चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
पृष्ठ 442, कुल 520 में से
संदर्भ में पढ़ें४७ आज्ञाके विपरीत माँजरिने अपने अभीष्ट अपहरणके इस षड्यन्त्रको ताड़ लिया और तत्काल इसकी सूचना अपने सास ससुरको दे दिया। सूचना पाते ही माँजरिके साथ उसकी कुंवारी बहन झुरकी, राऊल धोबी, कूबे और सुडेन सभी गसौलीके राजा (लोरिक)के पड़ाव पर आ पहुँचे और उसे युद्धके लिए ललकारने लगे। ललकार सुनकर जैसे ही लोरिक बाहर आया, राऊलने झपट कर उसका हाथ नेत्रहीन कूबेको पकड़ा दिया। हाथका स्पर्श होते ही कूबेको ज्ञात हो गया कि वह उसके बेटे लोरिकका हाथ है। अपनी इस धारणाको पुष्ट करनेके लिए उसने उसे अपने आलिंगनमें कसकर आबद्ध कर लिया। कूबेके वज्र आलिंगनको सहन करनेकी क्षमता लोरिकके सिवा किसीमें न थी। उसके आलिंगन पाशमें आबद्ध होकर भी जब लोरिक हँसता ही रहा तो कूबेको निश्चय हो गया कि यह लोरिक ही है। और वह स्नेहके साथ उसका पीठ सहलाने लगा। स्नेहातिरेकमें सुसैन और कूबे दोनोंके नेत्रोंकी खोई हुई ज्योति लौट आयी। इस बीच माँजरिकी बहन झुरकीने चनैनको जा पकड़ा और वह उसका प्राण लेने जा ही रही थी कि इन्द्रजीत रोता हुआ माँजरिकी ओर भागा। माँजरिने आकर चनैनको छुड़ाया। बोली—अपने प्रतिशोधके लिये किसी अबोध बालकके माँका प्राण नहीं लिया जा सकता। तत्पश्चात सब लोग घर आये और सुख पूर्वक रहने लगे। लोरिकने अपने भाईका प्रतिशोध लेनेका निश्चय किया और राजा मौष्ट मल्लाहको मार डाला। यही नहीं जितने भी अत्याचारी राजा थे, उन सबको यमलोक पहुँचा दिया। जब उससे लड़ने वाला कोई नहीं बचा तब उसने अपनी आराध्या भवानीकी आज्ञा प्राप्त कर काशी करवट ले लिया। सुप्रसिद्ध पुरातत्त्वविद् अलेक्जेण्डर कनिंघम ने अपने १८७ ८-८१ के उत्तरी और दक्षिणी भागकी यात्राका जो विवरण प्रस्तुत किया है उसमें उन्होंने लोरिक चन्दाकी कथा दी है जो उपर्युक्त कथा से थोड़ा भिन्न है।¹ उन्होंने लिखा है कि उन्हें तिरहुत की यात्रामें हरषा-बरषा का नाम बहुत सुनाई पड़ा। उन्हें उनके सम्बन्धमें जो जानकारी प्राप्त हुई उसके अनुसार हरषा-बरषा भाई-भाई और जातिके दुसाध थे। वे नैठारपुरमें राज करते थे। वे बड़े ही लड़ाकू थे और उन्होंने बहुतसे राज्योंको लूट कर मार डाला था। उन्हीं दिनों लोरिक और छेछर (अथवा सिरक) नामक दो पड़ोसी राजा थे जो गौरामें रहते थे। लोरिक अपनी पत्नी माँजरको त्याग कर चनाइनके साथ हरदी भाग गया। वहाँके राजा मल्लारने जो जातिका अहीर था उसका विरोध किया। दोनोंमें लड़ाई हुई। लोरिकने मल्लारको पराजित कर दिया। तदनंतर दोनों परस्पर मित्र बन गये। १. आर्क्योलाजिकल सर्वे रिपोर्ट, खण्ड १९ १८८३ पृ २७-२८।