छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 110, कुल 978 में से
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अष्टम खण्ड
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उद्गीथोपासनाकी उत्कृष्टता प्रदर्शित करनेके लिये शिलक, दाल्भ्य और प्रवाहणका संवाद
| अनेकधोपास्यत्वादक्षरस्य प्रकारान्तरेण परोवरीयस्त्वगुणफलमुपासनान्तरमानिनाय । इतिहासस्तु सुखावबोधनार्थः । | उद्गीथसंज्ञक अक्षर (ओंकार) के अनेक प्रकारसे उपासनीय होनेके कारण श्रुति प्रकारान्तरसे उसकी उत्तरोत्तर उत्कृष्ट गुणविशिष्ट फलवाली एक अन्य उपासना प्रस्तुत करती है। यहाँ जो इतिहास दिया जाता है वह सरलतासे समझानेके लिये है। |
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त्रयो होद्गीथे कुशला बभूवुः शिलकः शालावत्यश्चैकितायनो दाल्भ्यः प्रवाहणो जैवलिरिति ते होचुरुद्गीथे वै कुशलाः स्मो हन्तोद्गीथे कथां वदाम इति ॥ १ ॥
कहते हैं, शालावान्का पुत्र शिलक, चिकितायनका पुत्र दाल्भ्य और जीवल्का पुत्र प्रवाहण—ये तीनों उद्गीथविद्यामें कुशल थे। उन्होंने परस्पर कहा—'हमलोग उद्गीथविद्यामें निपुण हैं; अतः यदि आपलोगोंकी अनुमति हो तो उद्गीथके विषयमें परस्पर वार्तालाप करें' ॥ १ ॥
| त्रयस्त्रिसंख्याकाः, ह इत्यैतिह्यार्थः, उद्गीथ उद्गीथज्ञानं प्रति कुशला निपुणा बभूवुः । | त्रयः—तीन संख्यावाले, ‘ह’ यह निपात इतिहासको सूचित करनेके लिये है, उद्गीथमें—उद्गीथविद्यामें कुशल—निपुण थे। तात्पर्य यह |
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