छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 36, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| प्रतीकं सम्पद्यते। एवं नामत्वेन प्रतीकत्वेन च परमात्मोपासनसाधनं श्रेष्ठमिति सर्ववेदान्तेष्ववगतम्। जपकर्मस्वाध्यायाद्यन्तेषु च बहुशः प्रयोगात्प्रसिद्धमस्य श्रैष्ठ्यम्। <br><br> अतस्तदेतदक्षरं वर्णात्मकमुद्गीथभक्त्यवयवत्वादुद्गीथशब्दवाच्यमुपासीत। कर्माङ्गावयवभूत ॐकारे परमात्मप्रतीके दृढामैकाग्र्यलक्षणां मतिं संतनुयात्। स्वयमेव श्रुतिरोङ्कारस्योद्गीथशब्दवाच्यत्वे हेतुमाह—ओमिति ह्युद्गायति। ओमित्यारभ्य हि यस्मादुद्गायत्यत उद्गीथ ओङ्कार इत्यर्थः। | आदिके समान परमात्माका प्रतीक ही सिद्ध होता है। इस तरह नाम और प्रतीकरूपसे वह परमात्माकी उपासनाका उत्तम साधन है—ऐसा सम्पूर्ण वेदान्त-ग्रन्थोंमें विदित है। जप, कर्म और स्वाध्यायके आदि एवं अन्तमें इसका बहुधा प्रयोग होनेके कारण ❁ इसकी श्रेष्ठता प्रसिद्ध है। <br><br> अतः वह यह वर्णरूप अक्षर उद्गीथभक्तिका अवयव होनेके कारण 'उद्गीथ' शब्दवाच्य है, इसकी उपासना करे। अर्थात् [ उद्गीथ- ] कर्मके अङ्गभूत और परमात्माके प्रतीकस्वरूप ओंकारमें सुदृढ़ एकाग्रतारूप बुद्धिको अविच्छिन्न भावसे संयुक्त करे। ओंकारके 'उद्गीथ' शब्दवाच्य होनेमें श्रुति स्वयं ही हेतु बतलाती है—'ॐ' ऐसा कहकर उद्गान करता है—क्योंकि उद्गाता 'ॐ' इस अक्षरसे आरम्भ करके उद्गान करता है, इसलिये ओंकार उद्गीथ है। |
❁ जैसा कि भगवान्ने भी कहा है—
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥ ( गीता १७ । २४ )
'इसलिये वेदमन्त्रोंका उच्चारण करनेवाले श्रेष्ठ पुरुषोंकी शास्त्रविधिसे नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा 'ॐ' इस परमात्माके नामको उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं।'
† सामवेदीय स्तोत्रविशेषका नाम 'उद्गीथभक्ति' है। ओंकार उसका अंश है। इसलिये इसे उद्गीथ कहा गया है।