भारतकोश
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ

पृष्ठ 491, कुल 978 में से

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पृष्ठ 491

पञ्चम खण्ड

पर्जन्यरूप अग्निविद्या

द्वितीयहोमपर्यायार्थमाह—अब श्रुति द्वितीय होमके पर्यायार्थका वर्णन करती है—

पर्जन्यो वाव गौतमाग्निस्तस्य वायुरेव समिदभ्रं धूमो विद्युदर्चिरशनिरङ्गारा ह्रादनयो विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥

हे गौतम ! पर्जन्य ही अग्नि है; उसका वायु ही समिध् है, बादल धूम है, विद्युत् ज्वाला है, वज्र अङ्गार है तथा गर्जन विस्फुलिङ्ग हैं ॥१॥

पर्जन्यो वाव पर्जन्य एव गौतमाग्निः पर्जन्यो नाम वृष्ट्युपकरणाभिमानी देवताविशेषः। तस्य वायुरेव समित्। वायुना हि पर्जन्योऽग्निः समिध्यते, पुरोवातादिप्राबल्ये वृष्टिदर्शना। अभ्रं धूमो धूमकार्यत्वाद् धूमवच्च लक्ष्यमाणत्वात्। विद्युदर्चिः, प्रकाशसामान्यात्। अशनिरङ्गाराः, काठिन्याद्विद्युत्सम्बन्धाद्वा। ह्रादनयोहे गौतम ! 'पर्जन्यो वाव'-पर्जन्य ही अग्नि है—वृष्टिके जो साधन हैं उनके अभिमानी देवताविशेषका नाम 'पर्जन्य' है। उसका वायु ही समिध् है, क्योंकि पर्जन्यरूप अग्नि वायुसे ही प्रदीप्त होता है, जैसा कि पूर्वीय वायु आदिकी प्रबलता होनेपर वृष्टि होती देखी जानेसे सिद्ध होता है। धूमका कार्य होने तथा धूमवत् देखा जानेके कारण बादल धूम है। प्रकाशमें समानता होनेके कारण विद्युत् (बिजली) ज्वाला है। कठिनताके कारण अथवा विद्युत्से सम्बन्ध रखनेके कारण वज्र अङ्गार है। ह्रादनय विस्फुलिङ्ग
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