चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग सुओंको स्पष्ट शब्दोंमें बिना मेरी अनुमतिके माइक्रोफिल्म देने तथा उसके सम्पादन प्रकाशनकी अनुमति देनेसे इनकार कर दिया था। फिर बोले—यह ग्रन्थ हमारे यहाँ इतने दिनोंसे था। हमें उसक सम्बन्धमें तनिक भी जानकारी न थी। आपने उसे ढूंढ़ा खोज निकाला उसका महत्व बताया। यह आपकी महत्वपूर्ण खोज है इसपर आपका अधिकार है। इन्हें माइक्रोफिल्म कैसे दे दूँ! इस प्रकार अंग्रेजी चरित्र-बलकी दृढताके कारण इन मित्रोंकी साहित्यिक डाकेजनीकी चेष्टा विफल होते होते रह गयी और मैं लुटता लुटता बच गया। साथ ही यह भी स्वीकार करनेमें हानि नहीं कि इस डाकेजनीका प्रयास मेरी अपनी ही मूर्खताके कारण सम्भव हुआ। दूधका जला मठा फूंककर पीता है। बम्बई प्रतिपर किये गये झमपर जो बीता था उससे सजग होकर ग्रन्थ सम्पादन सामग्री समाप्तिवक मैंने रीडेण्ट्स प्रति सम्बन्धी जानकारी अपने और अपने कुछ विश्वस्त जनोंतक ही सीमित रखनेका प्रयत्न किया था। फिर भी कुछ लोगोंको इतनी गन्ध तो मिल ही गयी कि यूरोपके किसी पुस्तकालयसे 'चन्दायनी'की कोई प्रति मेरे हाथ लगी है। यह ग्रन्थ पाते ही साहित्यिक द्रव्योंके एक प्रख्यात और कुशल सम्पादकने अपने चक्षुस लगाकर उस प्रतिका सूत्र जाननेकी चेष्टा की। असफल होनेपर अपनी सम्पादन योग्यताकी दुहाई देते हुए कहलावा कि मैं उस प्रतिको उन्हें सम्पादन करनेके लिए दे दूँ; वे उसपर अधिक योग्यतापूर्वक सम्पादन कर सकेंगे। मैंने स्पष्ट 'ना' कर दिया। मैंने समझा बात खतम हो गयी। जब ग्रन्थका सम्पादन-कार्य समाप्त हो गया और पाण्डुलिपि प्रकाशकके हाथमें चली गयी तब सोचकर कि खतरा दूर हो गया अब इस प्रतिके खोजकी रोमांचक कहानी लोगोंको बता देनेमें कोई हानि न होगी मैंने वह कहानी धर्मयुगमें प्रकाशनार्थ भेज दिया। उसके प्रकाशित होते ही लोग उस प्रतिको प्राप्त करनेके लिए दौड़ पड़े। साहित्यके क्षेत्रमें इस प्रकारकी मनोवृत्ति अत्यन्त खेदजनक है। इससे अधिक क्या कहूँ! आगरा संस्करण बहुत दिनोंसे विश्वनाथ प्रसाद और माताप्रसाद गुप्त सम्पादित चन्दा यनके कन्हैयालाल मुंशी हिन्दी तथा भाषा विद्यापीठ आगरा विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित किये जानेकी बात सुनी जा रही थी। पर न जाने किन कारणोंसे उसका प्रकाशन रुका रहा। अब वह इस बीच प्रकाशित हो गया। चन्दायनीका यह संस्करण अपने आपमें अद्भुत है। इसकी विचित्रता इस बातमें है कि पुस्तकमें स्वतः दो खण्ड हैं। पहले खण्डमें विश्वनाथ प्रसादने चन्दायिन शीर्षकसे बम्बई प्रतिका और दूसरे