भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

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खण्ड १] शाङ्करभाष्यार्थ ३७

विमर्शे हि कृते सति प्रति-वचनोक्तिरुपपन्ना—इस प्रकार विचार करनेपर ही यह प्रतिवचन ( उत्तर ) रूप उक्ति संगत हो सकती है कि—

वागेवर्क् प्राणः सामोमित्येतदक्षरमुद्गीथः ।
तद्वा एतन्मिथुनं यद्वाक्व प्राणश्चर्क च साम च ॥५॥

वाक् ही ऋक् है, प्राण साम है और ॐ यह अक्षर उद्गीथ है । ये जो ऋक् और सामरूप वाक् और प्राण हैं, परस्पर मिथुन (जोड़े) हैं ॥५॥

वागेवर्क् प्राणः साम, ओमि-वाणी ही ऋक् है, प्राण साम है तथा ॐ यह अक्षर उद्गीथ है ।
त्येतदक्षरमुद्गीथ इति । वागृ-इस प्रकार वाक् और ऋक्की एकता होनेपर भी [तीसरे मन्त्रमें बतलाये
चोरेकत्वेऽपि नाष्टमत्वव्याघातः,हुए उद्गीथके] अष्टमत्वका व्याघात नहीं होता, क्योंकि यह पूर्व वाक्यसे
पूर्वस्माद्वाक्यान्तरत्वात्; आप्ति-भिन्न वचन है, 'ओमित्येतदक्षर-मुद्गीथः' यह वचन ओंकारके व्याप्ति-
गुणसिद्धये हि ओमित्येतदक्षर-गुणकी सिद्धिके लिये प्रयुक्त हुआ है [और द्वितीय मन्त्र उसके रसतम-
मुद्गीथ इति ।त्वका प्रतिपादन करनेके लिये है] ।
वाक्प्राणावृक्सामयोनी इतिवाक् और प्राण क्रमशः ऋक् और सामके कारण हैं । इसलिये
वागेवर्क प्राणः सामेत्युच्यते ।वाक् ही ऋक् है और साम प्राण हैं—ऐसा कहा जाता है । क्रमशः ऋक्
यथाक्रममृक्सामयोन्योर्वाक्प्राण-और सामके कारणरूप वाक् और प्राणका ग्रहण करनेसे
योर्ग्रहणे हि सर्वांसामृचां सर्वेषांसम्पूर्ण ऋक् और सम्पूर्ण सामका
च साम्नामवरोधः कृतः स्यात् ।अन्तर्भाव हो जाता है, तथा
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