छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 44, कुल 978 में से
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| ४० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| गुणवत्त्वमोंकारस्य सिद्धमित्य- | सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्तिरूप गुणसे | | अभिप्रायः ॥ ६ ॥ | युक्त होना सिद्ध होता है—यह इसका अभिप्राय है ॥ ६ ॥ |
उद्गीथदृष्टिसे ओंकारकी उपासना करनेका फल
| तदुपासकोऽप्युद्गाता तद्धर्मा भवतीत्याह— | उस (ओंकार) का उपासक उद्गाता भी उसीके समान धर्मसे युक्त होता है, यह बतलाया जाता है- |
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आपयिता ह वै कामानां भवति य एतदेवं विद्वानक्षरमुद्गीथमुपास्ते ॥ ७ ॥
जो विद्वान् (उपासक) इस प्रकार इस उद्गीथरूप अक्षरकी उपासना करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेवाला होता है ॥७॥
| आपयिता ह वै कामानां यजमानस्य भवति । य एतदक्षरमेवमाप्तिगुणवदुद्गीथमुपास्ते तस्यैतद्यथोक्तं फलमित्यर्थः । "तं यथा यथोपासते तदेव भवति" (मं० ब्रा० २०) इति श्रुतेः॥७॥ | यजमानकी कामनाओंको प्राप्त करा देनेवाला होता है। तात्पर्य यह है कि जो इस प्रकार इस आप्तिगुणवान् अक्षर उद्गीथकी उपासना करता है उसे यह पूर्वोक्त फल प्राप्त होता है, जैसा कि "उसकी जिस-जिस प्रकार उपासना करता है वैसा ही हो जाता है" इस श्रुतिसे सिद्ध होता है ॥ ७ ॥ |
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ओंकारकी समृद्धिगुणवत्ता
| समृद्धिगुणवांश्चोंकारः, कथम् | ओंकार समृद्धि गुणवाला भी है, सो किस प्रकार ? |
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