भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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( ७ )

इसीसे नारदजी कहते हैं—

सो हं भगवो मन्त्रविदेवास्मि नात्मविच्छ्रुतँ ह्येव मे भगवद्दृशेभ्य-
स्तरति शोकमात्मविदिति सो हं भगवः शोचामि तं मा भगवाञ्छोकस्य
पारं तारयतु । ( ७।१।३ )

‘भगवन् ! मैं केवल शास्त्रज्ञ हूँ, आत्मज्ञ नहीं हूँ। मैंने आप-जैसों-से सुना है कि आत्मवेत्ता शोकको पार कर लेता है और मुझे शोक है, इसलिये भगवान् मुझे शोकसे पार करें।’ इससे यह निश्चय होता है कि केवल शास्त्रज्ञानसे संसृतिचक्ररूप शोकसमुद्रको पार नहीं किया जा सकता; इसके लिये तो अनुभवकी आवश्यकता है। जब सर्वतन्त्रस्वतन्त्र, अशेषविद्यामहार्णव देवर्षि नारदको भी उनकी विद्या शान्ति प्रदान नहीं कर सकी तो हम-जैसे साधारण जीवोंकी तो बात ही क्या है ?

इस प्रकार हम देखते हैं कि इस उपनिषद्में बहुत-से उपयोगी विषय हैं। प्राचीन कालसे ही इसका बहुत मान रहा है। वेदान्त-सूत्रोंमें जिन श्रुतियोंपर विचार किया गया है उनमें सबसे अधिक इसी उपनिषद्की हैं। इसका ज्ञानकाण्ड तो जिज्ञासुओंकी अक्षय निधि है। जो ‘तत्त्वमसि’ महावाक्य अद्वैतसम्प्रदायमें ब्रह्मात्मैक्य-बोधका प्रधान साधन माना जाता है वह भी इसीके छठे अध्यायमें आया है। वहाँ आरुणिने भिन्न-भिन्न दृष्टान्त देकर नौ बार इसी वाक्यसे अपने पुत्र श्वेतकेतुको आत्मतत्त्वका उपदेश किया है।

औपनिषद-दर्शन ही सम्यग्दर्शन है। इसीसे भवभयका निरास होकर आत्यन्तिक आनन्दकी प्राप्ति होती है। इस दृष्टिको प्राप्त कर लेना ही मानव-जीवनका प्रधान उद्देश्य है—यही परम पुरुषार्थ है। इसे पाये बिना जीवन व्यर्थ है, इसे न पा सकना ही सबसे बड़ी हानि है; यही बात केन-श्रुति भी कहती है—

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः । ( २।५ )

अतः इस दृष्टिको प्राप्त करनेके लिये प्रत्येक पुरुषको प्राणपणसे प्रयत्न करना चाहिये। भगवान् हमें इसे प्राप्त करनेकी योग्यता दें।

अनुवादक—