चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंफ़र्क़फ़ान छोटे होंगे। यदि वे लाहौर संग्रहालयमें नहीं हैं तो उन्हें कराची संग्रहालयमें होना चाहिये। चन्दायनकी विभिन्न प्रतियोंके काल निर्धारणके सम्बन्धमें विचार करते हुए इंदौर प्रतिके सम्बन्धमें कुछ नहीं कहा गया। वस्तुतः उस प्रतिके कालका अनुमान इस तथ्यसे हो सकता है कि उसके हाशियेपर कुतबन रचित मिरगावतीकी कुछ पंक्तियाँ हैं। कुतबनके स्वकथनानुसार उसकी रचना संवत् १५६० (सन् १५१६ ई. )में हुई थी। अतः इस प्रतिकी रचना इसके पश्चात् ही किसी समय हुई होगी। कितने समय बाद हुए यह प्रमाणाभावमें कहना कठिन है। अनुमानका यदि सहारा लिया जाय तो उसे १६ वीं शतीके अन्त अथवा सत्रहवीं शतीके आरम्भमें रखा जा सकता है। माताप्रसाद गुप्तने अपने लोरकहाकी भूमिकामें लिखा है कि भोपालके एम० एच. तैमूरीने उन्हें चन्दायनके किसी प्रतिके दो पृष्ठोंके दो फोटो भेजे थे और लिखा था कि यह प्रति प्रारम्भके एक याध पृष्ठको छोड़कर पूरी है। माताप्रसादका यह भी कहना है कि उस प्रतिका जो विवरण उन्हें प्राप्त हुआ था उससे ज्ञात होता है कि उसमें रचनाके कमसे कम १४ छन्द अब भी शेष हैं। इस सम्बन्धमें ज्ञातव्य यह है कि बम्बईवाली प्रति प्रिंस आफ वेल्स म्यूजियमने इन्हीं तैमूरीके माध्यमसे प्राप्त की है। सम्भवतः उन्होंने माता प्रसाद गुप्तको इसी प्रतिके पृष्ठोंके फोटो और विवरण भेजे थे। उस प्रतिमें केवल ६८ कड़बक (६४ चन्दायनके और ४ मैना-सतके) हैं। अतः १४ कन्द (कड़बक) होनेकी कल्पना निराधार है। रहस्यवादी प्रवृत्तिका अभाव चन्दायनमें सूफी तत्त्वोंके अभावकी ओर संकेत करते हुए मैंने यह मत व्यक्त किया है कि दाऊदके सम्मुख काव्य रचनाके समय कोई सूफी दृष्टान्त नहीं था और प्रचलित कथाको काव्य रूपमें उपस्थित करना ही अभीष्ट था (पृ. ६२)। सैयद हसन असकरीने भी लोर प्रतिपर विचार करते हुए कुछ इसी प्रकारका मत इन शब्दोंम व्यक्त किया है—जायसीसे भिन्न मौलानाने अपनेको केवल लोक प्रचलित विश्वासों तथा हिन्दुओंके धर्माख्यानोंतक ही सीमित रखा है।१ विश्वनाथ प्रसादने भी हमारे : विचारोंका समर्थन किया है। उनका कहना है—सूफी काव्य-परम्परामें इस पुस्तकका इतना महत्त्व होनेपर भी इसके जो अंश अभीतक प्राप्त हुए हैं उनमें रहस्यवादका कोई रंग गोचर नहीं मिलते। यों स्थान स्थानपर 'प्रेमकी पीर'का तो चर्चा आया है परन्तु उनमें कहीं वैसी आभास नहीं मिलता जिसमें इश्क हक़ीक़ीका आधार पाकर मज़ाज़ीकी उड़ान भरी गयी हो। किन्तु इस कथनके साथ ही उन्होंने यह भी कहा १—करेंट स्टडीज पटना का०सं० २ वर्ष ३ पृ. १ २—मध्यकालीन प्रेमाख्यान पृ.