छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 221, कुल 978 में से
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| खण्ड २३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | २१७ |
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| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| यदि च पुण्यलोकातिशयमात्रममृतत्वमभविष्यत्ततःपुण्यलोकत्वाद्विभक्तं नावक्ष्यत् । विभक्तोपदेशादात्यन्तिकममृतत्वमिति गम्यते । | यदि पुण्यलोकका अतिशयमात्र (अधिकता) ही अमृतत्व होता तो पुण्यलोकरूप ही होनेके कारण इसका उससे पृथक् वर्णन न किया जाता। अतः पृथक् उपदेश किया जानेके कारण यहाँ आत्यन्तिक अमृतत्व ही अभिप्रेत है—ऐसा जाना जाता है। |
| अत्र चाश्रमधर्मफलोपन्यासः प्रणवसेवास्तुत्यर्थं न तत्फलविध्यर्थम् । स्तुतये च प्रणवसेवा या आश्रमधर्मफलविधये चेति हि भिद्येत वाक्यम् । तस्मात्स्मृतिसिद्धाश्रमफलानुवादेन प्रणवसेवाफलममृतत्वं ब्रुवन्प्रणवसेवां स्तौति । यथा पूर्णवर्मणः सेवा भक्तपरिधानमात्रफला राजवर्मणस्तु सेवा राज्यतुल्यफलेति तद्वत् । | यहाँ जो आश्रमधर्मोंके फलोंका उल्लेख किया है, वह प्रणवोपासनाकी स्तुतिके लिये ही है, उनके फलोंका विधान करनेके लिये नहीं है। परंतु यदि यह कहा जाय कि 'यह वाक्य प्रणवसेवाकी स्तुतिके लिये और आश्रमधर्मके फलका विधान करनेके लिये भी है, तो वाक्यभेद हो जायगा। अतः यह मन्त्र स्मृतिप्रतिपादित आश्रमफलके अनुवादद्वारा 'प्रणवसेवाका फल अमृतत्व है' यह बतलाता हुआ प्रणवोपासनाकी ही स्तुति करता है। जिस प्रकार [कोई कहे कि] पूर्णवर्माकी सेवा भोजन-वस्त्रमात्र फल देनेवाली है और राजवर्माकी सेवा राज्यके समान फल देनेवाली है। उसी प्रकार यहाँ समझना चाहिये। |
| प्रणवश्च तत्सत्यं परं ब्रह्म तत्प्रतीकत्वात् । "एतद्ध्येवाक्षरं | प्रणव ही वह सत्य परब्रह्म है, क्योंकि यह उसका प्रतीक है। |