छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 38, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| तस्यापि पुरुषस्य वाग्रसः, पुरुषावयवाना हि वाक्सारिष्ठा, अतो वाक् पुरुषस्य रस उच्यते। <br><br> तस्या अपि वाच ऋग्रसः सारतरा। ऋचः साम रसः सारतरम्। तस्यापि साम्न उद्गीथः प्रकृतत्वादोंकारः सारतरः ॥२॥ <br><br> एवम्— | उस पुरुषका भी रस वाक् है। पुरुषके अवयवोंमें वाक् ही सबसे अधिक सार वस्तु है, इसलिये वाक् पुरुषका रस कही जाती है। उस वाणीका भी उससे अधिक सारभूत ऋक् ही रस है, ऋक्का रस साम है जो उससे भी अधिक सारतर वस्तु है तथा उस सामका भी रस उद्गीथ (ॐकार) है। यहाँ उद्गीथ शब्दसे ओंकार ही लेना चाहिये; क्योंकि उसीका प्रकरण है, यह सामसे भी सारतर है ॥ २ ॥ <br><br> इस प्रकार — |
स एष रसानाँ२ रसतमः परमः पराध्योऽष्टमो यदुद्गीथः ॥ ३ ॥
यह जो उद्गीथ है वह सम्पूर्ण रसोंमें रसतम, उत्कृष्ट, परमात्माका प्रतीक होने योग्य और पृथिवी [आदि रसोंमें] आठवाँ है ॥ ३ ॥
| स एष उद्गीथाख्य ॐकारो भूतादीनामुत्तरोत्तररसानामतिशयेन रसो रसतमः परमः परमात्मप्रतीकत्वात्। परार्ध्यः-अर्धं स्थानं परं च तदर्धं च परार्धं तदर्हतीति परार्ध्यः परमात्मस्थानार्हः परमात्मवदुपास्यत्वादित्यभिप्रायः। अष्टमः पृथिव्यादिरससंख्यायां यदुद्गीथो य उद्गीथः ॥ ३ ॥ | वह यह उद्गीथसंज्ञक ओंकार भूत आदिके उत्तरोत्तर रसोंमें अतिशय रस अर्थात् रसतम है, परमात्माका प्रतीक होनेके कारण परम (उत्कृष्ट) है, परार्ध्य है--अर्ध कहते हैं स्थानको जो पर होते हुए अर्ध भी हो उसका नाम परार्ध है, उसके योग्य होनेसे यह परार्ध्य है; तात्पर्य यह है कि परमात्माके समान उपासनीय होनेके कारण यह परमात्माका आलम्बन होने योग्य है। तथा यह जो उद्गीथ है पृथिवी आदि रसोंकी गणनामें आठवाँ है॥३॥ |