छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 147, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १२ ] शाङ्करभाष्यार्थ १४३
| त एवं हिं कृत्वा पुनरप्यूचुः— <br><br> स त्वं हेऽन्नपते ! स हि सर्वस्यान्नस्य प्रसवितृत्वात्पतिः । न हि तत्पाकेन विना प्रसूत मन्नमणुमात्रमपि जायते प्राणिनाम् । अतोऽन्नपतिः । हेऽन्नपतेऽन्नमस्मभ्यमिहाहराहरेति । अभ्यास आदरार्थः । ओमिति ॥ ५ ॥ | इस प्रकार हिंकार कर उन्होंने फिर भी कहा—‘वही तू हे अन्नपते ! —सम्पूर्ण अन्नका उत्पत्तिकर्ता होनेके कारण वही अन्नपति है, क्योंकि उसके पाक बिना उत्पन्न हो जानेपर भी प्राणियोंके लिये अणुमात्र भी अन्न उत्पन्न नहीं होता, अतः वह अन्नपति है—हे अन्नपते ! तू हमारे लिये यहाँ अन्न ला।’ ‘आहर’ इस शब्दकी पुनरावृत्ति आदरके लिये है। ओमिति—[ यह पद उपासनाकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है ] ॥ ५ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि प्रथमाध्याये द्वादशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १२ ॥