चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
ग रूपमें लोरकहा नामसे माताप्रसाद गुप्तने काशी, मनेर और पंजाब प्रतियोंका पाठ उपस्थित किया है। विश्वनाथप्रसादने बम्बई प्रतिके व्यतिक्रम पृष्ठोंको क्रमबद्ध करनेकी चेष्टा की आवश्यकता नहीं समझी। माताप्रसाद गुप्तने काशीवाले पृष्ठोंको आरम्भका, मनेर प्रतिको मध्यका और पंजाब पृष्ठोंको अन्तका मानकर उसी क्रमसे उनका पाठ उपस्थित कर दिया। पहले खण्डके आरम्भमें एक प्रस्तावना है और दूसरे खण्डके प्रारम्भमें एक भूमिका दी गयी है। इस प्रकार दोनों खण्ड एक दूसरे से इतने स्वतन्त्र हैं कि उन्हें एक जिल्दमें बँधे दो स्वतन्त्र संस्करण कहना उचित होगा । इसको देखकर मेरी स्वाभाविक मानवीय दुर्बलताए उभर आयीं। मुझे विषाद और हर्ष दोनों ही हुआ । विषाद इस कारण हुआ कि मुद्रण कार्यकी मन्द गतिके कारण पाठकोंके सम्मुख चन्दायणको सर्वप्रथम प्रस्तुत करनेका श्रेय मुझसे छिन गया। किन्तु वह विषाद क्षणिक ही था। उसने अपना रूप यह देखकर धारण कर लिया कि इसके प्रकाशनसे पाठकोंको मेरे सम्पादन कार्यके श्रमको आँकनेका माप दण्ड प्राप्त हुआ है। आगरा संस्करणके दोनों ही विद्वान् सम्पादकोंको चन्दायणक किन प्रतियोंके फोटो उपलब्ध रहे हैं उन प्रतियोंके फोटो मुझे भी सुलभ थे। दोनोंको उनके फोटो न केवल एक सूत्रसे प्राप्त हुए वरन् उनके प्रिन्ट्स भी एक ही नेगेटिवोंसे तैयार किये गये थे। इस प्रकार कोई यह नहीं कह सकता कि विभिन्न प्रकारकी प्रतियोंसे प्रस्तुत संस्करण और आगरा संस्करण तैयार किये गये हैं। जहाँतक बम्बई मनेर काशी और पंजाब प्रतियोंका सम्बन्ध है दोनों ही संस्करण स्वाभाविक क्रमसे एक ही प्रतिके दो स्वतन्त्र पाठ हैं। इन दोनों पाठोंमें कितना वैषम्य है यह पाठोंकी तुलना करके सुगमतासे जाना जा सकता है। सुविधाकी दृष्टिसे उदाहरण स्वरूप कुछ पंक्तियाँ यहाँ उद्धृत की जा रही हैं —
आगरा संस्करण प्रस्तुत संस्करण (खण्ड १) बाज विरह मिलि मुँडुआ परा । (पृ ४ ) जान पाहिँ मूँसि मुँडुआ भरा ॥ ८५।१ सुन्दर क सोहाग मको सबरी । सुन्दर सोहाग मण्ड तिल संगू । पद्म विसारस बैठ मडम को ॥(पृ ४ ) पदम पुहूप सिर बैठ भुजंगू ॥ ८५।२ तिस विरहीन बस संजेही बरी । तिस बिरहें बस मुँचली बरी । अध कार आधे रत मरी ॥ (पृ ४ ) आधी बार आधी रत फरी ॥ ८५।४ राजा कै के सुझहि निआई । (पृ ४ ) राजा गियैं कै सुझहु निआई ॥ ८६।१ छिंदौ तराइन सतम्यो गोरी । देंउ तराईहि हँसो गोरी । नैसँ थरउर के फोन्द बनावी ॥(१ ४१) गियँ कैंचर गइ निसिस भजोरी ॥ ८६।३ असकँ सगरा आदि क फागू (१ ४१) जय गियँ सगराँहि डीठ * * * ॥ ८६।४
