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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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धोबीके पाटेकी तरह पीटने। नायक जब उसे बचाने आया तो लोरिक बोला—'उन दोनोंको लड़ लेने दो। एक मेरी पत्नी है दूसरी मेरी प्रेयसी। मंजरिया जब जी भर चन्देनीको मार चुकी तो लोरिकने उससे घरका हाल चाल पूछा। तब उसने बताया कि सारा घर बरबाद हो गया। रहनेको घर नहीं है! सारी गायें बिखर गयीं। तुम्हारे भाई मर गये। मैं घर-घर दही बेचती और अनाज फांकती हूँ। यह सुनकर लोरिकने अपनी बहनसे अपने पतिको बुला लानेको कहा। भाईके शोकमें उसने अपने बाल मुंडा डाले। कहा—श्राद्ध होनेपर साधु होकर घूमूँगा और अपनी गायोंको ढूँढकर लाऊँगा। फिर लोरिक अपनी गायोंको ढूँढने निकला और उन्हें ढूँढकर ले आया। लोरिकको आते देख मंजरिया उसके स्वागतको बढ़ी और पैर धोनेके लिए पानी लेकर चली। म्मार भूखसे गया पानी ले आयी! लोरिकने जब यह देखा तो उसका मन बहुत दुखी हुआ और वह उसे छोड़कर चला गया। फिर कभी लौटकर नहीं आया। हीरालाल काव्योपाध्यायने अपने छत्तीसगढ़ी बोलीका व्याकरण में इस कथाका एक दूसरा रूप दिया है। उसका अंग्रेजी अनुवाद जे० ए० ग्रियर्सन ने प्रकाशित किया है।¹ यह रूप उपर्युक्त रूपकी अपेक्षा छोटा और कुछ भिन्न है। उनके अनुसार कथा इस प्रकार है— बाबनबीर नामक एक अत्यन्त चतुर और बलवान पुरुष था जो छः माह्रतक बेखबर सोता रहता और कुछ खाता-पीता न था। उसे चाहे कितना मारो पीटो वह जागता ही न था। लोगोंका कहना तो यह भी है कि उसके पैरोमें एक छाला था, जिसमें नौ सौ बिच्छू रहते थे पर कभी उसे उनका पता ही न चला। उसकी पत्नीका नाम चन्दा था। वह अत्यन्त रूपवती थी और एक ऊँचे महलमें रहती थी जिसके चारों ओर कठोर पहरा लगा रहता था। एक दिन जब बाबन प्रगाढ निद्रामें सो रहा था चन्दाने अपने गाँवके लोरी नामक बरेठ (धोबी) को देखा और वह उसपर मोहित हो गयी। फलतः वे दोनों एक दूसरेसे बाहर इधर उधर मिलने लगे। एक दिन चन्दाने लोरीको अपने महलमें बुलाया। उसका महल बहुत ऊँचेपर था और नीचे सतर्क पहरेदार पहरा दिया करते थे। लोरी महलमें जानेका निश्चय कर महलके निकट गया। उसे वहाँ पहले मनुष्य पहरा देते हुए मिले। उन्हें उसने रुपये देकर भिन्न किया। उसके बादमें गायें पहरा देती मिलीं। उन्हें उसने तृण चारा खिलाया। तीसरे ड्योढ़ीपर बन्दर पहरा दे रहे थे। उन्हें लोरीने मिठाई और चना दिया। उसके बाद वह उस ड्योढ़ीपर आया जहाँ साँप पहरा दे रहे थे। उन्हें उसने दूध पिलाया। इस प्रकार वह चन्दाके महलके नीचे जा पहुँचा। १. जर्नल आफ द एशियाटिक सोसाइटी आफ बंगाल भाग ५ (१८९ ) खण्ड १ पृ १४८ १५३ ।