भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 321, कुल 978 में से

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पृष्ठ 321

खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१७


अन्तरिक्षोदरः कोशो भूमिबुध्नो न जीर्यति दिशो
ह्यस्य स्रक्तयो द्यौरस्योत्तरं बिलꣳ स एष कोशो वसुधा-
नस्तस्मिन्विश्वमिदꣳ श्रितम् ॥ १ ॥

अन्तरिक्ष जिसका उदर है वह कोश पृथिवीरूप मूलवाला है। वह जीर्ण नहीं होता। दिशाएँ इसके कोण हैं, आकाश ऊपरका छिद्र है वह यह कोश वसुधान है। उसीमें यह सारा विश्व स्थित है ॥ १ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अन्तरिक्षमुदरमन्तः सुषिरं यस्य सोऽयमन्तरिक्षोदरः, कोशः कोश इवानेकधर्मसादृश्यात्कोशः स च भूमिबुध्नः, भूमिर्बुध्नो मूलं यस्य स भूमिबुध्नः, न जीर्यति न विनश्यति, त्रैलोक्यात्मकत्वात् । सहस्रयुगकालावस्थायी हि सः ।अन्तरिक्ष है उदर—अन्तःछिद्र जिसका वह यह अन्तरिक्षोदर कोश जो अनेक धर्मोंमें सादृश्य रखनेके कारण कोशके समान कोश है, वह भूमिबुध्न–भूमि है बुध्न–मूल जिसका ऐसा भूमिबुध्न (पृथ्वीमूलक) है, वह त्रैलोक्यरूप होनेके कारण जीर्ण नहीं होता अर्थात् नाशको प्राप्त नहीं होता। क्योंकि वह तो सहस्रयुगकालपर्यन्त रहनेवाला है।
दिशो ह्यस्य सर्वाः स्रक्तयः कोणाः । द्यौरस्य कोशस्योत्तरमूर्ध्वं बिलम्, स एष यथोक्तगुणः कोशो वसुधानः, वसु धीयतेऽस्मिन्प्राणिनां कर्मफलाख्यमतो वसुधानः । तस्मिन्नन्तर्विश्वं समस्तं प्राणिकर्मफलं सहसमस्त दिशाएँ ही इसकी स्रक्तियाँ अर्थात् कोण हैं। द्युलोक इस कोशका ऊपरी छिद्र है। वह यह पूर्वोक्त गुणोंवाला कोश वसुधान है, इसमें प्राणियोंके कर्मफलसंज्ञक वसुका आधान किया जाता है, इसलिये यह कोश वसुधान है। तात्पर्य यह है कि उस कोशके भीतर ही प्राणियोंका सम्पूर्ण कर्मफल जिसका कि]
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