च दै सराब राजाकर सीस कंठ अंकवारि । दिये सिराव राजारर सुकवि कण्ठ (पृ ४१) अंकवारि ॥ ८६।१ दई पीत जिउ बर संचारा । (पृ ४३) दई विपति बिजभर संचारा ॥ १८२।१ बेहु मूंछि ल्यों को जहा हौं कसगा देदहि मूछि हूं को जहा हौं कसगम बिसडार । (पृ ४३) बिसैभार ॥ १८२।६ उपजा देस मुंद्रिका भक्ती । (पृ ४४) उपजा बैस मंदिर गा भरी ॥ १४१।२ वीरा जिमहि बिसारि । (पृ ४५) बीरा भीम पसारि ॥ १२१।७ पत्थन्ह केहि तर यह गिय पासा । पतरिहैं कई सुरे बन पासा ॥ १५ ॥१ (पृ ४७) (खण्ड २) चन्दर अकल करा जनु पाए । वँवर किकार करा जनुकराई ॥ (पृ १९) जेहि मग बैठे अत्तिव सुहाए । चमक बतीसी असइ सुहाई ॥ १४६।२ ताती राति विछवाई इनि कहा रानी रात बिछौरी इनि यत्न विअल दुख व्याधि । भैरैसि बाउ सकोबी तब जिचहि कटारि कल्प सर पाव सकोवे ठिरिखि कटार सुइर्शन ॥ (पृ १२) सुहाइ ॥ १४५।८ मेरु हुटि कइ स्वाइ जलावा । (पृ १६) मेकि बरह कै स्वापु करावा ॥ २९१।७ कार अङ्क महिहै बासी । (पृ १७) कार अंग पहिर कै बाले ॥ २९४।१ सुनु सखि माहिं मधुमकर कर बाता । कहीं सखी माह माँस के बाता । अइसइ रंग सरहि चवि राता (पृ ४७) अससि राँग सगै छवि राता ॥ ४।२ इस पाठ वैषम्यको देखकर कदाचित् किसीके लिए भी यह स्वीकार करना सम्भव न होगा कि ये संस्करण किसी एक ही प्रति अथवा प्रति परम्पराके पाठ प्रस्तुत करते हैं और उनम किसी प्रकारका पाठ-सम्बन्ध है अथवा हो सकता है । इस तथ्यके प्रकाशमें विचारणीय हो जाता है कि क्या इस ढंगके ग्रन्थोंके कैथी और नागरी प्रतियोंके साथ उनकी फारसी प्रतियोंकी किसी प्रकारके प्रति-परम्परा अथवा पाठ सम्बन्ध होनेका आग्रह किया जा सकता है ? जो भी हो आगरा संस्करणके प्रकाशनने फारसी लिपिमें मुद्रित हिन्दी ग्रन्थोंकी दुर्बोध्यता सिद्ध कर मेरा बहुत बड़ा भार हलका कर दिया । उसके प्रकाशनके अनन्तर पाठक प्रस्तुत संस्करणको देखेंगे तो वे मेरी कठिनाइयोंको पहलेकी अपेक्षा अधिक सहानुभूति के साथ समझ और सराह सकेंगे । शब्द-शोध मेरा पाठ सर्वथा निर्दोष है ऐसा मेरा दावा नहीं है । मुझे स्वयं अपने पाठोंके
५ सन्तोष नहीं है। अक्सर यत्र-तत्र काईकी काफी मोटी तह जमी हुई है। बार बार खुरच-मलनेसे ही मूल शब्द अथवा उत्तम पाठतक पहुँचा जा सकता है। उपक्रममें प्रूफ देखते समय पाठक बहुत से उत्तम रूप पकड़में आय और उनके अनुसार यथास्थान संशोधन-परिवर्तन किये गये। कुछ पाठ-दोष मुद्रणके पश्चात् कानमें आये और यत्र-तत्र मुद्रण-दोष भी प्रतीत हुए। ऐसे दोषोंका परिमार्जन यहाँ किया जा रहा है— पंक्ति मुद्रित उचित पंक्ति मुद्रित उचित १२।६ संस्वर संस्कारक ७१।४ दिर फिरि १८।६ सस्कार संसार ७१।७ दिवस देवत २।११ देव देठ ७३।४ तिहवों तहवों २।१७ भोर लौर ८।२ के भिप २६।२ भागर सागर ८०।३ पिरिधर्म पिरिधर्मी ३।४ बनानी बिनानी ८४।१ कूँक फूँकू ३१।४ बनानी बिनानी ८४।४ भी भिय ३१।७ देव दठ ८६।७ गोबर गोबर ३२।४ भी भिय ८८।५ उपाने उपाये ३३।७ और अउर ८८। यान गये ३३।७ नम्बर नखत ८।१२ सदवों तहवों ३४।७ गबरू गंभारप १९।४ वनि पवन ४।१ रात राति ३।२ सड़क झनक ४।१२ अठनारा अठवारा ३।७ गुन गन ४।४ उकाने फकाने १३।७ गबरू गंभारप ४४।१ भैंस भैंस ९।१ सुभन सान ४७।६ प के ९।१३ गाय माइ ४८।४ भी भिय ९।८ भींग भीजत ४।७ अधरख अधरोष्ठ १।५४ बिराइ बिपादि ४।५ क दे ता के तारे २। धानि पानि ७।१० सुराजन निराजन १६। भी भिर ७।४ सुराजन निराजन ६।३ दुर्गम पुर्मांद ७।१९ सुराजन निराजन १।८ परगसिह फर्रांद ७२। जिनु जैन २।४ गइ काइ ७३।७ बेन बरन १९८।४ लय बाबा लय बावा ६८।७ शिए शिष्ट ३७ ह्वार द्वार ६।४ शेन — ४,५ — —
