छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 159, कुल 978 में से
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| खण्ड २ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | १५५ |
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| संस्कृत (शाङ्करभाष्यम्) | हिन्दी (भाष्यार्थ) |
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| यथा यत्र घटादिदृष्टिर्मृदादिदृष्ट्यनुगतैव सा, तथा साधुदृष्ट्यनुगतैव लोकादिदृष्टिः, धर्मादिकार्यत्वाल्लोकादीनाम् । यद्यपि कारणत्वमविशिष्टं ब्रह्मधर्मयोः, तथापि धर्म एव साधुशब्दवाच्य इति युक्तम्, साधुकारी साधुर्भवतीति धर्मविषये साधु शब्दप्रयोगात् । | प्रकार जहाँ घटादिदृष्टि होती है वहाँ वह मृत्तिकादिदृष्टिसे अनुगत ही होती है, उसी प्रकार लोकादिदृष्टि भी साधुदृष्टिसे अनुगत ही होती है; क्योंकि ये लोकादि धर्मादिके कार्य ही होते हैं । यद्यपि ब्रह्म और धर्मका प्रपञ्चकारणत्व तो समान है तो भी 'साधु' शब्दका वाच्य धर्म ही है—ऐसा मानना ठीक है; क्योंकि 'साधु करनेवाला साधु होता है' इस प्रकार--धर्मके विषयमें ही 'साधु' शब्दका प्रयोग किया गया है । |
| (लोकादिदृष्ट्यनुशासनवैयर्थ्या-शङ्का)<br>ननु लोकादिकार्येषु कारणस्यानुगतत्वादर्थप्राप्तैव तद्दृष्टिरिति 'साधु सामेत्युपास्ते' इति न वक्तव्यम् । | शंका--लोकादि कार्योंमें उनका कारण अनुगत होनेके कारण उसमें साधुदृष्टि होना तो स्वतः सिद्ध है । ऐसी अवस्थामें 'साम साधु है इस प्रकार उपासना करता है' यह नहीं कहना चाहिये था । |
| (तन्निरसनम्)<br>न, शास्त्रगम्यत्वात्तद् दृष्टेः । सर्वत्र हि शास्त्रार्पिता एव धर्मा उपास्या न विद्यमाना अप्यशास्त्रीयाः । | समाधान--नहीं, क्योंकि वह दृष्टि शास्त्रसे ही प्राप्त हो सकती है । सभी जगह शास्त्रविहित धर्म ही उपासनीय होते हैं, अशास्त्रीय धर्म विद्यमान रहनेपर भी उपासनीय नहीं होते । |
| लोकेषु पृथिव्यादिषु पञ्चविधं पञ्चभक्तिभेदेन पञ्चप्रकारं साधु समस्तं सामोपासीत । कथम् ? पृथिवी हिंकारः । लोकेष्विति या सप्तमी तां प्रथ- | पृथिवी आदि लोकोंमें पञ्चविध--पाँच प्रकारकी भक्तिके भेदसे पाँच प्रकारके साधुगुणविशिष्ट समस्त सामकी उपासना करनी चाहिये । सो किस प्रकार ? [यह बतलाते हैं-] पृथिवी हिंकार है। 'लोकेषु' इस पदमें जो सप्तमी विभक्ति है उसे प्रथमा |