चन्दायन (मुल्ला दाऊद - प्राचीनतम अवधी सूफी-प्रेमाख्यान सटीक)
Chandayan of Mulla Daud with Hindi Commentary
मुल्ला दाऊद (१३७९ ई.) / डॉ. परमेश्वरीलाल गुप्त द्वारा
८ है कि—सम्भव है चाँदाको पार्थिव पक्षका प्रतीक माना गया हो, जैसा कि निम्न लिखित पंक्तियोंसे प्रकट होता है— बिन करिया मोरी डोले नावा । मींड सुझार कन्त न आवा ॥ ✕ ✕ ✕ ज्या हो बीर जो वा सोइ परम । सरब बीव को करत संबारस ॥ मानवीय आसक्तिकी असारता और ईश्वरीय प्रेमकी सारवत्ताका जो आभास कथानकसे छिट-फुट पाया जाता है उसीके कारण सम्भवतः उस समयके सूफी साधक उससे प्रभावित होते थे । उसके बिरह वचनोंमें और प्रेमकी अभिव्यक्तिये परोक्ष सत्ताके प्रति अनुराग और तड़पकी झलक मिल जाती है ।¹ इन पंक्तियों द्वारा विश्वनाथ प्रसादने काव्यमें रहस्यवादकी प्रवृत्तिकी सम्भावना प्रकट की है । इसके विपरीत माताप्रसाद गुप्तका कथन है कि—अपनी रचनाके अर्थ विचारपर बल देते हुए कविका यह कहना विरहसँ सानि जो चाँदारानी स्पष्ट रूपसे कथाके रहस्यपरक होनेका निषेध करता है । किन्तु यदि ध्यानपूर्वक सम्पूर्ण काव्यको देखा जाय तो उसमें किसी भी पंक्तिमें मानवीय आसक्तिकी असारता और ईश्वरीय प्रेमकी सारवत्ताका आभास नहीं मिलता । विश्वनाथ प्रसादने जिन पंक्तियोंकी ओर संकेत किया है वे पंक्तियाँ यदि मेरी आँखोंने मुझे धोखा नहीं दिया है तो बम्बई प्रतिमें (जिसका उन्होंने सम्पादन किया है) अथवा किसी अन्य प्रतिमें कहीं नहीं हैं । इस कारण प्रस्तुत सन्दर्भमें इन पंक्तियोंका उद्धरण कोई अर्थ नहीं रखता । माताप्रसाद गुप्तने जिस पंक्तिसे चन्दायणके स्पष्ट रूपसे रहस्यपरक होनेका निष्कर्ष निकाला है उसका वे ठीकसे वाचन करनेमें असमर्थ रहे हैं । उसे वे पुनः पढ़नेका कष्ट करें । उसका उचित पाठ है— हरहाँ सात सौ चाँदा रानी । नाग बसी हुत सो मइँ बखानी ॥३१।३ अर्थात् जो चाँदा रानी हर १ जा रही थी वह जिस प्रकार नागसे डँसी गयी उसका मैंने बयान किया । लोकप्रियता विश्वनाथ प्रसादने आगरा संस्करणकी प्रस्तावनामें एक नवीन और महत्त्वपूर्ण सूचना प्रस्तुत की है कि सन् १६१९ ई में रूपमंजरी नामक एक प्रेमाख्यानकी रचना हुई थी जो अभी अप्रकाशित है । उससे उन्होंने निम्नलिखित उद्धरण दिया है— लोरक चन्दा मैना प्रीतिइ को सिरै । राजकुँवर मिरगाबति लिखि लिखि ले धरै । —वही पृ ११ —मं० गु० चन्द गोरखवा भूमिका पृ १ ।
७ इससे भी प्रकट होता है कि सत्रहवीं शतीके आरम्भमें चन्दायनी कथा लोक प्रिय थी। वैयक्तिक स्पष्टीकरण ग्रन्थमें सर्वत्र मैंने विद्वानोंका उल्लेख सीधे-सीधे नाम लेकर किया है अर्थात् उनके नामके आगे पीछे श्री, डाक्टर आदि सींग पूंछोंका प्रयोग नहीं किया है। मेरा यह भाव पाश्चात्यानुकरण है। वहाँ ग्रन्थोंमें विद्वानोंके विचार आदिका उल्लेख करते समय बिना किसी औपचारिकताके केवल नाम लिया जाता है। हम भी तुलसी, सूरदास आदि मनीषियोंके नामके साथ यही करते आ रहे हैं। उसी परम्परामें मेरा यह व्यवहार भी है। पाठक इसे मेरी धृष्टता और अविनयन समझनेकी भूल न कर बैठें, इसलिए इस स्पष्टीकरणकी आवश्यकता हुई। परमेश्वरीलाल गुप्त पटना संग्रहालय पटना-१। विजयादशमी, सन् १९६३ ई
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