८ पंक्ति मुद्रित उचित पंक्ति मुद्रित उचित १२।१४ दख देख ३ ५।२ बिधाता विधाता १३५।२ बिजैसेन बिजैसेन ३ ७।६ बगौँ क्यगौँ १३८।१ देंष बेट ११६।२ पुरुष पुस्त १८४।६ जँबरधर जँबरधार ३१६।७ शार बारि १४४।४ पिटोरे पिटोरी ३२६।६ बार बारि १४५।१ शरह शिरह ३२६।१ बटि काटि १८१।६ परम परब ३२२।४ अडनारइँ जेडनारइँ १५५।१ टिटहरी बिटिटिहरी ३२३।६ धरइँ भरइँ १५६।२ मूंज भूंज १५८।२ गबडि गारुडि १५७।१ पनि पानि ३६१।६ नौर शर १६ १४ याण दाण ३६ १४ के कै १०२।६ कथा कजा ३६२।२।४ काडे छाडे २ १।१ शौर शोर ३६२।२।४ जमकाय झमकाय २ ७।२ क्यमक बगमक ३६२।२।७ ननहिँ नरहिँ २ १६ सीह-सिंदूर सीँह सिंधूर ३६२।२।४ रमक रंग २ ५।७ नियारँग नितारँग ३६९।२।४ नान बान ९ ३।२ बैनौँ बनौँ ३६२।२।५ फर घर २ १।१ बाना बाजा ३६२।२। मान मान २ १।७ बास सास ३७७।३ नौर शर २ ८।५ रूंधि सूनि ९६।५ मम ससुल २४१।१ माथ माठ ४ १२ मैन सैन ४८।७ रात हात ४ ५।७ देष उठान डड उठान २५१।१ दव दउ ४१७७२ रव दम्ह २६०।२ दर्डाँगी पर्डाँगी ४१.J दारा डारा ७ । दष डष दंड ४२/१८ कद्यारि फद्यारी ७ ७ मूं मूंठि ४२६।१ मि मरुझ । मंति मति ४८०। नादिर खदिउ १० मेघराग नेधिराग ४४८। नौर शर उपर्युक्त बात पर्यन्त उत्तर साथ भी मैं कहना चाहूँगा कि उच्चारण मैथिल लिपि तथा भाट अन्तराचार कारण अनेक शब्दों के समझने में अवश्य भूल हुई होगी। यदि पाठक जन या पाठकों की दृष्टि आप जाय व उन्हें स्पष्ट और पहचान पावे तो उनकी सूचना मैं उनकी उदारता अवश्य गिनाय। किसी प्राचीन ग्रन्था मध्य शोधन करना बड़ा ही दुर्भर और श्रमसाध्य सा काम ही मेरी समझ में है।
छ नये तथ्यों, नयी जानकारीके आधारपर संशोधन-परिशोधन होना अनिवार्य है और यह कार्य निरन्तर चलते रहनेवाला है। नयी टिप्पणियाँ चन्दायनमें प्रयुक्त शब्दों पर जैसी व्याख्या और टिप्पणी दी जानी चाहिये थी वह नहीं दी जा सकी। अपनी इस असमर्थताके सम्बन्धमें अन्यत्र निवेदन कर चुका हूँ। इस अवधिमें कुछ बात मेरे ध्यानमें आयीं हैं, उनका उल्लेख यहाँ कर देना उचित होगा। मलिक बयाँ (१७।५) — ऐतिहासिक ग्रन्थोंसे मलिक बयाँके सम्बन्धमें कुछ भी ज्ञात नहीं होता किन्तु विपुलगिरि (राजगृह) स्थित एक मन्दिरसे प्राप्त एक संस्कृत अभिलेखसे ज्ञात हुआ है कि उनका पूरा नाम मलिक इब्राहीम बया था और उनके पिता का नाम अबू बक्र था। वे फीरोज तुगलकके शासन कालमें बिहार के मुक्ती (शासक) थे। उन्हें सैफ-उद्-दौलत की उपाधि प्राप्त थी। (जर्नल आफ बिहार रिसर्च सोसाइटी १९१९ पृ ३३१-३४१)। इनकी समाधि बिहार शरीफ (पटना) में पीर पहाड़ीपर बनी हुई है। वहाँके प्राप्त एक फारसी अभिलेखसे ज्ञात होता है कि उनकी मृत्यु १३ ज़िल्हिज्ज ७५३ हिजरी (२ जनवरी १३५३ ई ) को हुई थी। (एपीग्राफ़िया इण्डिका अरबिक एण्ड पर्शियन सप्लीमेण्ट, १९५५-५६ पृ ६-७)। गाबर (१८४।