छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 111, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 111
खण्ड ८] शाङ्करभाष्यार्थ १०७
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| कस्मिंश्चिद्देशे काले च निमित्ते वा समेतानामित्यभिप्रायः । न हि सर्वस्मिञ्जगति त्रयाणामेव कौशलमुद्गीथादिविज्ञाने । श्रूयन्ते ह्युषस्तिजानश्रुतिकैकेयप्रभृतयः सर्वज्ञकल्पाः ।<br><br>के ते त्रयः ? इत्याह—<br>शिलको नामतः शालावतोऽपत्यं शालावत्यः चिकितायनस्यापत्यं चैकितायनः, दल्भगोत्रो दाल्भ्यो द्व्यामुष्यायणो वा । प्रवाहणो नामतो जीवलस्यापत्यं जैवलिरित्येते त्रयः ।<br><br>ते होचुरन्योन्यमुद्गीथे वै कुशला निपुणा इति प्रसिद्धाः स्मः । अतो हन्त यद्यनुमतिर्भवतामुद्गीथ उद्गीथज्ञाननिमित्तां कथां विचारणां पक्षप्रतिपक्षोपन्यासेन वदामो वादं कुर्म इत्यर्थः । | है कि किसी देश और कालमें अथवा किसी निमित्तविशेषसे एकत्रित हुए पुरुषोंमें [ये तीन व्यक्ति उद्गीथमें निपुण थे]। सारे संसारके भीतर उद्गीथ आदिके ज्ञानमें इन तीनकी ही कुशलता हो—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि श्रुतिमें उषस्ति, जानश्रुति और कैकेय आदि सर्वज्ञकल्प पुरुष भी प्रसिद्ध हैं ही ।<br><br>वे तीन कौन थे ? इस विषयमें श्रुति कहती है—शिलक जिसका नाम था वह शालावान्का पुत्र शालावत्य, चिकितायनका पुत्र चैकितायन, जो दल्भगोत्रमें उत्पन्न होनेके कारण दाल्भ्य कहा गया है। अथवा वह द्व्यामुष्यायण *होगा । तथा नामसे प्रवाहण और जीवलका पुत्र होनेसे जैवलि कहलानेवाले ये तीन पुरुष थे ।<br><br>उन्होंने परस्पर एक-दूसरेसे कहा—हमलोग उद्गीथमें कुशल-निपुण हैं—इस प्रकार प्रसिद्ध हैं । अतः यदि आपलोगोंकी सम्मति हो तो उद्गीथमें—उद्गीथविद्याके सम्बन्धमें कथा—विचार कहें, अर्थात् पक्ष-प्रतिपक्षके स्थापनपूर्वक परस्पर विवाद करें । |
* जिस पुत्रको 'यह मुझे और तुझे दोनोंहीको जल और पिण्डदान देनेका अधिकारी होगा' ऐसा कहकर धर्मपूर्वक ग्रहण किया जाता है उसे 'द्व्यामुष्यायण' कहते हैं ।