चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
पृष्ठ 508, कुल 520 में से
संदर्भ में पढ़ेंग रूपमें लोरकहा नामसे माताप्रसाद गुप्तने काशी, मनेर और पंजाब प्रतियोंका पाठ उपस्थित किया है। विश्वनाथप्रसादने बम्बई प्रतिके व्यतिक्रम पृष्ठोंको क्रमबद्ध करनेकी चेष्टा की आवश्यकता नहीं समझी। माताप्रसाद गुप्तने काशीवाले पृष्ठोंको आरम्भका, मनेर प्रतिको मध्यका और पंजाब पृष्ठोंको अन्तका मानकर उसी क्रमसे उनका पाठ उपस्थित कर दिया। पहले खण्डके आरम्भमें एक प्रस्तावना है और दूसरे खण्डके प्रारम्भमें एक भूमिका दी गयी है। इस प्रकार दोनों खण्ड एक दूसरे से इतने स्वतन्त्र हैं कि उन्हें एक जिल्दमें बँधे दो स्वतन्त्र संस्करण कहना उचित होगा । इसको देखकर मेरी स्वाभाविक मानवीय दुर्बलताए उभर आयीं। मुझे विषाद और हर्ष दोनों ही हुआ । विषाद इस कारण हुआ कि मुद्रण कार्यकी मन्द गतिके कारण पाठकोंके सम्मुख चन्दायणको सर्वप्रथम प्रस्तुत करनेका श्रेय मुझसे छिन गया। किन्तु वह विषाद क्षणिक ही था। उसने अपना रूप यह देखकर धारण कर लिया कि इसके प्रकाशनसे पाठकोंको मेरे सम्पादन कार्यके श्रमको आँकनेका माप दण्ड प्राप्त हुआ है। आगरा संस्करणके दोनों ही विद्वान् सम्पादकोंको चन्दायणक किन प्रतियोंके फोटो उपलब्ध रहे हैं उन प्रतियोंके फोटो मुझे भी सुलभ थे। दोनोंको उनके फोटो न केवल एक सूत्रसे प्राप्त हुए वरन् उनके प्रिन्ट्स भी एक ही नेगेटिवोंसे तैयार किये गये थे। इस प्रकार कोई यह नहीं कह सकता कि विभिन्न प्रकारकी प्रतियोंसे प्रस्तुत संस्करण और आगरा संस्करण तैयार किये गये हैं। जहाँतक बम्बई मनेर काशी और पंजाब प्रतियोंका सम्बन्ध है दोनों ही संस्करण स्वाभाविक क्रमसे एक ही प्रतिके दो स्वतन्त्र पाठ हैं। इन दोनों पाठोंमें कितना वैषम्य है यह पाठोंकी तुलना करके सुगमतासे जाना जा सकता है। सुविधाकी दृष्टिसे उदाहरण स्वरूप कुछ पंक्तियाँ यहाँ उद्धृत की जा रही हैं —
आगरा संस्करण प्रस्तुत संस्करण (खण्ड १) बाज विरह मिलि मुँडुआ परा । (पृ ४ ) जान पाहिँ मूँसि मुँडुआ भरा ॥ ८५।१ सुन्दर क सोहाग मको सबरी । सुन्दर सोहाग मण्ड तिल संगू । पद्म विसारस बैठ मडम को ॥(पृ ४ ) पदम पुहूप सिर बैठ भुजंगू ॥ ८५।२ तिस विरहीन बस संजेही बरी । तिस बिरहें बस मुँचली बरी । अध कार आधे रत मरी ॥ (पृ ४ ) आधी बार आधी रत फरी ॥ ८५।४ राजा कै के सुझहि निआई । (पृ ४ ) राजा गियैं कै सुझहु निआई ॥ ८६।१ छिंदौ तराइन सतम्यो गोरी । देंउ तराईहि हँसो गोरी । नैसँ थरउर के फोन्द बनावी ॥(१ ४१) गियँ कैंचर गइ निसिस भजोरी ॥ ८६।३ असकँ सगरा आदि क फागू (१ ४१) जय गियँ सगराँहि डीठ * * * ॥ ८६।४