१) —यह शब्द गोवरका प्राकृत रूप जान पड़ता है (गोवर > गोअर > गोबर)। पाइअ-सद्दमहण्णवो नाममाला नामक ग्रन्थके अनुसार गोअर विषयका पर्यायवाची था अथवा गोवर किसी विषयका नाम था। इससे गाबर नामक नगरके होनेका समर्थन होता है। इसके सम्बन्धमें लोगोंकी जो धारणाएँ हैं उन्हें यथास्थान देकर मैंने काव्यमें प्रस्तुत भौगोलिक सूत्रोंकी ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा था कि वह गया नदीसे बहुत दूर न होगा और उसके निकट स्थित देवहा नदीकी पहचान होनेपर इस स्थानकी स्थिति अधिक प्रामाणिकताके साथ निश्चित की जा सकेगी (पृ ८६)। अब ज्ञात हुआ है कि देवहा नामकी एक नदी वस्तुतः है और वह बड़ोदके निकट गंगामें मिलती है (२ १६५)। अतः गाबरका बनारसके निकट ही कहीं होना चाहिए। चन्दायनके भोजपुरी लोककथा रूपमें गोवरका अनेक स्थलोंपर बनारसका स्थान कहा गया है। इससे भी गाबरके बड़ोदके निकट होनेका समर्थन होता है। इस प्रसंगमें हमारा ध्यान अज्ञात इस कथनकी ओर भी जाना चाहिए क बाट गएउ हरही दूसर गई महाव (२ ३)। इसके अनुसार गाउरसे एक मार्ग हरही और दूसरा गूँडेश्वरी पर जाता था। बनारस और महावरका पारस्परिक सम्बन्ध मध्यकालमें बहुत रहा है। घागर (३६।३ —दमक हल अंगवद (२ ) निसर रगडो एक जुही दछपा
ङ कवि-परिचय मौलाना दाऊदका परिचय देते हुए मैंने कल्पना अंक १२४ (पृ० १७)में लिखा था—तवारीख़-ए-मुबारक शाहीमें एक शेख़ बाछकका उल्लेख है जिन्हें खानजहाँके निजी मौलानाका पुत्र (मौलानाजादा) कहा गया है। खानजहाँने फीरोज़ शाहको अपने विरुद्ध भारी सेना लेकर आते देखकर इन्हें कुछ लोगोंके साथ शाहको सन्तुष्ट करनेके लिए भेजा था। अधिक सम्भावना इस बातकी है कि शेख़ बाछक अन्य न होकर यही मौलाना दाऊद थे। यदि हमारा यह अनुमान ठीक है तो मानना होगा कि दाऊद खानजहाँके कृपा पात्र ही नहीं अत्यन्त विश्वास पात्र भी थे। पीछे ज्ञात हुआ कि यहाँ जिस खानजहाँका उल्लेख है वह खानजहाँ मक़बूल अथवा खानजहाँ जौनाशाह न होकर एक तीसरे खानजहाँ अहमद अयाज़ थे जो मुहम्मद तुगलक़की मृत्युके समय दिल्लीमें उनके नायब थे। उन्होंने फीरोज़शाह तुगलकके विरुद्ध एक अज्ञात कुलीन लड़केको मुहम्मद तुगलकका बेटा घोषितकर गद्दीपर बैठा दिया था। तत्पर जब फीरोज तुगलकने उनके विरुद्ध अपनी सेना भेजी तो उन्होंने अपने मौलानाज़ादा शेख बाछकको शाहको सन्तुष्ट करनेके लिए भेजा था। इस प्रकार स्पष्ट है कि खानजहाँ अहमद अयाज़के मौलानाज़ादा शेख़ बाछक और खानजहाँ मक़बूल और खानजहाँ जौनाशाहसे संरक्षित चन्दायमके रचयिता मौलाना दाऊद दो भिन्न व्यक्ति थे। इस तथ्यसे परिचित हो जानेपर मैंने इस बातकी चर्चा दूत ग्रन्थमें परिचयके प्रसंगमें जान बूझकर नहीं किया। किन्तु अब इसका उल्लेख इसलिए आवश्यक हो गया कि चन्दायमके आगरा संस्करणकी प्रस्तावनामें विश्वनाथ प्रसादने वही भूल की है जो मैंने की थी अर्थात् उन्होंने तवारीख़-ए- मुबारकशाहीके उक्त कथनको अपने शब्दोंमें