीन दिन लगे। एक दिन उसका ससुर उसके घर आया। ससुर दामाद दोनों घूमनेके लिए निकले। सहदे आगे-आगे चलने लगा और श्वशुर उसके पीछे। रास्तेमें चलते हुए सहदेका पैर एक पत्थरसे टकराया। फलस्वरूप पत्थर चकनाचूर हो गया। जब राजा ने अपने दामादकी इस अमानवीय शक्तिको देखा तो वह घबरा गया कि मेरी बेटीकी हालत क्या होगी। घर आकर उसने यह बात अपनी बेटीसे कही। वह भी अपने पिताकी तरह ही घबरा गयी और उसने अपने पितासे वहाँसे भाग चलनेका अनु- रोध किया। बाप बेटीने निश्चय किया कि जब सहदे न्हाना करने चला जाय तो भाग जायँ। एक दिन जब सहदे न्हाना करने पोस्कर मजदूरोंका काम देखने गया तो वृद्ध राजा और उसकी बेटीको भागनेका वह मौका अच्छा जान पड़ा और वे भाग निकले। सहदे ग्वालाके एक बहन थी। उसका नाम था जोगिनी। वह भागी भागी अपने भाईके पास आयी उसने भाईसे भाग जानेका समाचार कह सुनाया। सुनकर सहदे ग्वालाने कहा—भाग जाने दो। सहदे ग्वालाने उस लोटेके जलसे राह में पृथ्वीपर पानीकी एक भारी नदी खड़ी कर दी। पर वे उस जलके किनारे पर से ही भागते चले गये। घर पहुँचने पर चन्देनीने उस बात करने की इच्छा व्यक्त की [फुटनोट]