छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 160, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| १५६ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| मात्वेन विपरिणमय्य पृथिवीदृष्ट्या हिंकारे पृथिवी हिंकार इत्युपासीत । व्यत्यस्य वा सप्तमीश्रुतिं लोकविषयां हिंकारादिषु पृथिव्यादिदृष्टिं कृत्वोपासीत । | विभक्तिके रूपसे* परिणत कर हिंकारमें पृथिवी-दृष्टिद्वारा अर्थात् 'पृथिवी हिंकार है' इस प्रकार उपासना करे । अथवा 'लोकेषु' इस पदकी सप्तमी-श्रुतिको हिंकारादिमें करके और वहाँकी कर्मविभक्ति लोक शब्दमें कर हिंकारादिमें पृथिवी आदि दृष्टि करके उपासना करे ।‡ |
| तत्र पृथिवी हिंकारः, प्राथम्यसामान्यात् । अग्निः प्रस्तावः, अग्नौ हि कर्माणि प्रस्तूयन्ते; प्रस्तावश्च भक्तिः । अन्तरिक्षमुद्गीथः, अन्तरिक्षं हि गगनम्, गकारविशिष्टश्चोद्गीथः । आदित्यः प्रतिहारः, प्रतिप्राण्यभिमुखत्वान्मां प्रति मां प्रतीति । द्यौर्निधनम्, दिवि निधीयन्ते हीतो | उनमें पृथिवी हिंकार है, क्योंकि उन दोनोंमें 'प्रथमता' यह समान गुण है । अग्नि प्रस्ताव है, क्योंकि अग्निमें ही कर्मोंका प्रस्ताव किया जाता है और प्रस्ताव भी एक प्रकारकी सामभक्ति है । अन्तरिक्ष उद्गीथ है। अन्तरिक्ष गगन ( आकाश ) को कहते हैं और उद्गीथ भी गकारविशिष्ट है [इसलिये उन दोनोंमें सादृश्य है]। आदित्य प्रतिहार है, क्योंकि वह प्रत्येक प्राणीके अभिमुख है। सब लोग यह अनुभव करते हैं कि वह 'मां प्रति, मां प्रति-मेरे सम्मुख है, मेरे सम्मुख है।' तथा द्यौ निधन है, क्योंकि यहाँसे [मरकर] |
* प्रथमान्तरूपसे परिणत करनेपर वाक्यका स्वरूप यों होगा—'लोकाः पञ्चविधं सामेत्युपासीत।' भाव यह कि 'पृथिवी आदि लोक पाँच प्रकारके साम हैं' इस प्रकार उपासना करे । इसीलिये आगे 'पृथिवी हिङ्कारः' इत्यादिमें पृथिवी आदि शब्दोंमें सप्तमी विभक्तिका प्रयोग न करके प्रथमाका ही प्रयोग हुआ है ।
‡ अर्थात् 'लोकेषु पञ्चविधं सामोपासीत' इस वाक्यके अन्तर्गत 'लोकेषु' इस पदमें जो सप्तमी विभक्ति है उसे पञ्चविध साम एवं उसके द्वारा प्रतिपाद्य हिंकार आदिमें ले जाय और 'पञ्चविधं साम' में जो द्वितीया विभक्ति है उसे लोकपदमें ले जाय, इस दशामें वाक्यका स्वरूप ऐसा होगा--पञ्चविधं साम्नि लोकम् (लोकदृष्टिं कृत्वा ) उपासीत' । इसीका फलितार्थ बतलाते हुए भाष्यकार लिखते हैं—'हिंकारादिषु पृथिव्यादिदृष्टिं कृत्वोपासीत' ।