भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 978 में से

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पृष्ठ 222
२१८छान्दोग्योपनिषद् —[अध्याय २
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
ब्रह्म, एतद्ध्येवाक्षरं परम्" (क० उ० १।२।१६) इत्याद्याम्नायात्काठके युक्तं तत्सेवातोऽमृतत्वम्।कठोपनिषद्में "यह अक्षर ही ब्रह्म है, यह अक्षर ही पर है" इत्यादि श्रुति होनेसे उसकी सेवाद्बारा अमृतत्वकी प्राप्ति होना उचित ही है।
परमतोपन्यासः —<br>अत्राहुः केचिच्चतुर्णामाश्रमिणामविशेषेण स्वकर्मानुष्ठानात्पुण्यलोकतेहोक्ता ज्ञानवर्जितानां सर्व एते पुण्यलोका भवन्तीति। नात्र परिव्राडवशेषितः। परिव्राजकस्यापि ज्ञानं यमा नियमाश्च तप एवेति 'तप एव द्वितीयः' इत्यत्र तपःशब्देन परिव्राट्तापसौ गृहीतौ। अतस्तेषामेव चतुर्णां यो ब्रह्मसंस्थः प्रणवसेवकः सोऽमृतत्वमेतीति; चतुर्णामधिकृतत्वाविशेषाद् ब्रह्मसंस्थत्वेऽप्रतिषेधाच्च। स्वकर्मच्छिद्रे च ब्रह्मसंस्थतायां सामर्थ्योपपत्तेः।यहाँ कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि 'इस मन्त्रमें ये सभी पुण्यलोकके भागी होते हैं' इस वाक्यद्वारा ज्ञानरहित चारों ही आश्रमियोंको समानरूपसे अपने-अपने धर्मोंका पालन करनेसे पुण्यलोककी प्राप्ति बतलायी गयी है। इनमें परिव्राजकको भी छोड़ा नहीं है। परिव्राजकके भी ज्ञान, यम और नियम—ये तप ही हैं, अतः 'तप ही दूसरा धर्मस्कन्ध है' इस वाक्यमें 'तप' शब्दसे परिव्राजक और वानप्रस्थ दोनोंका ग्रहण किया गया है। अतः उन चारोंहीमें जो ब्रह्मनिष्ठ प्रणवोपासक होता है, वही अमृतत्वको प्राप्त हो जाता है, क्योंकि इन चारोंका ही अधिकार समान है और ब्रह्मनिष्ठामें भी किसीका प्रतिषेध नहीं किया गया, क्योंकि अपने-अपने कर्मोंके अनुष्ठानसे अवकाश मिलनेपर सभीको ब्रह्ममें स्थित होनेका सामर्थ्य होना सम्भव है।