भारतकोश
चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

पृष्ठ 515, कुल 520 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 515

ट किये हैं जिससे ज्ञात होता है कि लोरक-चन्दा की कहानी जिसे उन्होंने अपने काव्य में कथानक के रूप में ग्रहण किया है, उनके समय 'चैंरावक' नाम से प्रसिद्ध थी— गाहु गीत चैंरावक नगर अपछ झनकार ७१।७ आजु रात जिसरैं मैं गावा । चैंरावक मन कहुराँ आवा ।७२।५ भूपेन्दर गोबन्द चैंरावक । ९३।३ निश्चय है 'गीते' अनुप्राणित होकर दाऊद ने अपने ग्रन्थ का नाम चन्दायन रखा होगा। यदि यह नाम माताप्रसाद गुप्त को काव्य की किसी पंक्ति में देखने को नहीं मिला तो इसका अर्थ यह नहीं है कि बदायूँनी ने कोई मनगढन्त बात कही थी वरन् तथ्य यह है कि माताप्रसाद गुप्त ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि काव्य की पंक्तियों के बीच ग्रन्थ नाम देने की प्रथा प्रेमाख्यान रचयिताओं के बीच नहीं थी। पद्मावत आदि किसी ग्रन्थ में पाठ के अन्तर्गत ग्रन्थ का नाम नहीं मिलता। अतः दाऊद के काव्य में चन्दायन शब्द का अभाव स्वाभाविक है। उसने कथानक को लेकर लोरकहा नाम की कल्पना हास्यास्पद है। दाऊद के काव्य का चन्दायन नाम होने की बात न केवल बदायूँनी ने किया है वरन् चन्दायन नाम का उल्लेख दो बार शेख अब्दुल हक ने अपने 'अखबार-उल- अखयार में' और रुक्नुद्दीन ने 'लतायफे कुद्दूसिया में' भी किया है। इनके अतिरिक्त जो अन्य प्रमाण आज उपलब्ध हैं उनका उल्लेख अन्यत्र किया ही जा चुका है (पृ २१)। प्रति परिचय पञ्जाब प्रति का परिचय देते समय हमने पाकिस्तान में १४ पृष्ठ होने और उनमें से केवल १ के फोटो प्राप्त होने की बात कही थी। शेष पृष्ठों के अस्तित्व के सम्बन्ध में हमने अपनी अनभिज्ञता प्रकट की थी। काफी ऊहापोह के बाद अब ज्ञात हुआ है कि ये अमूल्य चार पृष्ठ वे हैं जो लन्दन में हुए भारतीय कला प्रदर्शनी में भेजे गये थे। उन पृष्ठों के चित्रों का परिचय 'आर्ट आव इण्डिया एण्ड पाकिस्तान' में दिया गया है।१ उनसे ज्ञात होता है कि एक चित्र चौदा कथित विरह बारहमासा के साकन गायक का है। उसके पीठ पर सूफी का वर्णन होना चाहिये। दूसरा रूपकथा के युद्ध प्रकरण- का और तीसरा चौदा और प्रत्यक्ष प्रसंग का है। चौथे चित्र का स्थान निर्धारण विषयवस्तु की अपूर्णता से नहीं किया जा सकता। प्रदर्शनी के पश्चात् निश्चय ही ये चित्र अन्यत्र से १—बगैर प्रति में यह पंक्ति है—दाऊद कवि जो चौदा गाई (पृ २८ अथवा कंतारस, लोरकहा पृ १६) इससे ज्ञात होता है कि यह कथा चौदा नाम से भी प्रख्यात थी। किन्तु औकास प्रति में यह पंक्ति न होने के कारण इसकी चर्चा हमने ऊपर नहीं की। —मृग अक्षरान अध्ययन पृ ५१ पर उद्धृत है। ३—मृग अक्षरान अध्ययन पृ क २१ उद्धृत है —१ 1