छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीहरिः
प्रस्तावना
छान्दोग्योपनिषद् सामवेदीय तलवकार ब्राह्मणके अन्तर्गत है। केनोपनिषद् भी तलवकारशाखाकी ही है। इसलिये इन दोनोंका एक ही शान्तिपाठ है। यह उपनिषद् बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। इसकी वर्णनशैली अत्यन्त क्रमबद्ध और युक्तियुक्त है। इसमें तत्त्वज्ञान और तदुपयोगी कर्म तथा उपासनाओंका बड़ा विशद और विस्तृत वर्णन है। यद्यपि आजकल औपनिषद कर्म और उपासनाका प्रायः सर्वथा लोप हो जानेके कारण उनके स्वरूप और रहस्यका यथावत् ज्ञान इने-गिने प्रकाण्ड पण्डित और विचारकोंको ही है, तथापि इसमें कोई संदेह नहीं कि उनके मूलमें जो भाव और उद्देश्य निहित है उसीके आधारपर उनसे परवर्ती स्मार्त कर्म एवं पौराणिक और तान्त्रिक उपासनाओंका आविर्भाव हुआ है।
अद्वैतवेदान्तकी प्रक्रियाके अनुसार जीव अविद्याकी तीन शक्तियोंसे आवृत्त है, उन्हें मल, विक्षेप और आवरण कहते हैं। इनमें मल अर्थात् अन्तःकरणके मलिन संस्कारजनित दोषोंकी निवृत्ति निष्काम कर्मसे होती है, विक्षेप अर्थात् चित्तचाञ्चल्यका नाश उपासनासे होता है और आवरण अर्थात् स्वरूपविस्मृति या अज्ञानका नाश ज्ञानसे होता है। इस प्रकार चित्तके इन त्रिविध दोषोंके लिये ये अलग-अलग तीन ओषधियाँ हैं। इन तीनोंके द्वारा तीन ही प्रकारकी गतियाँ होती हैं। सकामकर्मी लोग धूममार्गसे स्वर्गादि लोकोंको प्राप्त होकर पुण्य क्षीण होनेपर पुनः जन्म लेते हैं। निष्कामकमी और उपासक अर्चिरादि मार्गसे अपने उपास्यदेवके लोकमें जाकर अपने अधिकारानुसार सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य या सायुज्य मुक्ति प्राप्त करते हैं। इन दोनों गतियोंका इस उपनिषद्-के पाँचवें अध्यायमें विशदरूपसे वर्णन किया गया है। इन दोनोंसे अलग जो तत्त्वज्ञानी होते हैं उनके प्राणोंका उत्क्रमण (लोकान्तरमें गमन.) नहीं होता; उनके शरीर यहीं अपने-अपने तत्त्वोंमें लीन हो जाते हैं और उन्हें यहाँ ही कैवल्यपद प्राप्त होता है।
अद्वैतसिद्धान्तके अनुसार मोक्षका साक्षात् साधन ज्ञान ही है; इस विषयमें 'ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः' 'ज्ञानादेव तु कैवल्यम्' 'अथ