छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 380, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ें३७६] छान्दोग्योपनिषद् [अध्याय ४
| धावी न सूरिरसूरिस्तत्प्रतिषेधोऽनसूरिः सूरिरेवेत्यर्थः । महान्तमतिप्रमाणमप्रमेयस्य प्रजापतेर्महिमानं विभूतिमाहुर्ब्रह्मविदः ।<br><br>यस्मात्स्वयमन्यैरनद्यमानोऽभक्ष्यमाणो यदनन्नमग्निवागादिदेवतारूपमत्ति भक्षयतीति । वा इति निरर्थकः । वयं हे ब्रह्मचारिन् आ इदमेवं यथोक्तलक्षणं ब्रह्म वयमा उपास्महे । वयमिति व्यवहितेन सम्बन्धः। अन्ये न वयमिदमुपास्महे, किं तर्हि ? परमेव ब्रह्मोपास्महे इति वर्णयन्ति । दत्तास्मै भिक्षामित्यवोचद् भृत्यान् ॥ ७ ॥ | हो वह 'असूरि' कहलाता है उसका भी प्रतिषेध 'अनसूरि' है अर्थात् वह सूरि (मेधावी) ही है। ब्रह्मवेत्ता-लोग इस प्रजापतिकी महती—अति प्रमाणवाली अर्थात् अप्रमेय महिमा विभूति बतलाते हैं; क्योंकि यह स्वयं दूसरोंसे अभक्ष्यमाण—न खाया जानेवाला और जो अग्नि आदि देवता-रूप अनन्न (दूसरोंका अन्न नहीं) है उसका अदन—भक्षण करता है। 'वै' यह अव्यय निरर्थक है। हे ब्रह्मचारिन् ! हम इस उपर्युक्त लक्षणोंवाले ब्रह्मकी ही उपासना करते हैं। 'उपास्महे' इस क्रियाका व्यवधानयुक्त 'वयम्' इस कर्तासे सम्बन्ध है। कोई-कोई ['ब्रह्मचारिन्नेदमुपास्महे' इसका 'ब्रह्मचारिन् न इदम् उपास्महे' ऐसा पदच्छेद कर] हम इस ब्रह्मकी उपासना नहीं करते; तो किसकी करते हैं ? परब्रह्मकी ही उपासना करते हैं—ऐसी व्याख्या करते हैं। फिर उसने सेवकोंसे कहा कि 'इसे भिक्षा दो' ॥७॥ |
तस्मा उ ह ददुस्ते वा एते पञ्चान्ये पञ्चान्ये दश सन्तस्तत्कृतं तस्मात्सर्वासु दिक्ष्वन्नमेव दश कृतꣳसैषा