छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 43, कुल 978 में से
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खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ३९
ॐ.. में संसृष्ट मिथुनके समागमका फल
तदेतन्मिथुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे संसृज्यते यदा वै मिथुनौ समागच्छत आपयतो वै तावन्योन्यस्य कामम् ॥ ६ ॥
वह यह मिथुन ॐ इस अक्षरमें संसृष्ट होता है। जिस समय मिथुन (मिथुनके अवयव) परस्पर मिलते हैं उस समय वे एक-दूसरेकी कामनाओंको प्राप्त करानेवाले होते हैं ॥ ६ ॥
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तदेतदेवंलक्षणं मिथुनमोमित्येतस्मिन्नक्षरे संसृज्यते । एवं सर्वकामावाप्तिगुणविशिष्टं मिथुनमोंकारे संसृष्टं विद्यत इत्योंकारस्य सर्वकामावाप्तिगुणवत्त्वं प्रसिद्धम् । वाङ्मयत्वमोंकारस्य प्राणनिष्पाद्यत्वं च मिथुनेन संसृष्टत्वम् । | वह यह ऐसे लक्षणवाला मिथुन ॐ इस अक्षरमें संयुक्त होता है । इस प्रकार सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्तिरूप गुणसे युक्त मिथुन ओंकारमें संयुक्त रहता है, इसलिये ओंकारका सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्तिरूप गुणसे युक्त होना सिद्ध होता है । ओंकार वाङ्मय है और प्राणसे ही निष्पन्न होनेवाला है—यही उसका मिथुनसे संयुक्त होना है । |
| मिथुनस्य कामापयितृत्वं प्रसिद्धमिति दृष्टान्त उच्यते-यथा लोके मिथुनौ मिथुनावयवौ स्त्रीपुंसौ यदा समागच्छतो ग्राम्यधर्मतया संयुज्येयातां तदापयतः प्रापयतोऽन्योन्यस्येतरेतरस्य तौ कामम् । तथा च स्वात्मानुप्रविष्टेन मिथुनेन सर्वकामाप्ति- | कामनाओंको प्राप्ति करा देना यह मिथुनका प्रसिद्ध धर्म है—इस विषयमें दृष्टान्त बताया जाता है—जिस प्रकार लोकमें मिथुन यानी मिथुनके अवयवभूत स्त्री और पुरुष परस्पर मिलते हैं—ग्राम्यव्यवहार(रति) के लिये आपसमें संसर्ग करते हैं, उस समय वे एक दूसरेकी कामना पूर्ण कर देते हैं । इसी प्रकार अपनेसे अनुप्रविष्ट मिथुनके द्वारा ओंकारका |