छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 39, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १.] शाङ्करभाष्यार्थ [३५
उद्गीथोपासनान्तर्गत ऋक्, साम और उद्गीथका निर्णय
| वाच ऋग्रस इत्युक्तम्— | वाणीका रस ऋक् है—ऐसा कहा गया— |
कतमा कतमर्क्तमत्कतमत्साम कतमः कतम उद्गीथ इति विमृष्टं भवति ॥ ४ ॥
अब यह विचार किया जाता है कि कौन-कौन-सा ऋक् है, कौन-कौन-सा साम है और कौन-कौन-सा उद्गीथ है ? ॥ ४ ॥
| सा कतमा ऋक् ? कतम-<br>त्तत्साम ? कतमो वा स उद्गीथः ?<br>कतमा कतमेति वीप्सादरार्था । | कौन-सी वह ऋक् है, कौन-सा<br>वह साम है और कौन-सा वह<br>उद्गीथ है? 'कतमा-कतमा' (कौन-<br>कौन) यह द्विरुक्ति आदरके लिये है । |
| ननु 'वा बहूनां जातिपरिप्रश्ने<br>डतमच् ।' न ह्यत्र ऋग्जाति-<br>बहुत्वम्, कथं डतमच्प्रयोगः ? | शङ्का—'वा बहूनां जातिपरिप्रश्ने<br>डतमच्' *(५।३।९३) इस<br>पाणिनीय सूत्रके अनुसार अनेक<br>जातिके लोगोंमेंसे किसी एक जातिका<br>निश्चय करनेके लिये प्रश्न होनेपर<br>'डतमच्' प्रत्ययका प्रयोग इष्ट माना<br>गया है, किंतु यहाँ ऋग्जातिकी बहु-<br>लता सम्भव नहीं है, फिर 'डतमच'<br>प्रत्ययका प्रयोग कैसे किया गया ? |
* इस सूत्रका तात्पर्य यह है कि जहाँ विभिन्न जातियोंके अनेक पदार्थ होते हैं वहाँ किसी एक जातिके पदार्थका निश्चय करनेके लिये प्रश्न उपस्थित होनेपर 'डतमच्' प्रत्ययका प्रयोग किया जाता है । जिस प्रकार कठ आदि बहुत सी वेदशाखाएँ हैं, उनका स्वाध्याय करनेवाले द्विज लोगोंकी जाति उन्हीं शाखाओंके नामसे प्रसिद्ध हुई है । उनमेंसे कठ जातिका निश्चय करनेके लिये ही 'कतमः कठः' ऐसा प्रश्न किया जा सकता है । परंतु यहाँ तो ऋग्वेद एक ही जाति है, फिर इसमें 'डतमच्' प्रत्ययका प्रयोग कैसे हो सकता है ?
छा० उ० २—