चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंच दै सराब राजाकर सीस कंठ अंकवारि । दिये सिराव राजारर सुकवि कण्ठ (पृ ४१) अंकवारि ॥ ८६।१ दई पीत जिउ बर संचारा । (पृ ४३) दई विपति बिजभर संचारा ॥ १८२।१ बेहु मूंछि ल्यों को जहा हौं कसगा देदहि मूछि हूं को जहा हौं कसगम बिसडार । (पृ ४३) बिसैभार ॥ १८२।६ उपजा देस मुंद्रिका भक्ती । (पृ ४४) उपजा बैस मंदिर गा भरी ॥ १४१।२ वीरा जिमहि बिसारि । (पृ ४५) बीरा भीम पसारि ॥ १२१।७ पत्थन्ह केहि तर यह गिय पासा । पतरिहैं कई सुरे बन पासा ॥ १५ ॥१ (पृ ४७) (खण्ड २) चन्दर अकल करा जनु पाए । वँवर किकार करा जनुकराई ॥ (पृ १९) जेहि मग बैठे अत्तिव सुहाए । चमक बतीसी असइ सुहाई ॥ १४६।२ ताती राति विछवाई इनि कहा रानी रात बिछौरी इनि यत्न विअल दुख व्याधि । भैरैसि बाउ सकोबी तब जिचहि कटारि कल्प सर पाव सकोवे ठिरिखि कटार सुइर्शन ॥ (पृ १२) सुहाइ ॥ १४५।८ मेरु हुटि कइ स्वाइ जलावा । (पृ १६) मेकि बरह कै स्वापु करावा ॥ २९१।७ कार अङ्क महिहै बासी । (पृ १७) कार अंग पहिर कै बाले ॥ २९४।१ सुनु सखि माहिं मधुमकर कर बाता । कहीं सखी माह माँस के बाता । अइसइ रंग सरहि चवि राता (पृ ४७) अससि राँग सगै छवि राता ॥ ४।२ इस पाठ वैषम्यको देखकर कदाचित् किसीके लिए भी यह स्वीकार करना सम्भव न होगा कि ये संस्करण किसी एक ही प्रति अथवा प्रति परम्पराके पाठ प्रस्तुत करते हैं और उनम किसी प्रकारका पाठ-सम्बन्ध है अथवा हो सकता है । इस तथ्यके प्रकाशमें विचारणीय हो जाता है कि क्या इस ढंगके ग्रन्थोंके कैथी और नागरी प्रतियोंके साथ उनकी फारसी प्रतियोंकी किसी प्रकारके प्रति-परम्परा अथवा पाठ सम्बन्ध होनेका आग्रह किया जा सकता है ? जो भी हो आगरा संस्करणके प्रकाशनने फारसी लिपिमें मुद्रित हिन्दी ग्रन्थोंकी दुर्बोध्यता सिद्ध कर मेरा बहुत बड़ा भार हलका कर दिया । उसके प्रकाशनके अनन्तर पाठक प्रस्तुत संस्करणको देखेंगे तो वे मेरी कठिनाइयोंको पहलेकी अपेक्षा अधिक सहानुभूति के साथ समझ और सराह सकेंगे । शब्द-शोध मेरा पाठ सर्वथा निर्दोष है ऐसा मेरा दावा नहीं है । मुझे स्वयं अपने पाठोंके