उपस्थित कर दिया है जिससे नये तथ्यके प्रकाशमें आनेका भ्रम होता है। दाऊदके मौलाना होनेका प्रमाण मैंने परिचय देते समय कई सूत्रोंसे दिया है। उस समय मेरा ध्यान इस बातकी ओर नहीं गया था कि अख़बार-उल-अख्यारके लेखक शेख़ अब्दुलहक़ने भी उन्हें मौलाना कहा है। साथ ही उन्होंने दाऊदके शेख़ जैनुद्दीनके शिष्य होने और चन्दायममें जैनुद्दीनकी प्रशंसा किये जानेकी बात भी लिखी है जिससे चन्दायमकी पवित्रताका समर्थन होता है। अख़बार-उल-अख्यारकी ये पंक्तियाँ हैं—शेख़ जैनुद्दीन ख्वाहरजादा व खादिमे खास शेख नसीरुद्दीन चिरागे देहली अस्त। जिन्दःरू दर मजलिस व मल्फूजाते शेख हुस्न याफ़्ता अस्त। मौलाना दाऊद व मुसन्निफे चन्दायम मुरीदे ओस्त व मद्हे ब हर बाबये चन्दायम करदा अस्त। (शेख़ जैनुद्दीन चिरागे देहली शेख़ नसीरुद्दीन महमूदके बहनके बेटे और खादिमे खास थे। शेख (नसीरुद्दीन) उनका ज़िक्र धर्मसभाओं तथा सामान्य बातचीतोंमें प्रायः किया करते थे। चन्दायमके रचयिता मौलाना दाऊद उनके भक्त (मुरीद) थे और उन्होंने चन्दायमके प्रारम्भमें उनकी प्रशंसा की है)।
७
काव्यका नाम दाऊद रचित प्रस्तुत काव्यके नामके सम्बन्धमें माताप्रसाद गुप्तने आगरा संस्कराकी भूमिकामें लिखा है कि—इस रचनाका नाम चन्दायण प्रसिद्ध है, किन्तु रचनाका जितना अंश प्राप्त हुआ है, उसमें यह नाम कहीं नहीं आता है। इस ग्रन्थ में इसका नाम लोरकहा आता है जो लोरकथाका अपभ्रंश है— लोर ( लोर ) कहा मइँ यह खंड गाँऊँ । कथा काब यह लोग सुनावूँ ॥ अतः जबतक अन्यत्र चन्दायण नाम न मिल जाये लोरकहा ही रचनाका वास्त- विक नाम माना जायेगा। हो सकता है कि इसका नाम लोरकहा ही रहा हो किन्तु पीछे यह रचना चन्दायणके नामसे प्रसिद्ध हो गयी हो। (पृ ४५)। माताप्रसाद गुप्तकी यह धारणा केवल कल्पना प्रसूत है। निम्नलिखित तथ्योंपर यदि ध्यान दिया जाय तो यह प्रकट होगा कि उसका कोई महत्त्व नहीं है— (क) दाऊद रचित इस ग्रन्थकी परम्परामें अबतक जितने भी प्रेम-काव्य रचे गये हैं उन सबका नामकरण नायिकाके नामपर हुआ है, नायकके नामपर नहीं। यथा—मिरगावति, पदमावत, इन्द्रावत आदि। इस परम्पराके होते हुए यह सोचना कि दाऊदके ग्रन्थका नामकरण नायकके नामपर लोर-कहा हुआ होगा अपने आपमें भ्रम जनित है। (ख) ग्रन्थका नाम लोर-कहा सिद्ध करनेके लिए माताप्रसाद गुप्तने जो पंक्ति उद्धृत की है वह मनर प्रतिमें प्राप्य है। वहाँ पाठ स्पष्ट रूपसे लोर कहा है लोर-कहा नहीं। ले क दोना जुदेएक अस्तित्वके प्रति किसी प्रकारका सन्देह नहीं किया जा सकता। फिर भी यदि माताप्रसाद गुप्त की ही बात मान ली जाय कि मूल पाठ लोर-कहा है लोर कहा नहीं तो भी उससे किसी प्रकार ग्रन्थका नाम लोर-कहा होना सिद्ध नहीं होता। वस्तुतः पंक्तिमें लोर-कहाका लोर-कथाका रूप भ्रम रूप माननेसे पंक्तिमें व्याकरण दोष उपस्थित होता है और पंक्ति अर्थहीन हो जाती है। पंक्ति की सार्थकता तभी है जब कहाका भाव कथनके रूपमें लिया जाय। (ग) दाऊदने अपने