भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 8

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येऽन्यथातो विदुरन्यराजानस्ते क्षय्यलोका भवन्ति' 'सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति ब्रह्मसंस्थोऽमृतत्वमेति' आदि बहुत-सी श्रुतियाँ प्रमाण हैं। निष्काम कर्म और उपासना मल और विक्षेपकी निवृत्ति करके ज्ञानद्वारा मुक्ति देते हैं। ज्ञानसे ही आत्मसाक्षात्कार होता है और फिर उसकी दृष्टिमें संसार और संसारबन्धनका अत्यन्ताभाव होकर सर्वत्र अशेष-विशेष-शून्य एक अखण्ड चिदानन्दघन सत्ता ही रह जाती है। इस प्रकार जब उसकी दृष्टिमें प्रपञ्च ही नहीं रहता, तब अपना पञ्चकोशात्मक शरीर और उसके स्थिति या विनाश ही कहाँ रह सकते हैं तथा उसके लिये जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्तिका भी प्रश्न नहीं रहता; वह तो नित्य मुक्त ही है। उसके इस वास्तविक स्वरूपको न जाननेके कारण अन्य लोग उसमें जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्तिका आरोप करते हैं; वह मुक्त होता नहीं, मुक्तस्वरूप ही है। श्रुति कहती है—'विमुक्तश्च विमुच्यते'।

इस प्रकार यह निश्चय हुआ कि यद्यपि मोक्षका साक्षात् साधन ज्ञान ही है तथापि ज्ञानप्राप्तिका अधिकार प्रदान करनेवाले होनेके कारण कर्म और उपासना भी उसके साधन अवश्य हैं। इस शाखामें कर्मनिरूपण पहले किया जा चुका है; अब आत्मज्ञानका निरूपण करना है, इसीलिये यह उपनिषद् आरम्भ की गयी है। इसमें भी तत्त्वज्ञानमें उपयोगी होनेके कारण पहले भिन्न-भिन्न उपासनाओंका ही वर्णन किया गया है। इस उपनिषद्में कुल आठ अध्याय हैं, जिनमेंसे पहले पाँच अध्यायोंमें प्रधानतया उपासनाओंका वर्णन है और अन्तिम तीन अध्यायोंमें ज्ञानका।

इसमें उपासना और ज्ञान दोनों ही विषयोंका बड़ा सुन्दर विवेचन है। उन्हें सुगमतासे समझानेके लिये जगह-जगह कई आख्यायिकाएँ भी दी गयी हैं, जिनसे उन विषयोंके हृदयंगम होनेमें सहायता मिलनेके अतिरिक्त कई प्रकारकी शिक्षाएँ भी मिलती हैं। प्रथम अध्यायमें इभ्यग्राममें रहनेवाले उषस्तिकी कथा है। उषस्ति यज्ञ-यागादि कर्मकाण्डमें बहुत कुशल थे। एक बार कुरुदेशमें, जहाँ वे रहते थे, ओले और पत्थरोंकी वर्षा होनेके कारण ऐसा अकाल पड़ा कि उन्हें कई दिनोंतक निराहार रहना पड़ा। जब प्राणसंकट उपस्थित हुआ, तब उन्होंने एक हाथीवानसे जाकर कुछ अन्न माँगा।

उसके पास कुछ उड़द थे; परन्तु वे उच्छिष्ट थे, इसलिये उन्हें देनेमें उसे हिचक हुई। परन्तु उषस्तिने उन्हींको माँगकर अपने प्राणोंकी