भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 109
खण्ड ७ ]शाङ्करभाष्यार्थ१०५

| अथानेनैव चाक्षुषेणैव ये चैतस्मादर्वाञ्चो लोकास्तांश्चाप्नोति मनुष्यकामांश्च चाक्षुषो भूत्वेत्यर्थः । तस्मादु हैवंविदुद्गाता ब्रूयाद्यजमानं कमिष्ठं ते तव काममागायानीति । एष हि यस्मादुद्गाता कामागानस्योद्गानेन कामं संपादयितुमीष्टे समर्थ इत्यर्थः । कोऽसौ ? य एवं विद्वान्साम गायति साम गायति । द्विरुक्तिरुपासनसमाप्त्यर्था ॥ ८-९ ॥ | तथा इस चाक्षुष पुरुषके द्वारा ही, जो इससे नीचेके लोक हैं उन्हें मनुष्यसम्बन्धी भोगोंको वह प्राप्त करता है। अभिप्राय यह कि चाक्षुष पुरुष होकर ही उन सबको प्राप्त करता है। अतः इस प्रकार जाननेवाला उद्गाता यजमानसे कहे कि 'मैं तेरे लिये किन इष्ट कामनाओंका आगान करूँ ?' क्योंकि यह उद्गाता इष्टकामनासम्बन्धी आगानके उद्गानसे उन कामनाओंको सम्पन्न करनेमें समर्थ होता है। वह उद्गाता कौन है ! जो इस प्रकार जाननेवाला होकर साम गान करता है, साम गान करता है। यह द्विरुक्ति उपासनाकी समाप्तिके लिये है ॥८-९॥ |


इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये
सप्तमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ ७ ॥