छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ६ )
बढ़कर एक सहस्र न हो जाय तबतक मत लौटना। बालक सत्यकामने गुरुजीके इस आदेशका प्राणपणसे पालन किया और केवल गोचारणद्वारा ही उसे गुरुकृपासे ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो गया। जिस समय वह गौओंको लेकर गुरुजीके पास आया उस समय उसके तेजको देखकर उन्हें भी कहना पड़ा—
'ब्रह्मविदिव वै सोम्य भासि को नु त्वानुशशास'
'हे सोम्य! तू ब्रह्मवेत्ता-सा जान पड़ता है, तुझे किसने उपदेश दिया है?' इसी प्रकार सत्यकामके शिष्य उपकोसलको भी नियमानुसार अग्निहोत्र करते-करते ही गुरुकृपासे ब्रह्मविद्याकी प्राप्ति हो गयी। इन दृष्टान्तोंका आशय यही है कि जिस पुरुषका जिस समय जो कर्तव्य है उसे उस समय सर्वथा उसीको यथावत् रूपसे पालन करना चाहिये। अपने कर्तव्यका यथोचित रीतिसे पालन करना ही कल्याणकारक है।
सप्तम अध्यायमें सनत्कुमार और नारदका संवाद है। देवर्षि नारदजी आत्मज्ञानकी जिज्ञासासे सनत्कुमारजीकी शरणमें जाते हैं। सनत्कुमारजी पूछते हैं—'तुम मुझे यह बतलाओ कि कौन-कौन विद्याएँ जानते हो? उससे आगे मैं उपदेश करूँगा।' नारदजी कहते हैं—'मैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास-पुराण-रूप पञ्चम वेद, व्याकरण, श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, निधि-शास्त्र, तर्कशास्त्र, नीतिशास्त्र, निरुक्त, शिक्षा, भूततन्त्र, धनुर्वेद, ज्योतिष, गारुड और संगीतविद्या—ये सब जानता हूँ।' इतनी विद्याएँ जाननेपर भी नारदजीको शान्ति नहीं है; शान्ति मिले कैसे? किसी राजाको राज्य, वैभव, स्त्री, पुत्र और सम्मानादि सभी प्राप्त हों, परन्तु उसके शरीरमें भयंकर पीड़ा हो तो वह सारा वैभव भी उसे शान्ति नहीं दे सकता? इसी प्रकार संसारका बड़े-से-बड़ा ऐश्वर्य प्राप्त होनेपर भी आत्मज्ञानके बिना पूर्ण शान्ति प्राप्त होना सर्वथा असम्भव है। बिना भगवान्का साक्षात्कार किये दुःखोंसे छुटकारा पाना आकाशको चमड़ेके समान लपेट लेनेकी तरह असम्भव है—
यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः।
तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति ॥