भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 323, कुल 978 में से

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पृष्ठ 323

खण्ड १५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१९


भाष्यम्भाष्यार्थ
राज्ञी राज्ञा वरुणेनाधिष्ठिता संध्यारागयोगाद्वा। सुभूता नाम भूतिमद्भििरीश्वरकुबेरादिभिरधिष्ठितत्वात्सुभूता नामोदीची।<br><br>तासां दिशां वायुर्वत्सो दिग्जत्वाद्वायोः, पुरोवात इत्यादिदर्शनात्। यः कश्चित्पुत्रदीर्घजीविताथ्र्येवं यथोक्तगुणं वायुं दिशां वत्सममृतं वेद, स न पुत्ररोदं पुत्रनिमित्तं रोदनं न रोदिति पुत्रो न म्रियत इत्यर्थः।<br><br>यत एवं विशिष्टं कोशादिग्वत्सविषयं विज्ञानमतः सोऽहं पुत्रजीविताथ्र्यैवमेतं वायुं दिशां वत्सं वेद जाने। अतो मा पुत्ररोदं मा रुदं पुत्रमरणनिमित्तम्। पुत्ररोदो मम माभूदित्यर्थः॥२॥अधिष्ठित होनेके कारण अथवा सायंकालिक राग (लालिमा) के योगसे पश्चिम दिशा 'राज्ञी' है। उत्तर दिशा 'सुभूता' नामवाली है। ईश्वर, कुबेर आदि भूतिसम्पन्न देवताओंसे अधिष्ठित होनेके कारण उत्तर दिशा 'सुभूता' नामवाली है।<br><br>उन दिशाओंका वायु वत्स है, क्योंकि वायु दिशाओंसे ही उत्पन्न होनेवाला है। जैसा कि पूर्वीय वायु आदि प्रयोगोंसे देखा जाता है। वह कोई भी पुरुष, जो कि पुत्रके दीर्घजीवनकी कामनावाला है, यदि इस प्रकार पूर्वोक्त गुणवाले दिशाओंके वत्स अमृतरूप वायुको जानता है वह पुत्ररोद—पुत्रनिमित्तक रोदन नहीं करता। अर्थात् उसका पुत्र नहीं मरता, क्योंकि कोश और दिशाओंके वत्ससे सम्बन्ध रखनेवाला विज्ञान ऐसे गुणवाला है अतः अपने पुत्रके जीवनकी कामनावाला मैं दिशाओंके वत्सरूप इस वायुको इस प्रकार जानता हूँ; इसलिये पुत्ररोद—पुत्रके मरणसे होनेवाला रोदन न करूँ। अर्थात् मुझे पुत्रके लिये रोनेका प्रसङ्ग प्राप्त न हो॥ २ ॥