छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 381, कुल 978 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३०७
विराडन्नादि तयेदꣳसर्वं दृष्टꣳसर्वमस्येदं दृष्टं भवत्यन्नादो भवति य एवं वेद य एवं वेद ॥ ८ ॥
तब उन्होंने उसे भिक्षा दे दी। वे ये [अग्न्यादि और वायु] पाँच [वागादिसे] अन्य हैं तथा इनसे [वागादि और प्राण] ये पाँच अन्य हैं इस प्रकार ये सब दश होते हैं। ये दश कृत (कृतनामक पासेसे उपलक्षित द्यूत) हैं। अतः सम्पूर्ण दिशाओंमें ये अन्न ही दश कृत हैं। यह विराट् ही अन्नादी (अन्न भक्षण करनेवाला) है। उसके द्वारा यह सब देखा जाता है। जो ऐसा जानता है उसके द्वारा यह सब देख लिया जाता है और वह अन्न भक्षण करनेवाला होता है ॥ ८ ॥
| तस्मा उ ह ददुस्ते हि भिक्षाम्। ते वै ये ग्रस्यन्तेऽग्न्यादयो यश्च तेषां ग्रसिता वायुः पञ्चान्ये वागादिभ्यः तथान्ये तेभ्यः पञ्चाध्यात्मं वागादयः प्राणश्च, ते सर्वे दश भवन्ति संख्यया, दश सन्तस्तत्कृतं भवति ते। चतुरङ्क एकाय एवं चत्वारस्त्र्यङ्काय एवं त्रयोऽपरे द्व्यङ्काय | तब उन्होंने उसे भिक्षा दे दी। वे ये अग्नि आदि, जो कि भक्षण किये जाते हैं और जो उन्हें भक्षण करनेवाला वायु है—ये पाँचों वागादिसे अन्य हैं तथा उनसे वागादि और प्राण—ये पाँच अध्यात्म अन्य हैं। ये सब संख्यामें दश होते हैं और दश होनेके कारण ये कृत हैं। उनमें एक पासा चार अङ्कोंवाला होता है; उसी प्रकार [अग्नि आदि और वागादि--ये] चार हैं। जिस प्रकार तीन अङ्कोंवाला पासा होता है उसी प्रकार [अग्न्यादि और वागादिमेंसे एक-एकको छोड़कर] शेष अन्न है। जिस प्रकार दो अङ्कोंवाला पासा होता है उसी प्रकार [दो-दोको छोड़कर] अन्य |