छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 149, कुल 978 में से
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खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ १४५
| शाङ्करभाष्यम् | शाङ्करभाष्यार्थ |
|---|---|
| रिति । अस्मात् सामान्याद्वाइ-<br>कारं वायुदृष्ट्योपासीत ।<br><br>चन्द्रमा अथकारः । चन्द्र-<br>दृष्ट्याथकारमुपासीत । अन्ने हीदं<br>स्थितम् । अन्नात्मा चन्द्रः ।<br>थकाराकारसामान्याच्च । आत्मे-<br>हकारः । इहेति स्तोभः प्रत्यक्षो<br>ह्यात्मेहेति व्यपदिश्यते, इहेति<br>च स्तोभः, तत्सामान्यात् । अग्नि-<br>रीकारः । ईनिधनानि चाग्नेयानि<br>सर्वाणि सामानीत्यतस्तत्सामा-<br>न्यात् ॥ १ ॥ | है । अतः इस समानताके कारण हाइकार सामकी वायुदृष्टिसे उपा-<br>सना करनी चाहिये ।<br>चन्द्रमा अथकार है । अथकारकी उपासना चन्द्रदृष्टिसे करनी चाहिये, क्योंकि यह (चन्द्रमा) अन्नमें ही स्थित है । चन्द्रमा अन्नस्वरूप ही है । थकार और अकारमें समानता होनेके कारण भी [अन्नरूप चन्द्रमा-<br>की अथकाररूपसे उपासना करनी चाहिये ] आत्मा इहकार है; 'इह' यह [ एक प्रकारका ] स्तोभ होता है । प्रत्यक्ष ही आत्मा 'इह' ऐसा कहकर निर्देश किया जाता है और 'इह' ऐसा स्तोभ भी होता है, अतः उसकी समानताके कारण [ आत्मा इहकार है ] । अग्नि ईकार है । सम्पूर्ण आग्नेय साम 'ई' में समाप्त होनेवाले हैं । अतः उस सदृशताके कारण अग्नि ईकार है ॥ १ ॥ |
आदित्य ऊकारो निह्नव एकारो विश्वे देवा औहोयिकारः प्रजापतिर्हिंकारः प्राणः स्वरोऽन्नं या वाग्विराट् ॥ २ ॥
आदित्य ऊकार है, निह्नव एकार है, विश्वेदेव औहोयिकार हैं, प्रजापति हिंकार है तथा प्राण स्वर है, अन्न या है एवं विराट् वाक् है ॥ २ ॥