छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 161, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थे १५७
| गता इत्यूर्ध्वेषूर्ध्वगतेषु लोक-<br><br>दृष्ट्या सामोपासनम् ॥ १ ॥ | जानेवाले लोग द्युलोकमें रक्खे जाते<br>हैं। इस प्रकार उत्तरोत्तर ऊर्ध्वगत-<br>ऊपरके लोकोंमें लोकदृष्टिसे की जाने-<br>वाली उपासना बतलायी गयी ॥ १ ॥ |
आवृत्तिकालिक अधोमुख लोकोंमें पञ्चविध सामोपासना
अथावृत्तेषु द्यौर्हिंकार आदित्यः प्रस्तावोऽन्तरिक्ष-<br>मुद्गीथोऽग्निः प्रतिहारः पृथिवी निधनम् ॥ २ ॥
अब अधोमुख लोकोंमें सामोपासनाका निरूपण किया जाता है—द्युलोक हिंकार है, आदित्य प्रस्ताव है, अन्तरिक्ष उद्गीथ है, अग्नि प्रतिहार है और पृथिवी निधन है ॥ २ ॥
| अथावृत्तेष्ववाङ्मुखेषु पञ्च-<br><br>विधमुच्यते सामोपासनम् ।<br><br>गत्यागतिविशिष्टा हि लोकाः ।<br><br>यथा ते, तन्नादृष्ट्यैव सामोपासनं<br><br>विधीयते यतः, अत आवृत्तेषु<br><br>लोकेषु द्यौर्हिंकारः प्राथम्यात् ।<br><br>आदित्यः प्रस्तावः, उदिते ह्यादित्ये<br><br>प्रस्तूयन्ते कर्माणि प्राणिनाम् ।<br><br>अन्तरिक्षमुद्गीथः पूर्ववत् । अग्निः<br><br>प्रतिहारः, प्राणिभिः प्रतिहरणा- | अब आवृत्त अर्थात् पुनरावृत्तिके<br>समय अधोमुख लोकोंमें पाँच प्रकारकी<br>सामोपासनाका निरूपण किया जाता<br>है, क्योंकि ये लोक गमन और आग-<br>मन [दोनों प्रकारकी वृत्तियों] से<br>युक्त हैं। गमन और आगमन-कालमें<br>जिस प्रकार वे स्थित हैं उसी दृष्टिसे<br>उनमें सामोपासनाका विधान किया<br>जाता है, इसलिये आगमनकालमें<br>उन अधोमुख लोकोंमें प्रथम होनेके<br>कारण द्युलोक हिंकार है, आदित्य<br>प्रस्ताव है, क्योंकि सूर्यके उदित होने-<br>पर ही प्राणियोंके कर्म प्रस्तुत होते हैं;<br>तथा पहलेहीके समान अन्तरिक्ष उद्-<br>गीथ है; अग्नि प्रतिहार है, क्योंकि<br>प्राणियोंद्वारा उसका प्रतिहरण (एक |