भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 9, कुल 978 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 9

( ५ )

रक्षा की। जब वह उच्छिष्ठ जल भी देने लगा तो उन्होंने 'यह उच्छिष्ठ है' ऐसा कहकर निषेध कर दिया। इसपर जब हाथीवानने शङ्का की कि क्या जूठे उड़द खानेसे उच्छिष्ठ-भोजनका दोष नहीं हुआ ? तो वे बोले—

'न वा अजीविष्यमिमानखादन्····कामो मे उदपानम्'

अर्थात् इन्हें खाये बिना मैं जीवित नहीं रह सकता था, जल तो मुझे इच्छानुसार सर्वत्र मिल सकता है। इस प्रकार उच्छिष्ट जलके लिये निषेध करके उन्होंने यह आदर्श उपस्थित कर दिया कि मनुष्य आचारसम्बन्धी नियमोंकी उपेक्षा भी तभी कर सकता है जब कि उसके बिना प्राणरक्षाका कोई दूसरा उपाय ही न हो।

प्रथम अध्यायमें जो शिलक, चैकितायन और प्रवाहणका संवाद है तथा पञ्चम अध्यायमें जो उद्दालकके साथ प्राचीनशालादि पाँच महर्षियोंने राजा अश्वपतिके पास जाकर वैश्वानर आत्माके विषयमें जिज्ञासा की है, उन दोनों प्रसंगोंसे यह बात स्पष्ट होती है कि सनातन शिष्टाचारके अनुसार उपदेश देनेका अधिकार ब्राह्मणोंको ही है; परन्तु यदि कोई उत्कृष्ट विद्या किसी अन्य द्विजातिके पास हो तो भी ली जा सकती है। किसी भी कल्याणकारिणी विद्याको ग्रहण करनेके लिये मनुष्यको कितने त्याग, तप, सेवा, सत्य और विनय आदिकी आवश्यकता है—यह बात कई आख्यायिकाओंमें प्रदर्शित की गयी है। राजा जानश्रुतिने संवर्ग-विद्याकी प्राप्तिके लिये गाड़ीवाले रैक्वका तिरस्कार सहा और उन्हें बहुत-सा धन, राज्य एवं अपनी कन्या देकर भी उस विद्याको ग्रहण किया। इन्द्रने आत्मविद्याकी प्राप्तिके लिये एक सौ एक वर्षतक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन किया, सत्यकाम जाबालने जब अपने गुरु हारिद्रुमत गौतमसे उपनयनके लिये प्रार्थना की और उन्होंने उसका गोत्र पूछा तो उसने उस विषयमें अपने अज्ञानका कारण स्पष्ट शब्दोंमें कह दिया; उसके इस स्पष्ट कथनसे ही आचार्यको निश्चय हो गया कि यह ब्राह्मण ही है और उन्होंने उसे दीक्षा दे दी। फिर सत्यकामने गुरु-सेवाके प्रभावसे ही ब्रह्मविद्या प्राप्त कर ली। सत्यकाम आचार्य हारिद्रुमतके पास विद्याध्ययनके लिये गया था; आचार्यने उसका उपनयन कर उसे चार सौ गौएँ देकर आज्ञा दी कि इन्हें जंगलमें ले जाओ; जबतक इनकी संख्या