चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
पृष्ठ 506, कुल 520 में से
संदर्भ में पढ़ेंवार्तिक ग्रन्थका कार्य समाप्त होनेके दिनसे इन पंक्तियोंके लिखनेतक पूरे पौने दो साल हो गये। इस लम्बी अवधि में एक और मुद्रकका कार्य मन्थर गतिसे होता रहा दूसरी ओर ग्रन्थसे सम्बन्ध रखनेवाली अनेक घटनाएँ घटीं प्रूफ़ देखते समय अनेक प्रकारके विचार मनमें उठे धारणाएँ बनीं, नये तथ्य उपलब्ध हुए। उन्हें अगले संस्करणतक रोक रखना पाठकके प्रति अन्याय होगा यह सोचकर, जिन बातोंका समावेश प्रूफ़ देखते समय यथास्थान हो सका उन्हें यहाँ समाविष्ट करनेकी चेष्टा की गयी। जो बातें रह गयीं उनमेंसे आवश्यक बातोंको यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है। पाठकोंसे अनुरोध है कि उन्हें यथोचित रूपमें ग्रहण करनेकी उदारता दिखायें। एक अनुभव इस ग्रन्थका सम्पादन कार्य करते समय हिन्दी साहित्यके माने-गने महा रथियोंकी व्यावहारिक संकीर्णताका जो अनुभव हुआ उसकी चर्चा अनुशीलन के प्रस्तुत होने अन्यत्र की है। उसका अधिक विकृत रूप उसके बाद देखने को मिला। ब्रिटिश म्यूजियमके आमन्त्रणपर लन्दन पहुँचनेके बाद एक दिन मैं रीलेण्ड्स पुस्तकालयकी प्रतिको आँखों देखने मेनचेस्टर गया। वहाँ पुस्तकालयके हस्तलिखित ग्रन्थ विभागके एक अधिकारीने चन्द्रावनकी चर्चाके बीच अचानक कुछ याद करते हुए पूछा— क्या आपके यहाँके (हिन्दीक) साहित्यकारों और अध्यापकोंको ज्ञात है कि आपने इस ग्रन्थको ढूँढ निकाला है? हाँ।—मैने कहा। क्या वे यह भी जानते हैं कि आप इसका सम्पादन कर रहे हैं? हाँ। तब तो उनमें आश्चर्यजनक अद्येय और विषयहीनता भरी है। और—उनके पेशानीपर कुछ अजीब-सी घृणाकी रेखाएँ उभर पड़ीं। उनका आशय मैं समझ न सका। अवाक् उनकी ओर देखता रह गया। और तब उन्होंने मेरी ओर एक फ़ाइल बढ़ा दी। उनमें थे हिन्दीके कतिपय विद्वान् अध्यापकोंके पत्र। इन पत्रोंमें उन्होंने चन्द्रावतकी प्रति माइक्रोफिल्मकी माँग की थी। उस फ़ाइलमें उनका उत्तर भी था। उन्होंने इन उदाहरणों के मुताल्लिक