छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 40, कुल 978 में से
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३६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय १ ]
| संस्कृत-भाष्यम् | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| नैष दोषः; जातौ परिप्रश्नो जातिपरिप्रश्न इत्येतस्मिन्विग्रहे जातावृगव्यक्तीनां बहुत्वोपपत्तेः। न तु जातेः परिप्रश्न इति विगृह्यते। | समाधान— यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि 'जातिपरिप्रश्न' इस पदका 'जातिमें परिप्रश्न' ऐसा विग्रह करनेपर ऋक् जातिमें ऋक् व्यक्तियों (विभिन्न ऋचाओं) की अनेकता तो सम्भव है ही; यहाँ 'जातिका परिप्रश्न' ऐसा विग्रह नहीं किया जाता। |
| ननु जातेः परिप्रश्न इत्यस्मिन् विग्रहे कतमः कठ इत्याद्युदाहरणमुपपन्नम्, जातौ परिप्रश्न इत्यत्र तु न युज्यते। | शङ्का— किंतु 'जातिका परिप्रश्न' ऐसा विग्रह करनेपर ही 'कतमः कठः' (आपमें कठशाखावाला कौन है ?) इत्यादि उदाहरण सम्भव हो सकता है, 'जातिमें परिप्रश्न' ऐसा विग्रह होनेपर यह उदाहरण नहीं दिया जा सकता। |
| तत्रापि कठादिजातावेव व्यक्तिबहुत्वाभिप्रायेण परिप्रश्न इत्यदोषः। यदि जातेः परिप्रश्नः स्यात्कतमा कतमर्गित्यादावुपसंख्यानं कर्तव्यं स्यात्। विमृष्टं भवति विमर्शः कृतो भवति ॥४॥ | समाधान— वहाँ भी कठादि जातिमें ही व्यक्तियोंकी बहुलताके अभिप्रायसे ऐसा प्रश्न किया गया है—यह मान लेनेसे कोई दोष नहीं आता। यदि यह प्रश्न (ऋगादि-) जातिसे सम्बन्ध रखता तो पूर्वोक्त सूत्रसे 'कौन-कौन ऋक् हैं' इत्यादि उदाहरण सिद्ध न होनेके कारण उसके लिये किसी पृथक् सूत्रका विधान किया जाता। * [अब यह] विमृष्ट होता है अर्थात् इसका विचार किया जाता है ॥४॥ |
* तात्पर्य यह है कि यदि यहाँ जातिमें प्रश्न न मानकर जातिसम्बन्धी प्रश्न माना जाय तो 'कौन-कौन ऋक् हैं?' यह प्रश्न असंगत हो जाता है; क्योंकि ऋक् एक जाति है, उसमें रहनेवाले भिन्न-भिन्न मन्त्रोंकी पृथक्-पृथक् जाति नहीं है। अतः यहाँ ऋक्त्वजातिविशिष्ट मन्तरूप व्यक्तियोंके विषयमें ही प्रश्न किया गया है, ऐसा मानना चाहिये।