काव्यमें कथा शब्दका प्रयोग अनेक स्थलोंपर किया है जिस कहारकस विचारधीन पंक्ति उद्धृत की गयी है उसमें एक पंक्ति है—कथा कवित्त के लोग सुनावउँ (१६/१४)। अन्यत्र दूसरी पंक्ति है—कथा काउ पत्यक नित्तोज्य नित्य सींची सिहूँ पात (२/१७)। यदि दाऊदका अभिप्राय इस पंक्तिमें भी कथासे होता तो वे कथा ही लिखते; उन्हें अपभ्रंश रूप कहाकी आवश्यता न होती। इस प्रकार माताप्रसाद गुप्तके पास यह कहनेका कोई आधार नहीं है कि ग्रन्थका मूल नाम लोर-कहा था। दाऊदने स्वयं ग्रन्थमें बहु स्थलोंमें ऐसे संकेत प्रस्तुत —नाम लोरिकी और सिरनाम चन्दाके नामसे सम्बोधनसे चन्दायणका स्पष्ट संकेत है । लोरिकी चन्दैनी दोनों नारी पात्रोंके नामका भी सूचक है
ट किये हैं जिससे ज्ञात होता है कि लोरक-चन्दा की कहानी जिसे उन्होंने अपने काव्य में कथानक के रूप में ग्रहण किया है, उनके समय 'चैंरावक' नाम से प्रसिद्ध थी— गाहु गीत चैंरावक नगर अपछ झनकार ७१।७ आजु रात जिसरैं मैं गावा । चैंरावक मन कहुराँ आवा ।७२।५ भूपेन्दर गोबन्द चैंरावक । ९३।३ निश्चय है 'गीते' अनुप्राणित होकर दाऊद ने अपने ग्रन्थ का नाम चन्दायन रखा होगा। यदि यह नाम माताप्रसाद गुप्त को काव्य की किसी पंक्ति में देखने को नहीं मिला तो इसका अर्थ यह नहीं है कि बदायूँनी ने कोई मनगढन्त बात कही थी वरन् तथ्य यह है कि माताप्रसाद गुप्त ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि काव्य की पंक्तियों के बीच ग्रन्थ नाम देने की प्रथा प्रेमाख्यान रचयिताओं के बीच नहीं थी। पद्मावत आदि किसी ग्रन्थ में पाठ के अन्तर्गत ग्रन्थ का नाम नहीं मिलता। अतः दाऊद के काव्य में चन्दायन शब्द का अभाव स्वाभाविक है। उसने कथानक को लेकर लोरकहा नाम की कल्पना हास्यास्पद है। दाऊद के काव्य का चन्दायन नाम होने की बात न केवल बदायूँनी ने किया है वरन् चन्दायन नाम का उल्लेख दो बार शेख अब्दुल हक ने अपने 'अखबार-उल- अखयार में' और रुक्नुद्दीन ने 'लतायफे कुद्दूसिया में' भी किया है। इनके अतिरिक्त जो अन्य प्रमाण आज उपलब्ध हैं उनका उल्लेख अन्यत्र किया ही जा चुका है (पृ २१)। प्रति परिचय पञ्जाब प्रति का परिचय देते समय हमने पाकिस्तान में १४ पृष्ठ होने और उनमें से केवल १ के फोटो प्राप्त होने की बात कही थी। शेष पृष्ठों के अस्तित्व के सम्बन्ध में हमने अपनी अनभिज्ञता प्रकट की थी। काफी ऊहापोह के बाद अब ज्ञात हुआ है कि ये अमूल्य चार पृष्ठ वे हैं जो लन्दन में हुए भारतीय कला प्रदर्शनी में भेजे गये थे। उन पृष्ठों के चित्रों का परिचय 'आर्ट आव इण्डिया एण्ड पाकिस्तान' में दिया गया है।१ उनसे ज्ञात होता है कि एक चित्र चौदा कथित विरह बारहमासा के साकन गायक का है। उसके पीठ पर सूफी का वर्णन होना चाहिये। दूसरा रूपकथा के युद्ध प्रकरण- का और तीसरा चौदा और प्रत्यक्ष प्रसंग का है। चौथे चित्र का स्थान निर्धारण विषयवस्तु की अपूर्णता से नहीं किया जा सकता। प्रदर्शनी के पश्चात् निश्चय ही ये चित्र अन्यत्र से १—बगैर प्रति में यह पंक्ति है—दाऊद कवि जो चौदा गाई (पृ २८ अथवा कंतारस, लोरकहा पृ १६) इससे ज्ञात होता है कि यह कथा चौदा नाम से भी प्रख्यात थी। किन्तु औकास प्रति में यह पंक्ति न होने के कारण इसकी चर्चा हमने ऊपर नहीं की। —मृग अक्षरान अध्ययन पृ ५१ पर उद्धृत है। ३—मृग अक्षरान अध्ययन पृ क २१ उद्धृत है —१ 1
