भारतकोश
चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

DevanagariAwadhipublished520 पृष्ठ

पृष्ठ 514, कुल 520 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 514

काव्यका नाम दाऊद रचित प्रस्तुत काव्यके नामके सम्बन्धमें माताप्रसाद गुप्तने आगरा संस्कराकी भूमिकामें लिखा है कि—इस रचनाका नाम चन्दायण प्रसिद्ध है, किन्तु रचनाका जितना अंश प्राप्त हुआ है, उसमें यह नाम कहीं नहीं आता है। इस ग्रन्थ में इसका नाम लोरकहा आता है जो लोरकथाका अपभ्रंश है— लोर ( लोर ) कहा मइँ यह खंड गाँऊँ । कथा काब यह लोग सुनावूँ ॥ अतः जबतक अन्यत्र चन्दायण नाम न मिल जाये लोरकहा ही रचनाका वास्त- विक नाम माना जायेगा। हो सकता है कि इसका नाम लोरकहा ही रहा हो किन्तु पीछे यह रचना चन्दायणके नामसे प्रसिद्ध हो गयी हो। (पृ ४५)। माताप्रसाद गुप्तकी यह धारणा केवल कल्पना प्रसूत है। निम्नलिखित तथ्योंपर यदि ध्यान दिया जाय तो यह प्रकट होगा कि उसका कोई महत्त्व नहीं है— (क) दाऊद रचित इस ग्रन्थकी परम्परामें अबतक जितने भी प्रेम-काव्य रचे गये हैं उन सबका नामकरण नायिकाके नामपर हुआ है, नायकके नामपर नहीं। यथा—मिरगावति, पदमावत, इन्द्रावत आदि। इस परम्पराके होते हुए यह सोचना कि दाऊदके ग्रन्थका नामकरण नायकके नामपर लोर-कहा हुआ होगा अपने आपमें भ्रम जनित है। (ख) ग्रन्थका नाम लोर-कहा सिद्ध करनेके लिए माताप्रसाद गुप्तने जो पंक्ति उद्धृत की है वह मनर प्रतिमें प्राप्य है। वहाँ पाठ स्पष्ट रूपसे लोर कहा है लोर-कहा नहीं। ले क दोना जुदेएक अस्तित्वके प्रति किसी प्रकारका सन्देह नहीं किया जा सकता। फिर भी यदि माताप्रसाद गुप्त की ही बात मान ली जाय कि मूल पाठ लोर-कहा है लोर कहा नहीं तो भी उससे किसी प्रकार ग्रन्थका नाम लोर-कहा होना सिद्ध नहीं होता। वस्तुतः पंक्तिमें लोर-कहाका लोर-कथाका रूप भ्रम रूप माननेसे पंक्तिमें व्याकरण दोष उपस्थित होता है और पंक्ति अर्थहीन हो जाती है। पंक्ति की सार्थकता तभी है जब कहाका भाव कथनके रूपमें लिया जाय। (ग) दाऊदने अपने काव्यमें कथा शब्दका प्रयोग अनेक स्थलोंपर किया है जिस कहारकस विचारधीन पंक्ति उद्धृत की गयी है उसमें एक पंक्ति है—कथा कवित्त के लोग सुनावउँ (१६/१४)। अन्यत्र दूसरी पंक्ति है—कथा काउ पत्यक नित्तोज्य नित्य सींची सिहूँ पात (२/१७)। यदि दाऊदका अभिप्राय इस पंक्तिमें भी कथासे होता तो वे कथा ही लिखते; उन्हें अपभ्रंश रूप कहाकी आवश्यता न होती। इस प्रकार माताप्रसाद गुप्तके पास यह कहनेका कोई आधार नहीं है कि ग्रन्थका मूल नाम लोर-कहा था। दाऊदने स्वयं ग्रन्थमें बहु स्थलोंमें ऐसे संकेत प्रस्तुत —नाम लोरिकी और सिरनाम चन्दाके नामसे सम्बोधनसे चन्दायणका स्पष्ट संकेत है । लोरिकी चन्दैनी दोनों नारी पात्रोंके नामका भी सूचक है