भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

द्वितीय खण्ड

लोकविषयक पाँच प्रकारकी सामोपासना

| कानि पुनस्तानि साधुदृष्टिविशिष्टानि समस्तानि सामान्युपास्यानि ? इति, इमानि तान्युच्यन्ते लोकेषु पञ्चविधमित्यादीनि । | फिर वे साधुदृष्टिविशिष्ट उपासना करने योग्य समस्त साम कौन-से हैं? ऐसी आशङ्का होनेपर कहते हैं--वे 'लोकेषु पञ्चविधम्' इत्यादि मन्त्रोंद्वारा इस प्रकार बतलाये जाते हैं- |

लोकेषु पञ्चविधँसामोपासीत पृथिवी हिंकारः । अग्निः प्रस्तावोऽन्तरिक्षमुद्गीथ आदित्यः प्रतिहारो द्यौर्निधनमित्यूर्ध्वेषु ॥ १ ॥

ऊपरके लोकोंमें निम्नाङ्कितरूपसे पाँच प्रकारके सामकी उपासना करनी चाहिये । पृथिवी हिंकार है, अग्नि प्रस्ताव है, अन्तरिक्ष उद्गीथ है, आदित्य प्रतिहार है और द्युलोक निधन है ॥ १ ॥

| [साम्नि द्विधा दृष्टौ विरोधोद्भावनम्]<br><br>ननु लोकादिदृष्ट्या तान्युपास्यानि साधुदृष्ट्या चेति विरुद्धम् । | **शंका—**किंतु उन समस्त सामोंकी लोकादिदृष्टिसे तथा साधुदृष्टिसे भी उपासना करनी चाहिये—ऐसा कहना तो परस्पर विरुद्ध है ? | | [विरोधपरिहारः]<br><br>न, साध्वर्थस्य लोकादिकार्येषु कारणस्यानुगतत्वात्, मृदादिवद्घटादिविकार्येषु । साधुशब्दवाच्योऽर्थो धर्मो ब्रह्म वा सर्वथापि लोकादिकार्येष्वनुगतम् । अतो | **समाधान—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार मृत्तिका आदि अपने विकार घटादिमें अनुगत होते हैं उसी प्रकार [ सबका ] कारणभूत साधु पदार्थ लोकादि कार्यवर्गमें अनुगत है। साधुशब्दका वाच्यार्थ धर्म अथवा ब्रह्म सभी प्रकारसे लोकादि कार्यवर्गमें व्याप्त है । अतः जिस |