फ़र्क़फ़ान छोटे होंगे। यदि वे लाहौर संग्रहालयमें नहीं हैं तो उन्हें कराची संग्रहालयमें होना चाहिये। चन्दायनकी विभिन्न प्रतियोंके काल निर्धारणके सम्बन्धमें विचार करते हुए इंदौर प्रतिके सम्बन्धमें कुछ नहीं कहा गया। वस्तुतः उस प्रतिके कालका अनुमान इस तथ्यसे हो सकता है कि उसके हाशियेपर कुतबन रचित मिरगावतीकी कुछ पंक्तियाँ हैं। कुतबनके स्वकथनानुसार उसकी रचना संवत् १५६० (सन् १५१६ ई. )में हुई थी। अतः इस प्रतिकी रचना इसके पश्चात् ही किसी समय हुई होगी। कितने समय बाद हुए यह प्रमाणाभावमें कहना कठिन है। अनुमानका यदि सहारा लिया जाय तो उसे १६ वीं शतीके अन्त अथवा सत्रहवीं शतीके आरम्भमें रखा जा सकता है। माताप्रसाद गुप्तने अपने लोरकहाकी भूमिकामें लिखा है कि भोपालके एम० एच. तैमूरीने उन्हें चन्दायनके किसी प्रतिके दो पृष्ठोंके दो फोटो भेजे थे और लिखा था कि यह प्रति प्रारम्भके एक याध पृष्ठको छोड़कर पूरी है। माताप्रसादका यह भी कहना है कि उस प्रतिका जो विवरण उन्हें प्राप्त हुआ था उससे ज्ञात होता है कि उसमें रचनाके कमसे कम १४ छन्द अब भी शेष हैं। इस सम्बन्धमें ज्ञातव्य यह है कि बम्बईवाली प्रति प्रिंस आफ वेल्स म्यूजियमने इन्हीं तैमूरीके माध्यमसे प्राप्त की है। सम्भवतः उन्होंने माता प्रसाद गुप्तको इसी प्रतिके पृष्ठोंके फोटो और विवरण भेजे थे। उस प्रतिमें केवल ६८ कड़बक (६४ चन्दायनके और ४ मैना-सतके) हैं। अतः १४ कन्द (कड़बक) होनेकी कल्पना निराधार है। रहस्यवादी प्रवृत्तिका अभाव चन्दायनमें सूफी तत्त्वोंके अभावकी ओर संकेत करते हुए मैंने यह मत व्यक्त किया है कि दाऊदके सम्मुख काव्य रचनाके समय कोई सूफी दृष्टान्त नहीं था और प्रचलित कथाको काव्य रूपमें उपस्थित करना ही अभीष्ट था (पृ. ६२)। सैयद हसन असकरीने भी लोर प्रतिपर विचार करते हुए कुछ इसी प्रकारका मत इन शब्दोंम व्यक्त किया है—जायसीसे भिन्न मौलानाने अपनेको केवल लोक प्रचलित विश्वासों तथा हिन्दुओंके धर्माख्यानोंतक ही सीमित रखा है।१ विश्वनाथ प्रसादने भी हमारे : विचारोंका समर्थन किया है। उनका कहना है—सूफी काव्य-परम्परामें इस पुस्तकका इतना महत्त्व होनेपर भी इसके जो अंश अभीतक प्राप्त हुए हैं उनमें रहस्यवादका कोई रंग गोचर नहीं मिलते। यों स्थान स्थानपर 'प्रेमकी पीर'का तो चर्चा आया है परन्तु उनमें कहीं वैसी आभास नहीं मिलता जिसमें इश्क हक़ीक़ीका आधार पाकर मज़ाज़ीकी उड़ान भरी गयी हो। किन्तु इस कथनके साथ ही उन्होंने यह भी कहा १—करेंट स्टडीज पटना का०सं० २ वर्ष ३ पृ. १ २—मध्यकालीन प्रेमाख्यान पृ.
