भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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पृष्ठ 37

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३३


| तस्योपव्याख्यानम्—तस्याक्षरस्योपव्याख्यानमेवमुपासनमेवंविभूतयेवंफलमित्यादिकथनमुपव्याख्यानम्, प्रवर्तत इति वाक्यशेषः ॥ १ ॥ | [ यहाँ ] उसका उपव्याख्यान आरम्भ किया जाता है—उस अक्षरकी सम्यग् व्याख्या की जाती है । 'इस प्रकार उसकी उपासना होती है, यह उसकी विभूति है और यह फल है,' इत्यादि प्रकारका जो कथन है, उसे उपव्याख्यान कहते हैं । यहाँ 'प्रवर्तते' ( आरम्भ किया जाता है ) यह क्रियापद वाक्यशेष है ॥ १ ॥ |


उद्गीथका रसतमत्व

एषां भूतानां पृथिवी रसः पृथिव्या आपो रसः ।
अपामोषधयो रस ओषधीनां पुरुषो रसः पुरुषस्य वाग्रसो
वाच ऋग्रस ऋचः साम रसः साम्न उद्गीथो रसः ॥ २॥

इन [ चराचर ] प्राणियोंका पृथिवी रस ( उत्पत्ति, स्थिति और लयका स्थान ) है । पृथिवीका रस जल है, जलका रस ओषधियाँ हैं, ओषधियोंका रस पुरुष है, पुरुषका रस वाक् है, वाक्‌का रस ऋक् है, ऋक्‌का रस साम है और सामका रस उद्गीथ है ॥ २ ॥


| एषां चराचराणां भूतानां पृथिवी रसो गतिः परायणमवष्टम्भः । पृथिव्या आपो रसोऽप्सु हि ओता च प्रोता च पृथिवी, अतस्ता रसः पृथिव्याः । अपामोषधयो रसः, अप्परिणामत्वादोषधीनाम् । तासां पुरुषो रसः, अन्नपरिणामत्वात्पुरुषस्य । | इन चराचर भूतोंका पृथिवी रस–गति–परायण अर्थात् आश्रय है । पृथिवीका रस आप् (जल) है, क्योंकि पृथिवी जलमें ही ओतप्रोत है; इसलिये वह पृथिवीका रस है । जलका रस ओषधियाँ हैं, क्योंकि ओषधियाँ जलका ही परिणाम हैं । उन ( ओषधियों ) का रस पुरुष है, क्योंकि पुरुष ( नरदेह ) अन्नका ही परिणाम है । |