भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 320, कुल 978 में से

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पृष्ठ 320

पञ्चदश खण्ड

—: ० :—

विराट्कोशोपासना

| 'अस्य कुले वीरो जायते'<br><br>इत्युक्तम् । न वीरजन्ममात्रं<br><br>पितुस्त्राणाय; “तस्मात्पुत्रमनुशिष्टं<br><br>लोक्यमाहुः” इति श्रुत्यन्तरात् ।<br><br>अतस्तद्दीर्घायुष्ट्वं कथं स्यादित्येव-<br><br>मर्थं कोशविज्ञानारम्भः । अभ्य-<br><br>र्हितविज्ञानव्यासङ्गादनन्तरमेव<br><br>नोक्तं तदिदानीमेवारभ्यते— | 'इसके कुलमें वीर पुत्र होता है'—ऐसा ( ३ । १३ । ६ में ) कहा गया है । किंतु वीर पुत्रका जन्ममात्र ही पिताकी रक्षाका कारण नहीं हो सकता; जैसा कि “अतः अनुशासित पुत्रको [ ब्राह्मणलोग ] लोक्य [ पुण्यलोक प्राप्त करानेवाला ] कहते हैं” इस अन्य श्रुतिसे सिद्ध होता है। अतः उसे दीर्घायुष्ट्वकी प्राप्ति कैसे हो सकती है—इसीके लिये कोशविज्ञानका आरम्भ किया जाता है । अभ्यर्हित* उपासनाके प्रतिपादनमें संलग्न रहनेके कारण 'वीरो जायते' इस श्रुतिके अनन्तर ही इसका वर्णन नहीं किया, इसलिये अब आरम्भ किया जाता है— |


* गायत्रीरूप उपाधिसे युक्त ब्रह्मकी उपासनाको कौक्षेय ज्योतिमें आरोपित करके परब्रह्मकी उपासना करना अभ्यर्हित है और उसकी मनोमयत्वादिगुणविशिष्ट ब्रह्मोपासना अन्तरङ्ग है ।