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चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)

Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary

मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा

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छ नये तथ्यों, नयी जानकारीके आधारपर संशोधन-परिशोधन होना अनिवार्य है और यह कार्य निरन्तर चलते रहनेवाला है। नयी टिप्पणियाँ चन्दायनमें प्रयुक्त शब्दों पर जैसी व्याख्या और टिप्पणी दी जानी चाहिये थी वह नहीं दी जा सकी। अपनी इस असमर्थताके सम्बन्धमें अन्यत्र निवेदन कर चुका हूँ। इस अवधिमें कुछ बात मेरे ध्यानमें आयीं हैं, उनका उल्लेख यहाँ कर देना उचित होगा। मलिक बयाँ (१७।५) — ऐतिहासिक ग्रन्थोंसे मलिक बयाँके सम्बन्धमें कुछ भी ज्ञात नहीं होता किन्तु विपुलगिरि (राजगृह) स्थित एक मन्दिरसे प्राप्त एक संस्कृत अभिलेखसे ज्ञात हुआ है कि उनका पूरा नाम मलिक इब्राहीम बया था और उनके पिता का नाम अबू बक्र था। वे फीरोज तुगलकके शासन कालमें बिहार के मुक्ती (शासक) थे। उन्हें सैफ-उद्-दौलत की उपाधि प्राप्त थी। (जर्नल आफ बिहार रिसर्च सोसाइटी १९१९ पृ ३३१-३४१)। इनकी समाधि बिहार शरीफ (पटना) में पीर पहाड़ीपर बनी हुई है। वहाँके प्राप्त एक फारसी अभिलेखसे ज्ञात होता है कि उनकी मृत्यु १३ ज़िल्हिज्ज ७५३ हिजरी (२ जनवरी १३५३ ई ) को हुई थी। (एपीग्राफ़िया इण्डिका अरबिक एण्ड पर्शियन सप्लीमेण्ट, १९५५-५६ पृ ६-७)। गाबर (१८४।१) —यह शब्द गोवरका प्राकृत रूप जान पड़ता है (गोवर > गोअर > गोबर)। पाइअ-सद्दमहण्णवो नाममाला नामक ग्रन्थके अनुसार गोअर विषयका पर्यायवाची था अथवा गोवर किसी विषयका नाम था। इससे गाबर नामक नगरके होनेका समर्थन होता है। इसके सम्बन्धमें लोगोंकी जो धारणाएँ हैं उन्हें यथास्थान देकर मैंने काव्यमें प्रस्तुत भौगोलिक सूत्रोंकी ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा था कि वह गया नदीसे बहुत दूर न होगा और उसके निकट स्थित देवहा नदीकी पहचान होनेपर इस स्थानकी स्थिति अधिक प्रामाणिकताके साथ निश्चित की जा सकेगी (पृ ८६)। अब ज्ञात हुआ है कि देवहा नामकी एक नदी वस्तुतः है और वह बड़ोदके निकट गंगामें मिलती है (२ १६५)। अतः गाबरका बनारसके निकट ही कहीं होना चाहिए। चन्दायनके भोजपुरी लोककथा रूपमें गोवरका अनेक स्थलोंपर बनारसका स्थान कहा गया है। इससे भी गाबरके बड़ोदके निकट होनेका समर्थन होता है। इस प्रसंगमें हमारा ध्यान अज्ञात इस कथनकी ओर भी जाना चाहिए क बाट गएउ हरही दूसर गई महाव (२ ३)। इसके अनुसार गाउरसे एक मार्ग हरही और दूसरा गूँडेश्वरी पर जाता था। बनारस और महावरका पारस्परिक सम्बन्ध मध्यकालमें बहुत रहा है। घागर (३६।३ —दमक हल अंगवद (२ ) निसर रगडो एक जुही दछपा