८ है कि—सम्भव है चाँदाको पार्थिव पक्षका प्रतीक माना गया हो, जैसा कि निम्न लिखित पंक्तियोंसे प्रकट होता है— बिन करिया मोरी डोले नावा । मींड सुझार कन्त न आवा ॥ ✕ ✕ ✕ ज्या हो बीर जो वा सोइ परम । सरब बीव को करत संबारस ॥ मानवीय आसक्तिकी असारता और ईश्वरीय प्रेमकी सारवत्ताका जो आभास कथानकसे छिट-फुट पाया जाता है उसीके कारण सम्भवतः उस समयके सूफी साधक उससे प्रभावित होते थे । उसके बिरह वचनोंमें और प्रेमकी अभिव्यक्तिये परोक्ष सत्ताके प्रति अनुराग और तड़पकी झलक मिल जाती है ।¹ इन पंक्तियों द्वारा विश्वनाथ प्रसादने काव्यमें रहस्यवादकी प्रवृत्तिकी सम्भावना प्रकट की है । इसके विपरीत माताप्रसाद गुप्तका कथन है कि—अपनी रचनाके अर्थ विचारपर बल देते हुए कविका यह कहना विरहसँ सानि जो चाँदारानी स्पष्ट रूपसे कथाके रहस्यपरक होनेका निषेध करता है । किन्तु यदि ध्यानपूर्वक सम्पूर्ण काव्यको देखा जाय तो उसमें किसी भी पंक्तिमें मानवीय आसक्तिकी असारता और ईश्वरीय प्रेमकी सारवत्ताका आभास नहीं मिलता । विश्वनाथ प्रसादने जिन पंक्तियोंकी ओर संकेत किया है वे पंक्तियाँ यदि मेरी आँखोंने मुझे धोखा नहीं दिया है तो बम्बई प्रतिमें (जिसका उन्होंने सम्पादन किया है) अथवा किसी अन्य प्रतिमें कहीं नहीं हैं । इस कारण प्रस्तुत सन्दर्भमें इन पंक्तियोंका उद्धरण कोई अर्थ नहीं रखता । माताप्रसाद गुप्तने जिस पंक्तिसे चन्दायणके स्पष्ट रूपसे रहस्यपरक होनेका निष्कर्ष निकाला है उसका वे ठीकसे वाचन करनेमें असमर्थ रहे हैं । उसे वे पुनः पढ़नेका कष्ट करें । उसका उचित पाठ है— हरहाँ सात सौ चाँदा रानी । नाग बसी हुत सो मइँ बखानी ॥३१।३ अर्थात् जो चाँदा रानी हर १ जा रही थी वह जिस प्रकार नागसे डँसी गयी उसका मैंने बयान किया । लोकप्रियता विश्वनाथ प्रसादने आगरा संस्करणकी प्रस्तावनामें एक नवीन और महत्त्वपूर्ण सूचना प्रस्तुत की है कि सन् १६१९ ई में रूपमंजरी नामक एक प्रेमाख्यानकी रचना हुई थी जो अभी अप्रकाशित है । उससे उन्होंने निम्नलिखित उद्धरण दिया है— लोरक चन्दा मैना प्रीतिइ को सिरै । राजकुँवर मिरगाबति लिखि लिखि ले धरै । —वही पृ ११ —मं० गु० चन्द गोरखवा भूमिका पृ १ ।
७ इससे भी प्रकट होता है कि सत्रहवीं शतीके आरम्भमें चन्दायनी कथा लोक प्रिय थी। वैयक्तिक स्पष्टीकरण ग्रन्थमें सर्वत्र मैंने विद्वानोंका उल्लेख सीधे-सीधे नाम लेकर किया है अर्थात् उनके नामके आगे पीछे श्री, डाक्टर आदि सींग पूंछोंका प्रयोग नहीं किया है। मेरा यह भाव पाश्चात्यानुकरण है। वहाँ ग्रन्थोंमें विद्वानोंके विचार आदिका उल्लेख करते समय बिना किसी औपचारिकताके केवल नाम लिया जाता है। हम भी तुलसी, सूरदास आदि मनीषियोंके नामके साथ यही करते आ रहे हैं। उसी परम्परामें मेरा यह व्यवहार भी है। पाठक इसे मेरी धृष्टता और अविनयन समझनेकी भूल न कर बैठें, इसलिए इस स्पष्टीकरणकी आवश्यकता हुई। परमेश्वरीलाल गुप्त पटना संग्रहालय पटना-१। विजयादशमी, सन् १९६३ ई
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