छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished978 पृष्ठ
पृष्ठ 516, कुल 978 में से
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| ५१२ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ५ |
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दक्षिणायनके महीनोंसे पितृलोकको, पितृलोकसे आकाशको और आकाशसे चन्द्रमाको प्राप्त होते हैं। यह चन्द्रमा राजा सोम है। वह देवताओंका अन्न है, देवतालोग उसका भक्षण करते हैं ॥ ४ ॥
| मासेभ्यः पितृलोकं पितृलोकादाकाशमाकाशाच्चन्द्रमसम्। कोऽसौ यस्तैः प्राप्यते चन्द्रमाः ? य एष दृश्यतेऽन्तरिक्षे सोमो राजा ब्राह्मणानाम्, तदन्नं देवानाम्, तं चन्द्रमसमन्नं देवा इन्द्रादयो भक्षयन्ति। अतस्ते धूमादिना गत्वा चन्द्रभूताः कर्मिणो देवैर्भक्ष्यन्ते। | वे दक्षिणायनके महीनोंसे पितृलोकको, पितृलोकसे आकाशको और आकाशसे चन्द्रमाको प्राप्त होते हैं। उनके द्वारा जो प्राप्त किया जाता है वह यह चन्द्रमा कौन है ? यह जो आकाशमें दिखायी देता है तथा जो सोम ब्राह्मणोंका राजा है, वह देवताओंका अन्न है; उस चन्द्रमारूप अन्नको इन्द्रादि देवता भक्षण करते हैं। अतः धूमादि मार्गसे जाकर चन्द्रमारूप हुए वे कर्मी देवताओंसे भक्षित होते हैं। |
| नन्वनर्थायेष्टादिकरणं यद्यन्नभूता देवैर्भक्ष्येरन्। | शङ्का— यदि वे अन्नरूप होकर देवताओंद्वारा भक्षित होते हैं तो इष्टादि कर्मोंका करना अनर्थके ही लिये है ? |
| नैष दोषः— अन्नमित्युपकरणमात्रस्य विवक्षितत्वात्; न हि ते कवलोत्क्षेपेण देवैर्भक्ष्यन्ते, किं तर्हि? उपकरणमात्रं देवानां भवन्ति ते स्त्रीपशुभृत्यादिवत्। दृष्टश्चान्न- | समाधान— यह दोष नहीं है, क्योंकि 'अन्न' इस शब्दसे केवल उपभोगकी सामग्री ही विवक्षित है। वे देवताओंद्वारा ग्रासकी तरह उठाकर नहीं खाये जाते, तो फिर क्या होता है ? वे स्त्री, पशु एवं सेवकादिके समान देवताओंके केवल उपकरणमात्र होते हैं। 'अन्न' |