छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 35, कुल 978 में से
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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१
| सस्य दृढीभूतत्वात्कर्मपरित्यागेनोपासन एव दुःखं चेतःसमर्पणं कर्तुमिति कर्माङ्गविषयमेव तावदादावुपासनमुपन्यस्यते— | कर्माभ्यासकी दृढ़ता होनेके कारण कर्मका परित्याग करके उपासनामें ही चित्तको लगाना अत्यन्त कठिन है। इसीसे सबसे पहले कर्माङ्ग-सम्बन्धिनी उपासनाका ही उल्लेख किया जाता है— |
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उद्गीथदृष्टिसे ओंकारकी उपासना
ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत । ओमिति ह्युद्गायति तस्योपव्याख्यानम् ॥ १ ॥
ॐ यह अक्षर उद्गीथ है, इसकी उपासना करनी चाहिये । 'ॐ' ऐसा [उच्चारण करके यज्ञमें उद्गाता] उद्गान ( उच्चस्वरसे सामगान ) करता है । उस ( उद्गीथोपासना ) की ही व्याख्या की जाती है ॥ १ ॥
| ओमित्येतदक्षरमुद्गीथमुपासीत । ओमित्येतदक्षरं परमात्मनोऽभिधानं नेदिष्ठम् । तस्मिन्हि प्रयुज्यमाने स प्रसीदति प्रियनामग्रहण इव लोकः । तदिहेतिपरं प्रयुक्तमभिधायकत्वाद्व्यावर्तितं शब्दस्वरूपमात्रं प्रतीयते । तथा चार्चादिवत्परस्यात्मनः | उद्गीथशब्दवाच्य 'ॐ' इस अक्षरकी उपासना करे—'ॐ' यह अक्षर परमात्माका सबसे समीपवर्ती ( प्रियतम ) नाम है । उसका प्रयोग (उच्चारण) किया जानेपर वह प्रसन्न होता है, जिस प्रकार कि साधारण लोग अपना प्रिय नाम उच्चारण करनेपर प्रसन्न होते हैं । वह ओंकार यहाँ ( इस मन्त्रमें ) इतिपरक ( जिसके आगे 'इति' शब्द है; ऐसा ) प्रयुक्त हुआ है । अर्थात् परमात्माका अभिधायक होनेके कारण इतिशब्दद्वारा व्यावर्तित ( पृथक् निर्दिष्ट ) होकर वह केवल शब्दस्वरूपसे प्रतीत होता है और इस प्रकार वह मूर्ति |
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